पश्चिम में ऐतिहासिक लेखन में उत्कृष्टता को सम्मानित करने वाले कई प्रतिष्ठित पुरस्कार हैं, पर भारत में इस विधा को सम्मानित करने के लिए अब तक कोई पुरस्कार नहीं था. इस कमी को फाउंडेशन फॉर इंडियन हिस्टोरिकल एंड कल्चरल रिसर्च FIHCR ने पूरा किया है. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने प्रथम डॉ एसएल भैरप्पा स्मृति व्याख्यान देते हुए यह बात कही. वित्त मंत्री ने इंडिया हैबिटेट सेंटर ने प्रथम एफआईएचसीआर वार्षिक इतिहास पुरस्कार समारोह के दौरान बतौर मुख्य अतिथि शिरकत की और विजेताओं को पुरस्कार प्रदान किए. इस अवसर पर फाउंडेशन फॉर इंडियन हिस्टोरिकल एंड कल्चरल रिसर्च ओला फाउंडेशन की अध्यक्ष राजलक्ष्मी अग्रवाल विशिष्ट अतिथि थीं.
डॉ एसएल भैरप्पा स्मृति व्याख्यान की शुरुआत करते हुए सीतारमण ने भारत की बौद्धिक आज़ादी के लिए सदी भर चले संघर्ष का ज़िक्र किया और डॉ भैरप्पा के काम में इतिहास, आस्था और सभ्यतागत यादों से जुड़ी बेबाक सोच को नमन किया. उन्होंने कहा कि उनकी सबसे बड़ी सीख यह थी कि सच किसी विचारधारा या संस्था का नहीं होता, बल्कि उन लोगों का होता है जिनमें उसे खोजने का साहस होता है.
वित्तमंत्री ने एफआईएचसीआर द्वारा ऐतिहासिक लेखन में उत्कृष्टता को सम्मानित करने के इस प्रयास की सराहना की. उन्होंने कहा कि यह वार्षिक इतिहास पुरस्कार देश में इस क्षेत्र में योग्यताओं को सम्मानित करने में अब तक हुई कमी को दूर करेगा. यह सम्मान चार श्रेणियों में प्रदान किया जा रहा है. भारतीय इतिहास के लिए 10 लाख रुपये का आरसी मजूमदार पुरस्कार, भारतीय ऐतिहासिक कथा-साहित्य के लिए 5 लाख रुपये का एसएल भैरप्पा पुरस्कार, बच्चों के लिए ऐतिहासिक लेखन श्रेणी के लिए 3 लाख रुपये का अनंत पई पुरस्कार और बच्चों के लिए भारतीय ऐतिहासिक लेखन में चित्रांकन के लिए 2 लाख रुपये का अनंत पई पुरस्कार शामिल है.
समारोह में बोलते हुए एफआईएचसीआर के संस्थापक-निदेशक डॉ विक्रम संपत ने कहा, “आज पहली बार हमने एक विचार को व्यवहार में उतारा है- एक इतिहासकार को उनकी समझौता-रहित विद्वत्ता के लिए, एक उपन्यासकार को कठिन सत्यों को कहने के साहस के लिए, और एक लेखक-चित्रकार की जोड़ी को उस इतिहास को हमारे बच्चों के लिए जीवंत बनाने के लिए सम्मानित किया. उन्होंने कहा कि डॉ आरसी मजूमदार, डॉ एसएल भैरप्पा और अनंत पई; तीनों ने अपने-अपने क्षेत्र में सत्य के बजाय स्वीकृति प्राप्त करने के लिए लिखने के मोह का प्रतिरोध किया, और यही वह मानदंड है जिसकी एफआईएचसीआर वार्षिक इतिहास पुरस्कार वर्ष-दर-वर्ष रक्षा और सम्मान करेगा. चयनित सभी प्रविष्टियां, साथ ही अंतिम विजेता और विशेष उल्लेख प्राप्त करने वाली कृतियां, आज भारत में ऐतिहासिक लेखन के बेहतरीन उदाहरण हैं.
उन्होंने मुख्य अतिथि, सभी आमंत्रित अतिथि, प्रायोजक ओला फाउंडेशन, जूरी और विजेता लेखकों का उपस्थिति के लिए आभार व्यक्त किया.
राजलक्ष्मी अग्रवाल ने कहा कि एफआईएचसीआर द्वारा भारतीय इतिहास के लेखन में उत्कृष्टता का उत्सव मनाने के प्रयास का समर्थन करते हुए ओला फाउंडेशन को प्रसन्नता हो रही है. इस तरह के पुरस्कार स्थापित और उभरती, दोनों तरह की आवाज़ों को हमारे अतीत के साथ गंभीरता से जुड़ने के लिए प्रोत्साहित करते हैं और हमें इसके प्रथम संस्करण से जुड़ने पर गर्व है.”
याद रहे कि इस सम्मान के उद्घाटन संस्करण को प्रकाशन जगत की ओर से उत्साहपूर्ण भागीदारी मिली, जिसमें लगभग 250 प्रविष्टियां प्राप्त हुईं. इन प्रविष्टियों की सावधानीपूर्वक छंटाई कर एक एक लंबी सूची तैयार की गई और इसके बाद जूरी ने अंतिम विजेताओं का निर्णय किया.

जूरी द्वारा सर्वसम्मति से चुने गए प्रथम एफआईएचसीआर (FIHCR) वार्षिक इतिहास पुरस्कार के विजेता:
आरसी मजूमदार पुरस्कार (भारतीय इतिहास): इंडिया रीबॉर्न- प्रसेनजीत के बसु
विशेष उल्लेख: हिंदू हीरोज़ ऑफ मेडिवल भारत- चांदनी सेनगुप्ता
जूरी: डॉ शांतिश्री धूलिपुड़ी पंडित (अध्यक्ष), डॉ हिंडोल सेनगुप्ता और गौतम चिकरमाने
एसएल भैरप्पा पुरस्कार (भारतीय ऐतिहासिक कथा-साहित्य): द चोला टाइगर्स-अमीश त्रिपाठी
विशेष उल्लेख: डॉटर ऑफ टू रिवर्स, अरुण कृष्णन द्वारा
जूरी: विनीता दावरा नांगिया (अध्यक्ष), शिनी एंटनी, और कुलप्रीत यादव
अनंत पई पुरस्कार (लेखक श्रेणी): रिवोल्यूशनरीज़: फाइट फॉर फ्रीडम- संजीव सान्याल
विशेष उल्लेख: फैसिनेटिंग महाराजाज़ ऑफ इंडिया- श्रीलता मेनन
जूरी: शोभा विश्वनाथ (अध्यक्ष), अलो पाल और आनंद नीलकंठन
अनंत पई पुरस्कार (चित्रकार श्रेणी):
राम कुमार: बिटवीन द लाइन्स- तपोशी घोषाल द
विशेष उल्लेख: कलर्स ऑफ होम- एवा सांचेज़ गोमेज़
जूरी: डॉ शिल्पा रानाडे (अध्यक्ष), साई स्वरूपा और सुविधा मिस्त्री