जापान के आइची-नागोया में आयोजित हो रहे 20वें एशियाई खेलों के शुरुआती दस दिनों का खेल समाप्त हो चुका है और भारत के लिए खबर कतई अच्छी नहीं है. 2022 में चीन के हांगझोउ शहर में हुए पिछले एशियाई खेलों में 106 पदक जीतकर इतिहास रचने वाला भारत इस बार मेडल तालिका में बुरी तरह चरमरा गया है. पिछली बार 28 गोल्ड जीतने वाला भारत अब तक 6 ही गोल्ड मेडल जीत पाया है.
1990 के बीजिंग एशियन गेम्स को भारत के सबसे खराब प्रदर्शन के लिए याद किया जाता है, जब 195 सदस्यीय दल सिर्फ एक गोल्ड मैडल जीत पाया था. और पदक तालिका में 11वें स्थान पर रहा था. 2026 के एशिया कप के लिए जापान गए भारतीय दल में 495 सदस्य हैं. करीब 800 करोड़ रुपए इनकी ट्रेनिंग पर खर्च हुए हैं. लेकिन, अब तक का प्रदर्शन निराशाजनक है.
जापान में पदकों की सेंचुरी लगाने के साथ 'नया भारत' बनाने का दावा करने वाले स्पोर्टस सिस्टम की कलई जापान के मैदानों पर खुलकर सामने आ गई है. स्थिति इतनी दयनीय हो चुकी है कि भारत पदक तालिका में बहुत नीचे खिसक चुका है और अपनी खोई हुई साख वापस पाने के लिए संघर्ष कर रहा है.
भारत को अब तक छह गोल्ड मेडल मिले हैं, उसमें भी दो गोल्ड कबड्डी (महिला और पुरुष टीम) को मिले हैं, और एक गोल्ड महिलाओं की क्रिकेट टीम ने दिलाया है. यानी, तीन गोल्ड मेडल हमें उन खेलों में मिले हैं, जो बहुत कम देश खेलते हैं और जिन पर भारत का कब्जा है. छह गोल्ड में से दो भारत ने शूटिंग में जीते हैं. जिसे उत्साहजनक माना जाना चाहिए. और जैसे-जैसे तैसे एथलेटिक्स में एक गोल्ड मिला है. जहां भारत से और बेहतर की उम्मीद थी, लेकिन वह नहीं हो पाया.
एथलेटिक्स में बमुश्किल टूटा 'गोल्डन सूखा'
भारत की इस दुर्गति की सबसे बड़ी वजह एथलेटिक्स में हुआ बड़ा उलटफेर है. ऐतिहासिक रूप से एथलेटिक्स हमेशा से एशियाई खेलों में भारत का सबसे मजबूत किला रहा है, जिसने देश को सबसे ज्यादा सोने के तमगे दिलवाए हैं. लेकिन इस बार जापान में एथलेटिक्स का पूरा खाता सोने के मामले में लगभग सूना पड़ा रहा है. ट्रैक एंड फील्ड स्पर्धाओं में जिन खिलाड़ियों से पक्के गोल्ड की उम्मीद थी, वे दबाव में बिखर गए या अपनी लय हासिल नहीं कर सके. जैसे, भारत की महिला 4×4 टीम ने रिले रेस में देश को एक गोल्ड मेडल दिलवाया. भारत को सबसे तगड़ा झटका जापान, दक्षिण कोरिया, कतर, बहरीन, ईरान और उज्बेकिस्तान की टीमों ने दिया है. इन देशों के खिलाड़ियों ने रणनीतिक रूप से भारतीय खिलाड़ियों को पछाड़ते हुए पोडियम रेस से बाहर कर दिया. अब सिर्फ चार दिन का खेल बचा है, और हमारी उम्मीदें कुश्ती, तीरंदाजी और बॉक्सिंग पर लगी हैं. एक गोल्ड पुरुषों की क्रिकेट टीम और एक-आधा गोल्ड हॉकी में भी आने की उम्मीद रखी जा सकती है.
ऐतिहासिक आंकड़ों का सच और निरंतरता का अभाव
यदि हम एशियाई खेलों के पूरे इतिहास और डेटा का विश्लेषण करें तो साफ समझ आता है कि 2022 का प्रदर्शन एक सुखद अपवाद था, जबकि हमारी वास्तविक स्थिति हमेशा से काफी साधारण रही है. एशियाई खेलों के 70 से अधिक वर्षों के इतिहास में भारत का औसतन स्थान छठा से आठवां रहा है और औसतन मेडल संख्या 35 से 50 के बीच झूलती रही है. 1951 के पहले एशियाई खेलों में दूसरे स्थान पर रहने के बाद भारत कभी उस ऊंचाई को दोबारा नहीं छू सका. 2023 में 28 गोल्ड सहित 106 मेडल जीतकर ऐसा लगा था कि भारत ने एक नया बैंचमार्क स्थापित किया है, लेकिन 2026 में भारत फिर से अपने पुराने और लचर रिकॉर्ड की तरफ वापस लौट गया है, जिससे यह साफ होता है कि हमारे पास बड़ी सफलताओं को दोहराने की कोई टिकाऊ व्यवस्था नहीं है.
चीन छोड़िए, हांगकांग के लेवल की है हमारी चुनौती?
इस बार के एशियाई खेलों में सबसे चौंकाने वाली और कड़वी सच्चाई यह है कि भारत का मुकाबला चीन या मेजबान जापान जैसे दिग्गजों से होना तो दूर, वह चीन के एक छोटे से हिस्से हांगकांग की बराबरी पर जूझ रहा है. विशाल बजट और विशाल आबादी का ढोल पीटते भारत का एक छोटे से शहर जितने आकार वाले क्षेत्र के सामने बेबस नजर आना भारतीय खेल इतिहास की सबसे बड़ी नाकामियों में से एक बनकर उभरा है. और हांगकांग ही क्यों, दुनिया में अलग-थलग पड़ा नॉर्थ कोरिया पदक तालिका में भारत से ऊपर है. पिछले छह महीने से जंग में उलझा ईरान भी अब तक 9 गोल्ड मेडल जीत चुका है.
चीन का सबक: 1978 की हार से मेडल तालिका के बेताज बादशाह बनने तक
यदि भारत को इस दयनीय स्थिति से बाहर निकलना है, तो उसे चीन से सबक लेना होगा. 1978 के बैंकाक एशियाई खेलों में चीन पदक तालिका में अपने प्रतिद्वंद्वी जापान से पीछे रहकर दूसरे स्थान पर रहा था. उस एक हार ने चीन की खेल नीतियों को झकझोर कर रख दिया. इसके बाद चीन ने ऐसा गियर बदला कि उसने फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. 1982 के दिल्ली एशियाई खेलों से लेकर 2026 के जापान एशियाई खेलों तक, चीन हर बार तालिका में नंबर-1 पर रहा है. इस बार भी चीन के पास 138 से ज्यादा गोल्ड मेडल हैं, जबकि दूसरे नंबर पर मौजूद मेजबान जापान के पास करीब 42 गोल्ड ही हैं. चीन ने साबित कर दिया है कि खेल में कामयाबी किस्मत से नहीं, बल्कि एक तय लक्ष्य और साइंटिफिक तैयारी से मिलती है.
क्रिकेट को दोष देना बंद कीजिए, असली बीमारी कहीं और है
भारत में जब भी एशियाई खेलों या ओलंपिक में पदक तालिका में गिरावट आती है, तो सारा दोष क्रिकेट के सिर पर मढ़ देना सबसे आसान रास्ता मान लिया जाता है. आम तर्क यह दिया जाता है कि क्रिकेट सारा पैसा, प्रायोजक और मीडिया का ध्यान खींच लेता है, जिससे बाकी खेल अनाथ रह जाते हैं. लेकिन यह दलील पूरी तरह खोखली है. इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों को देखें, तो वहां भी क्रिकेट बेहद लोकप्रिय और धनी खेल है. इसके बावजूद वे देश ओलंपिक और राष्ट्रमंडल खेलों में स्विमिंग, एथलेटिक्स और साइक्लिंग जैसे खेलों में दुनिया पर राज करते हैं. असली फर्क स्पोर्ट्स कल्चर और मजबूत इन्फ्रास्ट्रक्चर का है. भारत में क्रिकेट गुनहगार नहीं है, बल्कि असली बीमारी हमारे अन्य खेल संघों की अंदरूनी राजनीति, खिलाड़ियों का लचर फिटनेस मैनेजमेंट और विजन की कमी है.