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मेसी का धर्मसंकट... वर्ल्‍डकप फुटबॉल फाइनल में दांव पर होंगे अर्जेंटीना-स्‍पेन के कई र‍िश्‍ते

लियोनेल मेसी की रगों में अर्जेंटीना का टैंगो भले ही दौड़ता हो, लेकिन उनका दिल स्पेन के टिकी-टाका के अहसानों से भी धड़कता है. न्यूयॉर्क का यह फाइनल सिर्फ एक मैच नहीं, एक महानायक का भावनात्मक धर्मसंकट है. ज‍िसमें एक तरफ है रोसारियो (अर्जेंटीना) की गलियों में बीता बचपन है तो दूसरी तरफ बार्सिलोना (स्‍पेन) के ला मासिया में प्रोफेशनल फुटबॉलर बनने के सपने का सच होना. मेसी के भीतर यादों का ज्‍यार-भाटा चढ़-उतर रहा होगा.

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फुटबॉल वर्ल्‍ड कप फाइनल में आमने-सामने होंगे स्‍पेन के यमाल और अर्जेंटीना के मेसी. (Photo: AI-generated)
फुटबॉल वर्ल्‍ड कप फाइनल में आमने-सामने होंगे स्‍पेन के यमाल और अर्जेंटीना के मेसी. (Photo: AI-generated)

रविवार की ठंडी शाम जब न्यूयॉर्क का मेटलाइफ स्टेडियम रोशनी से नहाया होगा, तब वहां केवल फीफा विश्व कप की चमचमाती ट्रॉफी के लिए दो देशों की जंग नहीं हो रही होगी. पिछले ढाई दशकों में दुनिया ने न जाने कितने फाइनल देखे हैं- चाहे रोनाल्डो के आंसू हों, जिदान का वो कुख्यात हेडबट या फिर कतर की धरती पर लियोनेल मेसी का फुटबॉल का खुदा बन जाना. लेकिन इस बार न्यूयॉर्क के इस मैदान पर जो ड्रामा होने जा रहा है, वैसा खेल इतिहास में पहले कभी महसूस नहीं किया गया.

यह फुटबॉल की उस रूहानी, खूबसूरत और कुछ-कुछ बेरहम दास्तान का आखिरी चैप्‍टर है, जिसके सेंटर में हैं लियोनेल एंड्रेस मेसी. एक ऐसा महानायक, जो रविवार को जब मैदान पर उतरेगा, तो उसके कंधों पर सिर्फ अर्जेंटीना की उम्मीदों का बोझ नहीं होगा, बल्कि उसके दिल में यादों का एक ऐसा समंदर ह‍िलोरे ले रहा होगा, जो उसे अपनी ही पहचान और अतीत के सामने खड़ा कर देगा.

औपनिवेशिक अतीत से परे फुटबॉल के एक ही घराने की दो शाखाएं

इस महामुकाबले की सबसे बुनियादी हकीकत दोनों देशों के आपसी ताने-बाने में छिपी है. इतिहास की किताबों में अर्जेंटीना भले ही कभी स्पेन का उपनिवेश रहा हो, लेकिन जब बात इस 320 ग्राम की गेंद की आती है, तो ये दोनों मुल्क एक ही फुटबॉल फ‍िलॉसफी के वारिस नजर आते हैं.

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'पोट्रिरोस' कही जाने वाली अर्जेंटीना की तंग गलियों में नंगे पैर फुटबॉल खेल रहे हर बच्चे का एक ही ख्वाब होता है क‍ि एक दिन वह स्पेनिश ला लीगा की चकाचौंध में अपनी फुटबॉल स्‍क‍िल का प्रदर्शन करे. वहीं स्पेन के बड़े क्लबों जैसे बार्सिलोना और रीयल मैड्रिड के स्काउट्स के लिए अर्जेंटीना एक ऐसी अंतहीन सोने की खदान है, जहां वे हर साल नई प्रतिभाओं की खोज में आते हैं. इसी खनन में उन्हें कभी डिएगो माराडोना मिले थे और फिर लियोनेल मेसी मिले.

आज जब अर्जेंटीना की मौजूदा राष्ट्रीय टीम के कम से कम सात खिलाड़ी स्पेन के अलग-अलग क्लबों के लिए पेशेवर फुटबॉल खेलते हैं, तो इस फाइनल की तासीर बदल जाती है. रविवार को जब मैदान पर खिलाड़ी एक-दूसरे को टैकल करेंगे, तो वे अजनबियों से नहीं, बल्कि अपने ही सगे-संबंधियों, अपने ही रूम-मेट्स और क्लब के साथियों से टकरा रहे होंगे. यह पेशेवर फुटबॉल की दुनिया की वो नजदीकी है, जो इस जंग को बेहद निजी और इमोशनल बना देती है.

$900 का वो कर्ज और रोसारियो के बच्चे के जज्बात

रोसारियो का वो 11 साल का नाटा लड़का, जो 'ग्रोथ हार्मोन डेफिशिएंसी' से जूझ रहा था, जिसके इलाज के लिए हर महीने 900 डॉलर की दरकार थी. अर्जेंटीना के क्लबों ने जब वित्तीय मदद देने को लेकर हाथ ऊंचे क‍िए, तब स्पेन के बार्सिलोना क्लब ने अपना दिल और अपनी तिजोरी दोनों खोल दिए थे. मेसी के मन को पढ़ने के ल‍िए उनके बचपन की उस शाम को याद करना जरूरी है, जब बार्सिलोना के एक रेस्तरां में नैपकिन पेपर पर उनकी तकदीर लिखी गई थी. ये बार्ल‍िसोना क्‍लब से खेलने का कांट्रेक्‍ट था.

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वह 900 डॉलर की मदद सिर्फ एक दवा का खर्च नहीं थी, वह उस बच्‍चे को दी गई एक नई जिंदगी थी. मेसी इस बात को कभी नहीं भूले. खेल की इस प्रोफेशनल दुनिया में जहां खिलाड़ी हर सीजन में अपनी वफादारी बदलते हैं, मेसी ने अपने जूनियर और सीनियर करियर के करीब 20 साल उसी एक क्लब को सौंप दिए. यह स्पेन से उनका वो इमोशनल कनेक्शन है, जिसे कोई पेशेवर कॉन्ट्रैक्ट कभी बयां नहीं कर सकता. स्पेन ने उनके पैरों को दौड़ने की ताकत दी और मेसी ने स्पेनिश फुटबॉल को दुनिया का सिरमौर बना दिया.

...और स्‍पेन‍िश स‍िट‍िजन होते होते रह गए मेसी

अंतरराष्ट्रीय खेल जगत में वह दौर आज भी चर्चा का विषय बनता है जब हर अखबार की सुर्खियां हुआ करती थीं कि कैसे मेसी स्पेनिश राष्ट्रीय टीम ('ला फुरिया रोजा') का हिस्सा बनने वाले हैं. स्पेनिश फुटबॉल फेडरेशन ने उन्हें नागरिकता और लाल जर्सी पहनने का ऑफ‍िश‍ियल प्रपोजल दिया था. अगर उस दिन 16 साल के उस लड़के ने हां कह दिया होता, तो फुटबॉल का इतिहास पूरी तरह बदल चुका होता. वे जावी और इनिएस्ता की उस स्पेनिश टीम का हिस्सा होते जिसने दुनिया पर राज किया.

लेकिन मेसी ने उस चमकीले शॉर्टकट को ठुकरा दिया. उन्होंने अपनी मिट्टी, अपनी नीली-सफेद जर्सी के लिए इंतजार करना चुना, भले ही इसके लिए उन्हें शुरुआती सालों में अपने ही देश में 'स्पेनिश बच्चा' कहकर पराया समझा गया. यह उनका अपनी जड़ों के प्रति वो अनकहा जज्बा था, जो आज उन्हें अर्जेंटीना का महानायक बनाता है.

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FIFA World Cup Final

आंकड़ों का नीरस अतीत बनाम 80 हजार का शोर

अजीब बात यह है कि फुटबॉल के इन दो दिग्गजों के बीच प्रतिद्वंद्विता का कोई कड़वा या ऐतिहासिक अतीत नहीं है. दोनों के बीच इतिहास बिल्कुल संतुलित और नीरस रहा है. विश्व कप के पन्नों को पलटें, तो दोनों का एकमात्र मुकाबला आज से 60 साल पहले, 1966 के विश्व कप में हुआ था, जिसे अर्जेंटीना ने 2-1 से जीता था. इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट में खेले गए 14 मैचों में भी दोनों 6-6 की जीत के साथ बराबरी पर खड़े हैं, जबकि दो मैच ड्रॉ रहे. यानी, कुल 15 मुकाबलों में अर्जेंटीना ने सात मैच जीते हैं, और स्‍पेन ने छह.

लेकिन रविवार को यह इतिहास कोई मायने नहीं रखेगा. न्यूयॉर्क के इस स्टेडियम में जब 80 हजार दर्शक अपने-अपने नायकों के लिए चिल्लाएंगे, तो मोटिवेशन का स्तर अलग होगा. स्पेन 2010 के बाद अपनी खोई हुई सल्तनत को वापस पाने के लिए बेताब है, जबकि अर्जेंटीना (जिसने 1978, 1986 और 2022 में यह कमाल किया है) अपने इस हीरो मेसी को कतर की तरह एक बार फ‍िर स‍िर बैठाकर व‍िदाई देने के ल‍िए मचल रहा होगा.

टिकी-टाका की ज्‍यॉमेट्री बनाम टैंगो का दीवानापन

रणनीतिक तौर पर, यह मैच फुटबॉल की दो अलग-अलग फ‍िलॉसफी का टकराव भी है. पिछले दो दशकों में स्पेन ने 'टिकी-टाका' को एक अचूक हथियार के रूप में विकसित किया है. यह छोटे पास, गेंद पर कब्जे और गणितीय सटीकता का एक ऐसा जाल है जिसमें विरोधी टीम घुटने टेक देती है. स्पेन एक मशीन की तरह खेलता है, जहां हर पुर्जा अपनी जगह तय है.

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इसके उलट, अर्जेंटीना का खेल अपने पारंपर‍िक डांस 'टैंगो' की तरह है. जिसमें जुनून है, अप्रत्याशित मोड़ हैं और एक अजीब सा कलात्मक दीवानापन है. अर्जेंटीना क्र‍िएट‍िव‍िटी, पर्सनल ड्रिबलिंग और अचानक दागे गए लंबे पासों पर जिंदा रहता है. एक तरफ स्पेन का अनुशासन होगा, तो दूसरी तरफ अर्जेंटीना की वो जिद, जो खेल को किसी कला में तब्दील कर देती है.

FIFA World Cup Final

(19 साल पहले एक फोटोशूट के मेसी ज‍िस बच्‍चे को टब में नहला रहे थे, वही बड़ा होकर स्‍पेन का स्‍टार ख‍िलाड़ी लाम‍िने यमाल कहलाया जा रहा है और व‍िश्‍वकप में उनके ल‍िए चुनौती बन गया है.)

मिलेनियल बनाम Gen-Z: नियति की सबसे खूबसूरत क्रूरता

इस पूरी कहानी का जो पहलू सबसे ज्यादा भावुक करने वाला है, वह है मैदान पर होने वाला एक बेहद खास और ऐतिहासिक सामना. एक तरफ 39 की उम्र को छू रहे मिलेनियल पीढ़ी के आखिरी सम्राट लियोनेल मेसी होंगे, और उनके ठीक सामने खड़ा होगा स्पेन का 19 साल का लड़का लामिने यमाल.

फुटबॉल की रूह कितनी जादुई और क्रूर है, इसका सबूत साल 2007 की वो एक तस्वीर है. यूनिसेफ के एक चैरिटी फोटोशूट में 20 साल के युवा मेसी ने एक प्लास्टिक के टब में पांच महीने के एक दुधमुंहे बच्चे को अपनी गोद में लेकर नहलाया था. वह बच्चा कोई और नहीं, यही लामिने यमाल था.

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"जिस बच्चे को मेसी ने कभी अनजाने में अपनी गोद में थामकर आशीर्वाद दिया था, आज वही बच्चा स्पेन की लाल जर्सी पहने, अपनी पीढ़ी का परचम लहराते हुए, मेसी के आखिरी सपने को तोड़ने के लिए उनके सामने चुनौती बनकर खड़ा होगा. खेल की दुनिया में पीढ़ियों का ऐसा चक्रव्यूह पहले कभी नहीं देखा गया."

आखिरी सीटी और मेसी का धर्मसंकट

जैसे-जैसे मैच का वक्त करीब आ रहा है, मेटलाइफ स्टेडियम की लाइटें तेज होती जाएंगी. रविवार की रात जब रेफरी अंतिम सीटी बजाएगा, तो जश्न के बीच एक गहरी खामोशी भी छिपी होगी.

अगर स्पेन जीतता है, तो मेसी उस देश को मुस्कुराते देखेंगे जिसने उनके बचपन को पाला था, लेकिन उनकी अपनी मातृभूमि रो रही होगी. अगर अर्जेंटीना जीतता है, तो मेसी का सपना पूरा होगा, लेकिन ला मासिया के उस कुनबे की आंखों में आंसू होंगे जिसे वे अपना दूसरा परिवार मानते हैं.

यह लियोनेल मेसी का धर्मसंकट है. रविवार को न्यूयॉर्क में कोई एक टीम नहीं जीतेगी, बल्कि फुटबॉल की दुन‍िया अपने सबसे महान आर्टिस्‍ट का 'लास्ट डांस' न‍िहारेगी, और वक्त ठहर जाएगा.

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