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ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग के सामने तमाम सवालों से बचने का अब एक ही रास्ता बचा

चुनाव आयोग ने अपने प्रेसनोट में बताया है कि सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए. ऐसे में यह बात पीछे नहीं छूट सकती कि चुनाव आयुक्तों ने अपनी आपत्तियां कैसे दरकिनार कीं?

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चुनाव आयुक्तों के बीच मतभेद की खबरों के बाद आयोग की सफाई ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं. (Photo: PTI)
चुनाव आयुक्तों के बीच मतभेद की खबरों के बाद आयोग की सफाई ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं. (Photo: PTI)

हाल ही में हुए इंडियन एक्सप्रेस के खुलासे के बाद चुनाव आयोग ने जो सफाई दी है उसने एक नए सवाल का दरवाजा खोल दिया है. आयोग का कहना है कि आयुक्तों के बीच किसी मुद्दे पर मतभेद होना बड़ी बात नहीं है. यह प्रक्रिया का हिस्सा है. रिपोर्ट में जिन 14 आपत्तियों का जिक्र है वे ड्राफ्ट स्तर पर थीं. अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए. यह बात सही भी लगती है. लेकिन इसी सफाई से कुछ और सवाल पैदा हो गए हैं. जिनके जवाब देना मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और पूरे चुनाव आयोग के लिए बेहद जरूरी हो गया है.

चुनाव आयोग ने आयुक्तों की असहमति, ऐतराज, आपत्तियों और शिकायतों के मामले को अपने प्रेसनोट में सिलसिलेवार ढंग से समझाया. प्रेसनोट का पांचवां पॉइंट तो यहां तक कहता है कि ‘पिछले दस महीनों में आयोग ने 40 से अधिक इनिशिएटिव लिए और कई इलेक्टोरल रिफॉर्म किए. पिछले साल भर में चुनाव आयोग ने सभी फैसले 'unanimous' (सर्वसम्मति) से लिए.  सभी चुनाव आयुक्तों की सहभागिता के साथ.’ लेकिन, इस सफाई के साथ भी यह रहस्य कायम ही रहा कि इस प्रेसनोट पर तीनों चुनाव आयुक्त सहमत हैं, या नहीं? यानी, इस सफाई पर भी ‘सर्वसम्मति’ है, या नहीं? वरना, कम से कम इस प्रेसनोट पर तो तीनों चुनाव आयुक्तों के हस्ताक्षर होते ही.

चुनाव आयोग की ‘सर्वसम्मति’ वाली सफाई क्यों नाकाफी है?
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चुनाव आयोग की सफाई पर अगला सवाल यह उठता है कि क्या चुनाव आयोग उन सभी फैसलों की कॉपी सार्वजनिक करेगा जिनमें कमिश्नरों के ऐतराज के बावजूद अंतिम फैसला सर्वसम्मति से लिया गया. यानी उस फैसले पर तीनों आयुक्तों के हस्ताक्षर थे. अगर ऐसा होता है तो लोगों को साफ दिखेगा कि आपत्तियां कहां तक थीं और सहमति कहां बनी?

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दूसरा बडा सवाल यह है कि आखिर आयुक्तों ने अपनी इतनी सख्त आपत्तियों को अंतिम फैसले के वक्त खुद ही कैसे दरकिनार कर दिया. मीडिया रिपोर्ट में आयुक्तों की आपत्तियां काफी कड़ी बताई गई हैं. कुछ जगह तो अवैध और अनधिकृत जैसे शब्दों का भी इस्तेमाल हुआ है. फिर भी अंतिम फैसला जब सर्वसम्मति से हुआ तो क्या वजह रही होगी?

इस पर कई संभावित परिस्थितियां और कारण सोचे जा सकते हैं. क्या ऐसा हो सकता है कि ड्राफ्ट स्तर पर जो आपत्तियां उठाई गईं उन्हें बाद में विस्तृत चर्चा में सुलझा लिया गया. यानी आयुक्तों ने अपनी बात रखी. दूसरे सदस्यों ने जवाब दिए. तकनीकी या कानूनी स्पष्टीकरण दिए गए. फिर आयुक्तों को लगा कि उनकी चिंता का समाधान हो गया है. इसलिए वे सहमत हो गए?

दूसरी संभावना यह है कि आयुक्तों ने अपनी आपत्तियों को लिखित रूप में दर्ज तो कर लिया लेकिन अंतिम फैसला लेते वक्त संस्था की एकता को प्राथमिकता दी. चुनाव आयोग जैसी संस्था में आंतरिक मतभेद को सार्वजनिक रूप से लंबा खींचना संस्था की विश्वसनीयता पर असर डाल सकता है. इसलिए आयुक्तों ने सोचा होगा कि अंदर की बहस काफी है. बाहर एक स्वर में फैसला जारी करना बेहतर है.

तीसरी संभावना यह भी हो सकती है कि कुछ आपत्तियां प्रक्रिया संबंधी थीं. जैसे सॉफ्टवेयर की पहुंच या फॉर्म में अतिरिक्त जानकारी. जब आयोग ने स्पष्ट किया कि कानूनी ढांचा वही है और ERO के अधिकार बरकरार हैं तो आयुक्तों ने अपनी आपत्ति वापस ले ली होगी. यानी उनकी चिंता का जवाब मिल गया होगा.

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एक और सवाल यह उठता है कि क्या आयुक्तों ने अपनी आपत्तियों को सिर्फ इंटरनल नोट के रूप में रखा और उन्हें औपचारिक असहमति का रूप नहीं दिया. कानून में प्रावधान है कि अगर कोई आयुक्त किसी फैसले से पूरी तरह असहमत हो तो वह अपनी असहमति दर्ज करा सकता है. कुछ मामलों में राष्ट्रपति तक शिकायत का रास्ता भी खुला रहता है. पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने भी इस बात का जिक्र किया है. अगर आपत्तियां इतनी गंभीर थीं तो आयुक्तों ने इस रास्ते का इस्तेमाल क्यों नहीं किया? क्या उन्हें लगा कि मुद्दा इतना बड़ा नहीं है कि संस्थागत टकराव की नौबत लाई जाए?

इसके अलावा यह भी सोचा जा सकता है कि आयुक्तों ने कुछ मुद्दों पर अपनी बात मान ली होगी क्योंकि अंतिम जिम्मेदारी पूरे आयोग की होती है. तीनों सदस्य मिलकर फैसला लेते हैं. एक या दो सदस्यों की आपत्ति के बावजूद अगर बहुमत या सहमति बन जाती है तो फैसला आगे बढ़ जाता है. आयुक्तों ने शायद यही रास्ता चुना.

लेकिन ये सब अनुमान हैं. असल जवाब तो आयोग के पास ही है. अगर आयोग उन फैसलों की कॉपी सार्वजनिक कर दे जिनमें आपत्तियों के बावजूद सर्वसम्मति बनी तो कई सवाल अपने आप खत्म हो जाएंगे. लोग देख सकेंगे कि आपत्तियां किस स्तर की थीं और सहमति कैसे बनी.
अभी की स्थिति में आयोग की सफाई ने एक तरफ खुलासे की कुछ धार को कम किया है. दूसरी तरफ नए सवाल खड़े कर दिए हैं. ये सवाल सिर्फ आयुक्तों के व्यवहार को लेकर नहीं हैं. ये संस्था की पारदर्शिता को लेकर भी हैं. चुनाव आयोग देश की सबसे महत्वपूर्ण संस्थाओं में से एक है. इसकी प्रक्रियाएं जितनी साफ और पारदर्शी होंगी, लोगों का भरोसा उतना ही बढ़ेगा.

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आयोग अगर चाहे तो इन सवालों का जवाब दे सकता है. फैसलों की कॉपी जारी कर सकता है. या कम से कम यह बता सकता है कि आयुक्तों की आपत्तियों का समाधान कैसे हुआ. बिना इसके ये सवाल हवा में तैरते रहेंगे. और हर नया खुलासा या सफाई इन्हीं सवालों को और बड़ा बनाती रहेगी. मतभेद होना बुरी बात नहीं है. लेकिन मतभेद के बाद सहमति कैसे बनी, यह बताना जरूरी है. नहीं तो लोग अपनी-अपनी कहानी गढ़ते रहेंगे. और संस्था की साख पर सवाल उठते रहेंगे.

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