मध्य प्रदेश में चर्चित व्यावसायिक परीक्षा मंडल यानी व्यापमं घोटाले का जिन्न 11 साल बाद फिर फाइलों के चिराग से बाहर आ सकता है. सुप्रीम कोर्ट के नोटिस से इस मामले में राज्य सरकार और जांच एजेंसी सीबीआई की मुश्किलें बढ़ सकती हैं. इस मामले की सीबीआई जांच दोबारा हो सकती है.
सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस के पूर्व विधायक पारस सकलेचा की याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार और सीबीआई को नोटिस जारी कर दो हफ्ते में जवाब देने को कहा है. कोर्ट ने अब इस मामले की अगली सुनवाई के लिए 16 अप्रैल की तारीख तय की है.
जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने सरकार और जांच एजेंसी से पूछा है कि इस मामले में पूर्व विधायक पारस सकलेचा की बारह साल पहले 2014 में दी गई 320 पेज की शिकायत और सबूत के दस्तावेजों पर अब तक जांच और एक्शन क्या हुआ है?
मामला 2013 में पहली बार सार्वजनिक हुआ. सकलेचा की ओर से पहली शिकायत 2014 में सामने आई. अगले साल 2015 में उन्होंने सबूत के तौर पर कई दस्तावेज भी दिए. उसी साल सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई जांच कराने के आदेश दिए. इसके अगले साल बयान भी दर्ज कराए गए. लेकिन इसके बाद मामला ठंडे बस्ते में पड़ा रहा.
अब सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ ने कहा है कि जांच एजेंसी सीबीआई और राज्य सरकार दोनों चार्जशीट पर जांच और की गई कार्रवाई का ब्यौरा एफिडेविट के जरिए दें.
इस मामले में दाखिल याचिका मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर पीठ ने दो साल पहले अप्रैल 2024 में खारिज कर दी थी. हाई कोर्ट टिप्पणी दी थी कि सकलेचा इस मामले में सीधे तौर पर 'प्रभावित पक्ष' नहीं हैं.
सकलेचा ने हार नहीं मानी और हाईकोर्ट के निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. उनके वकील विवेक तन्खा ने दलील दी कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में एक सजग शिकायतकर्ता की भूमिका बेहद अहम होती है. सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को गंभीरता से लेते हुए सीबीआई और सरकार से जांच की प्रगति रिपोर्ट मांग ली है.
दरअसल यह घोटाला मध्य प्रदेश व्यावसायिक परीक्षा मंडल (व्यापमं) से आयोजित प्रवेश परीक्षाओं और सरकारी नौकरियों की भर्ती प्रक्रिया से जुड़ा था. इसमें रिश्वत लेकर फर्जी परीक्षार्थी बिठाकर अयोग्य उम्मीदवारों का चयन करने के आरोप लगे.
इसमें दस्तावेजी सबूत के मुताबिक, फर्जी परीक्षार्थी इम्तिहान में बिठाने के अलावा उत्तर पुस्तिका यानी ओएमआर शीट खाली छोड़ देना और बाद में उनमें हेराफेरी कर नंबर देने जैसे तरीके अपनाने के आरोप भी जुड़ते गए.
सिर्फ पीएमटी ही नहीं बल्कि पुलिस, संविदा शिक्षक और अन्य अहम सरकारी पदों की भर्तियों में भी ऐसा किए जाने के आरोप लगे. जांच के दौरान 40 से अधिक लोगों की संदिग्ध मौतें भी हुईं.
सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर 2015 में इसकी जांच सीबीआई को सौंप दी गई. करोड़ों रुपए के लेनदेन वाले इस बहुआयामी घोटाले में कई बड़े राजनेता, नौकरशाह और दलाल जेल गए. कोर्ट भी अब तक इस घोटाले के कई फर्जी परीक्षार्थियों और दोषियों को सजा सुना चुका है. लेकिन उनकी अपीलें लंबित हैं.