मध्य प्रदेश के दतिया में लग्जरी लाइफ जीने की चाहत ने उत्तर प्रदेश के एक युवक को फर्जी अधिकारी बना दिया. खुद को कभी एंटी करप्शन एंड क्राइम कंट्रोल फोर्स का डीआईजी तो कभी एंटी करप्शन ब्यूरो झांसी का इंस्पेक्टर बताकर उसने दो सर्राफा कारोबारियों से 1 करोड़ 9 लाख 50 हजार रुपये की उगाही कर ली. इस पूरे खेल में एक रिटायर्ड प्रोफेसर की भूमिका भी सामने आई है, जिसकी जांच पुलिस कर रही है.
पुलिस के मुताबिक, आरोपी मनीष कुमार ने पुलिस जैसी वर्दी, लग्जरी कार, अधिकारियों जैसी नंबर प्लेट और झांसी में आधुनिक कार्यालय का ऐसा तामझाम खड़ा कर रखा था कि लोग उसे असली अधिकारी समझ बैठते थे. इसी रुतबे का फायदा उठाकर वह व्यापारियों को कार्रवाई, गिरफ्तारी और बदनामी का डर दिखाकर मोटी रकम वसूलता रहा.
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इस मामले में दतिया के प्रतिष्ठित सर्राफा कारोबारी अरविंद अग्रवाल और उनके परिवार को निशाना बनाया गया. कारोबारी परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा और बाजार में साख को ही आरोपियों ने अपना सबसे बड़ा हथियार बना लिया.
रिटायर्ड प्रोफेसर ने तैयार की कथित साजिश
पुलिस जांच के अनुसार, इस पूरे खेल की कथित पटकथा रिटायर्ड प्रोफेसर अशोक कुमार गुप्ता ने तैयार की. कारोबारी परिवार से पुरानी जान-पहचान का फायदा उठाते हुए उन्होंने मनीष कुमार को उनके पास भेजा.
अक्टूबर 2024 में मनीष कुमार काली वर्दी पहनकर अरविंद अग्रवाल की दुकान पर पहुंचा. उसने खुद को एंटी करप्शन एंड क्राइम कंट्रोल फोर्स का डीआईजी बताया और एक कथित एफआईआर दिखाकर जेल भेजने की धमकी दी. इसके बाद केस खत्म कराने और समझौता कराने के नाम पर ब्लैकमेलिंग शुरू हो गई.
डरे हुए कारोबारी अक्टूबर 2024 से मार्च 2025 के बीच अलग-अलग किश्तों में करीब 80 लाख रुपये आरोपियों को देते रहे. आरोप है कि हर बार नई कहानी गढ़कर उनसे पैसे ऐंठे गए.
इसके बाद कारोबारी के भतीजे को बनाया शिकार
जब अरविंद अग्रवाल से बड़ी रकम वसूल ली गई तो आरोपियों ने परिवार की अगली पीढ़ी को निशाना बनाया. जून 2025 में मनीष कुमार इस बार खुद को एंटी करप्शन ब्यूरो झांसी का इंस्पेक्टर बताकर दिवंगत रोहित अग्रवाल के बेटे प्रियांश सिंघल की दुकान पर पहुंचा.
उसने दावा किया कि प्रियांश के दिवंगत पिता पर प्रोफेसर का सोना बकाया है और इसकी शिकायत एंटी करप्शन ब्यूरो तक पहुंच चुकी है. गिरफ्तारी और बदनामी का डर दिखाकर जून से अगस्त 2025 के बीच प्रियांश सिंघल से भी करीब 29 लाख 50 हजार रुपये वसूल लिए गए.
इस तरह दोनों कारोबारियों से कुल 1 करोड़ 9 लाख 50 हजार रुपये की उगाही कर ली गई. इस दौरान आरोपी लगातार खुद को वरिष्ठ अधिकारी बताकर रौब झाड़ता रहा और किसी को उसकी असलियत का अंदाजा नहीं हुआ.
एक शिकायत ने खोल दी पूरे खेल की पोल
पूरे मामले का खुलासा तब हुआ जब कलेक्ट्रेट में हुई एक मुलाकात के दौरान प्रियांश सिंघल ने सीधे प्रोफेसर अशोक कुमार गुप्ता से उस अधिकारी की शिकायत कर दी, जो लगातार उनसे पैसे मांग रहा था. यह सुनते ही प्रोफेसर ने मनीष कुमार को पहचानने से ही इनकार कर दिया.
यहीं से प्रियांश को पूरे मामले पर शक हुआ. उन्होंने खुद झांसी जाकर पड़ताल की तो पता चला कि संबंधित विभाग में मनीष कुमार नाम का कोई अधिकारी ही नहीं है. इसके बाद पूरे मामले की शिकायत पुलिस से की गई.
10 जून को पुलिस ने जाल बिछाया. प्रियांश सिंघल ने आरोपी को पैसे देने के बहाने बुलाया और जैसे ही मनीष मौके पर पहुंचा, सादे कपड़ों में मौजूद पुलिस टीम ने उसे गिरफ्तार कर लिया.
बैंक खाते, संपत्तियां और नेटवर्क खंगाल रही पुलिस
पूछताछ में कई चौंकाने वाले खुलासे सामने आए हैं. पुलिस के अनुसार ठगी से मिली रकम का इस्तेमाल जमीन खरीदने और लग्जरी वाहनों में निवेश करने के लिए किया गया. अब आरोपी के बैंक खातों, संपत्तियों, कॉल डिटेल और पूरे नेटवर्क की गहन जांच की जा रही है.
पुलिस ने रिटायर्ड प्रोफेसर अशोक कुमार गुप्ता के खिलाफ भी मामला दर्ज कर लिया है. उनकी भूमिका की जांच जारी है और यह पता लगाया जा रहा है कि इस पूरे रैकेट में और कौन-कौन लोग शामिल थे.