आपके भी दोस्त, रिश्तेदार या घर वाले अक्सर आपको टोकते होंगे कि यार तुम फोन नहीं करते! अगर हां तो ज्यादा लोड मत लीजिए, ये आपकी या हमारी ही गलती नहीं है. बल्कि ये पूरी जेनरेशन का फंडा है. और वो भी जेनरशन जी का फंडा. क्यूंकि जेन-जी भी फोन नहीं करता है और अचानक आई किसी फोन कॉल से पैनिक में ही चला जाता है.
सीधी-सी बात है कि डिजिटल दौर में बातचीत का तरीका तेजी से बदला है. जो फोन कॉल कभी सबसे आसान और सीधा जरिया मानी जाती थी, वही अब नई पीढ़ी यानी जनरेशन जी के बीच घबराहट और तनाव की वजह बन रही है.
कई रिपोर्ट्स ऐसी मिलती हैं, जहां ये दावा है कि जेनरेशन जी एक ऐसे माहौल की तरफ बढ़ रही है जहां सीधी आवाज वाली बातचीत के बजाय टेक्स्ट संदेशों को ज्यादा तरजीह दी जा रही है. तकनीकी दुनिया में इस स्थिति को टेलीफ्रोबिया या फोन कॉल एंग्जाइटी कहा जा रहा है. किसी फोन की घंटी बजते ही स्क्रीन देखकर ठिठक जाना, कॉल काटने के बाद तुरंत 'क्या हुआ?' या 'सब ठीक है?' का मैसेज भेजना अब आम होता जा रहा है.
अचानक आई कॉल से होती है घबराहट
CNBC के एक सर्वे के हवाले से वायरल हुई रिपोर्ट के मुताबिक लगभग 75 प्रतिशत जेन-जी के युवा अनजान या अचानक आई फोन कॉल से बचते हैं. उनके लिए अचानक आने वाली कॉल किसी अनहोनी या अनचाही स्थिति जैसा अहसास कराती है.
फोन कॉल से बचने के पीछे युवाओं के अपने तर्क भी हैं. मनोचिकित्सकों और रिपोर्टों के विश्लेषण में कहा गया है कि फोन कॉल रियल टाइम प्रतिक्रिया मांगती है. इसमें तुरंत जवाब देना होता है और बिना तैयारी के बातचीत में गलती होने का डर बना रहता है.
इसके उलट व्हाट्सऐप, इंस्टाग्राम डीएम और टेक्स्ट मैसेजिंग युवाओं को अपनी बात सोचने, ड्राफ्ट करने और एडिट करने का समय और नियंत्रण देती है. टेक्स्ट मैसेजिंग उनके लिए बिना सामाजिक दबाव के बातचीत पूरी करने का एक सुरक्षित दायरा बनाती है.
इसी वजह से वॉइस नोट्स भी ज्यादा लोकप्रिय हो रहे हैं. इनमें आवाज तो होती है, लेकिन सामने वाले की तुरंत प्रतिक्रिया देने का मानसिक दबाव नहीं रहता. लगातार आने वाले नोटिफिकेशंस के बीच फोन कॉल कई युवाओं को एक अनचाहा हस्तक्षेप भी लगती है.
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प्रोफेशनल लाइफ में दिख रहा है असर
इसका असर अब प्रोफेशनल लाइफ में भी दिख रहा है. बिजनेस इनसाइडर और लिंक्डइन जैसी प्रोफेशनल साइट्स पर इस बात को लेकर बहस तेज है कि युवा पेशेवर फोन पर बातचीत से दूरी बनाकर अनजाने में नुकसान उठा रहे हैं. वर्कप्लेस पर सीनियर मैनेजर्स और क्लाइंट्स अक्सर तुरंत समाधान के लिए त्वरित कॉल को प्राथमिकता देते हैं, जबकि जनरेशन जेड के कर्मचारी ईमेल या चैट पर टिके रहना चाहते हैं.
कामकाजी माहौल में फोन एंग्जाइटी की वजह से नए कर्मचारियों के लिए नेटवर्क बनाना, इंटरव्यू देना और क्लाइंट्स से संबंध बनाना मुश्किल हो रहा है. करियर विशेषज्ञों का मानना है कि केवल मैसेज पर निर्भर रहने से कम्युनिकेशन गैप बढ़ रहा है और कई प्रोफेशनल मौके छूट रहे हैं.
बढ़ती समस्या को देखते हुए अब कुछ पहल भी शुरू हुई हैं. यूनाइटेड किंगडम और अमेरिका के कई कॉलेज और विश्वविद्यालय अब छात्रों के लिए फोन एटीकेट के मॉड्यूल और वर्कशॉप चला रहे हैं. इनमें मॉक कॉल, रोल प्लेइंग और प्रोफेशनल हालात के जरिए फोन पर आत्मविश्वास के साथ बात करने का अभ्यास कराया जा रहा है.
मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ भी धीरे धीरे एक्सपोजर देने की सलाह देते हैं. उनके मुताबिक शुरुआत दोस्तों या परिवार के लोगों से छोटी फोन कॉल से की जा सकती है, बात करने से पहले मुख्य बिंदु कागज पर लिखे जा सकते हैं और फिर धीरे धीरे प्रोफेशनल कॉल की तरफ बढ़ा जा सकता है.
कुल मिलाकर जेन-जी का यह व्यवहार आलस नहीं, बल्कि उस डिजिटल संस्कृति का असर बताया जा रहा है जिसमें वे बड़े हुए हैं. यह नया मॉडल व्यक्तिगत आजादी और मानसिक शांति को प्राथमिकता देता है, लेकिन व्यावहारिक दुनिया में फोन कॉल की अहमियत पूरी तरह खत्म नहीं हुई है. ऐसे में आने वाले समय में इसी संतुलन को बनाना इस पीढ़ी के सामने सबसे बड़ी चुनौती और उसी का संभावित समाधान माना जा रहा है.