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100 दलित उम्मीदवारों के साथ अखिलेश यादव का ‘अयोध्या मॉडल’ फिर सफल होगा क्या?

समाजवादी पार्टी ने आने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में दलित वोटों को हासिल करने के लिए नई रणनीति पर काम कर रही है. अखिलेश यादव यूपी की 100 विधानसभा सीटों पर दलित उम्मीदवार उतारने जा रहे हैं - बीजेपी से मुकाबले में अखिलेश यादव के निशाने पर मायावती आ गई हैं.

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उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और बीएसपी नेता मायावती. (Photo: PTI)
उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और बीएसपी नेता मायावती. (Photo: PTI)

अखिलेश यादव आने वाले उत्तर प्रदेश चुनाव में लोकसभा चुनाव के कारगर नुस्खे फिर आजमाने जा रहे हैं. लोकसभा चुनाव में PDA के सफल प्रयोग के बाद आगामी विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी उसे विस्तार देने की योजना पर काम कर रही है - और, बीजेपी से सीधे मुकाबले के लिए निशाना बीएसपी नेता मायावती के वोटर पर टिकी है.  

2024 के लोकसभा चुनाव के बाद से ही यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव हर मौके पर PDA (पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक) फैक्टर का जिक्र करते हुए उसकी अहमियत समझाते रहे हैं. अखिलेश यादव को बीएसपी या मायावती पर सीधा हमले से परहेज करते भी देखा जाता रहा है, लेकिन अब मिजाज बदल रहा है. रिपोर्ट के मुताबिक, अखिलेश यादव को लगता है कि दलित वोट बैंक के एक हिस्से को अगर बीएसपी की चुनावी रणनीति समझाने की कोशिश की जाए, तो वे समाजवादी पार्टी का साथ दे सकते हैं - और, अगर ऐसा संभव हुआ तो बीजेपी से मुकाबला थोड़ा आसान हो सकता है. 

समाजवादी पार्टी आगामी यूपी विधानसभा चुनाव में भी पिछले लोकसभा चुनाव की ही तरह सामान्य सीटों पर दलित उम्मीदवार उतारने का प्लान कर रही है. लोकसभा चुनाव के बाद अखिलेश यादव अयोध्या (फैजाबाद लोकसभा सीट) के सांसद अवधेश प्रसाद को आगे करके बीजेपी को टार्गेट करते रहे हैं, लगता है आने वाले चुनाव में भी वैसा ही नजारा देखने को मिलने वाला है - सवाल है कि यूपी चुनाव में 100 सीटों पर दलित उम्मीदवार उतारकर समाजवादी पार्टी मायावती के वोटर को क्या संदेश देने की कोशिश कर रही है?

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समाजवादी पार्टी का PDA विस्तार अभियान

अखिलेश यादव लगता है अपनी छवि बदलने की कोशिश में लग गए हैं. समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह को लोक पिछड़ों के नेता मानते थे, लेकिन अखिलेश यादव की यादव समुदाय के नेता की छवि बनने लगी थी. बीजेपी विरोध के नाम पर समाजवादी पार्टी को मुस्लिम समुदाय के भी वोट मिल जाते हैं. आने वाले यूपी चुनाव के लिए समाजवादी पार्टी की जो रणनीति सामने आ रही है, मालूम होता है कि दलित वोट बैंक में ढंग से सेंध लगाने की कोशिश है. 

ध्यान देने वाली बात यह है कि समाजवादी पार्टी दलित वोटों को ऐसे समय साधने की कोशिश कर रही है, जब मायावती बीएसपी के लिए फिर से दलित और ब्राह्मण वोटों की सोशल इंजीनियरिग पर काम कर रही हैं. समाजवादी पार्टी और उसकी गठबंधन साथी कांग्रेस एक साथ आरोप लगाते हैं कि बीएसपी की चुनावी रणनीति बीजेपी की मदद के लिए होती है. 

लेटेस्ट रिपोर्ट के अनुसार, समाजवादी पार्टी आने वाले यूपी चुनाव में 100 दलित उम्मीदवार उतारने जा रही है. उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जाति के लिए 84 और अनुसूचित जनजाति के लिए 2 सीटें आरक्षित हैं. सुरक्षित सीटों पर तो हर पार्टी के दलित उम्मीदवार ही चुनाव लड़ते हैं, समाजवादी पार्टी 14 अनारक्षित सीटों पर भी दलित नेताओं को टिकट देने की योजना पर काम कर रही है. 

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उत्तर प्रदेश की 403 में से 100 सीटों पर दलित नेताओं को टिकट देने की रणनीति असल में अखिलेश यादव के पीडीए का विस्तार कार्यक्रम है - अब सवाल है कि समाजवादी पार्टी के दलित प्रोजेक्ट का मकसद क्या है?

समाजवादी पार्टी के अंदरूनी सूत्रों के हवाले से इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में इस सवाल का जवाब है, दलित समुदाय को संदेश भेजने के अलावा इसका मकसद एक व्यापक नैरेटिव तैयार करना भी है, और यह कि समाजवादी पार्टी अब अपनी यादव-मुस्लिम पार्टी वाली छवि से उबर रही है. समाजवादी पार्टी के एक सीनियर नेता का कहना है, यह कदम उठाए जाने का मकसद यह नैरेटिव गढ़ना है कि समाजवादी पार्टी दलितों को आरक्षित सीटों से भी ज्यादा हिस्सेदारी देने को तैयार है... हमने 2024 के लोकसभा चुनाव में भी यही किया था और हमें इसका फायदा मिला था.

देखा जाए, तो लोकसभा चुनाव में अखिलेश यादव का PDA एक्सपेरिमेंट सफल रहा. 2024 लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने सामान्य सीट से दो दलित उम्मीदवारों को टिकट दिया था, मेरठ और फैजाबाद. फैजाबाद लोकसभा सीट तो अवधेश प्रसाद ने जीतकर समाजवादी पार्टी को थमा दिया, लेकिन मेरठ में सुनीता वर्मा रामायण में श्रीराम का किरदार निभाने वाले बीजेपी उम्मीदवार अरुण गोविल से महज 10,585 वोटों से हार गईं.

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अब सवाल है कि समाजवादी पार्टी कौन कौन सी सामान्य सीटों पर अपने दलित उम्मीदवारों को आजमाने जा रही है?

समाजवादी पार्टी के ही एक नेता ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया है, हम दलित समुदाय के उन उम्मीदवारों को चुनने जा रहे हैं जो सामान्य सीटों पर लड़ सकें... हमारा लक्ष्य इस बार दलितों को 100 सीटें देना है, लेकिन यह मजबूत और उपयुक्त उम्मीदवार मिलने पर ही निर्भर करेगा... जिन सामान्य सीटों पर हम दलित उम्मीदवार उतारने की तैयारी कर रहे हैं, वे मुख्य रूप से ऐसी सीटें हैं जहां समाजवादी पार्टी पहले से बहुत मजबूत स्थिति में नहीं है.

क्या मायावती के प्रति अखिलेश यादव का रुख बदलने वाला है?

PDA में दलित विस्तार योजना का कोई नकारात्मक असर न पड़े, इसका भी इंतजाम पहले से ही किया जा रहा है. एक मुस्लिम समाज से आने वाले समाजवादी पार्टी के एक नेता ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया, 'अखिलेश जी ने यादव और मुस्लिम नेताओं को साफ तौर पर बताया है कि इस बार समाजवादी पार्टी 2024 वाला फॉर्मूला ही अपनाएगी, और दोनों समुदायों को ज्यादा टिकट नहीं दिए जाएंगे... सरकार बनने के बाद ऐसे नेताओं को विधान परिषद के जरिए जगह दी जाएगी.'

और इसके साथ ही अखिलेश यादव धीरे धीरे आक्रामक होने लगे हैं. बीते चुनावों में अखिलेश यादव को बीएसपी वोटर और मायावती के प्रति काफी नरम देखा जा चुका है. संभव है आने वाले चुनाव में ये सब न देखने को मिले. हाल के ही एक सार्वजनिक कार्यक्रम में अखिलेश यादव ने दलित समुदाय से वोट मांगते वक्त अपनी तरफ से हकीकत समझाने की भी कोशिश की. बोले, बीएसपी चाहे बीजेपी के साथ खुलकर हो या छिपकर, बीएसपी को वोट देना अपना वोट गंवाना है. 

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बीएसपी पर अखिलेश यादव का यह बदला स्टैंड तो यही बता रहा है कि अखिलेश यादव आने वाले चुनाव में दलित वोट हासिल करने के लिए आक्रामक रुख अख्तियार करने वाले हैं. समाजवादी पार्टी के दलित फेस राज्यसभा सांसद रामजी लाल सुमन के मुताबिक, समाजवादी पार्टी को दलित वोटों का बड़ा हिस्सा हासिल करने का पक्का यकीन है. कहते हैं, मैं बीएसपी की आलोचना नहीं करना चाहता, लेकिन उत्तर प्रदेश के लोग समझ चुके हैं कि बीएसपी आखिरकार बीजेपी की मदद करने वाली है. मौजूदा राजनीतिक माहौल में कोई भी राजनीतिक पार्टी हाथ पर हाथ रखे वोट पाने की उम्मीद नहीं कर सकती, जैसा बीएसपी कर रही है... हमें दलित समुदाय से बीजेपी विरोधी वोट मिलेंगे... दलितों को यह एहसास हो गया है कि बीजेपी और आरएसएस की मूल मानसिकता दलित विरोधी है, जो उनके मनुवादी एजेंडे में झलकती है.

उत्तर प्रदेश में 21 फीसदी दलित आबादी है, और वही मायावती की राजनीति का मजबूत आधार है. दलितों के साथ ब्राह्मण वोटर को जोड़कर मायावती 2007 में अकेले दम पर बीएसपी की सरकार बना चुकी हैं, और एक बार फिर सोशल इंजीनियरिंग का वही फॉर्मूला अपनाने की तैयारी कर रही हैं. लेकिन, हालात अच्छे नहीं रह गए हैं. 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में बीएसपी सिर्फ एक सीट ही जीत पाई थी. और, 2017 में 22.23 फीसदी रहा उसका वोट शेयर गिर कर 12.88 फीसदी पहुंच गया था. 2024 के आम चुनाव में तो बीएसपी का वोट शेयर लुढ़क कर 9.4 फीसदी ही रह गया, जबकि 2019 में बीएसपी का वोट शेयर 19.43 फीसदी दर्ज किया गया था - लगता है, अखिलेश यादव समाजवादी पार्टी को मायावती की गिरती लोकप्रियता का फायदा दिलाने की कोशिश कर रहे हैं. 

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