Why Chips Packet Are Half Empty: बच्चे हों या बड़े, चिप्स एक ऐसी चीज है, जो दोनों ही बड़े चाव से खाते हैं. लेकिन अक्सर जब भी दुकान से चिप्स का बड़ा-सा पैकेट खरीदकर जैसे ही उसे खोलते हैं, तो उन्हें निराशा हाथ लगती है. चिप्स का पैकेट चाहे ₹10, ₹20 या फिर ₹35 उसका आधा खाली होना मानो तय होता है. ऐसे में उस खाली पैकेट को देखकर सबसे पहला ख्याल यही आता है कि 'इतनी हवा और इतने कम चिप्स!'
कई लोगों को लगता है कि कंपनियां जानबूझकर बड़े पैकेट में कम चिप्स भरकर ग्राहकों को धोखा देती हैं.
क्या आप भी उन्हीं में से हैं, जो चिप्स का आधा खाली पैकेट देखकर मन में सोचते हैं कि कंपनी ने उन्हें बेवकूफ बनाया है? अगर हां, तो आपका जानना जरूरी है कि ऐसा नहीं है. सच्चाई इससे बिल्कुल अलग है. जिस खाली जगह को आप बेकार समझते हैं, वही आपके चिप्स को कुरकुरा और लंबे समय तक सुरक्षित रखने या यूं कहें कि खराब होने से बचाने का सबसे बड़ा कारण होती है. अगर पैकेट पूरी तरह चिप्स से भर दिया जाए, तो रास्ते में हल्का-सा दबाव पड़ते ही ज्यादातर चिप्स टूटकर चूरा बन सकते हैं.
पैकेट में हवा नहीं, होती है खास गैस
सबसे पहले ये जान लीजिए कि चिप्स के पैकेट में नॉर्मल हवा बिल्कुल भी भरी नहीं होती है. इसमें एक खास तरह की गैस भरी होती है, जिसका नाम नाइट्रोजन होता है. ये बेरंग (ट्रांलपेरेंट) होती है और इसमें किसी तरह की कोई महक भी नहीं होती है. ऐसे में ये खाने के साथ आसानी से रिएक्ट नहीं करती है.
अगर पैकेट में ऑक्सीजन होती, तो चिप्स में मौजूद तेल जल्दी खराब होने लगता. इससे चिप्स का स्वाद, खुशबू और कुरकुरापन खत्म हो सकता था. नाइट्रोजन गैस इस समस्या से बचाती है और चिप्स लंबे समय तक ताजे बने रहते हैं.
चिप्स टूटने से बचाने का भी करती है काम
चिप्स बहुत नाजुक होते हैं. फैक्ट्री से दुकान तक पहुंचने के दौरान पैकेट कई बार इधर-उधर होते, कई तरह की पेटियों में ट्रांसफर किए जाते हैं. ऐसे में पैकेट के अंदर चिप्स को चूरा होने से बचाने का काम भी नाइट्रोडन गैस ही करती है. पैकेट के अंदर मौजूद नाइट्रोजन गैस एक कुशन की तरह काम करती है. इससे झटकों का असर कम होता है और चिप्स टूटकर चूरा बनने से बच जाते हैं. अगर पैकेट पूरी तरह चिप्स से भरा होता, तो घर पहुंचते-पहुंचते ज्यादातर चिप्स टूट चुके होते.
फिर छोटा पैकेट क्यों नहीं बनाते?
एक और सवाल है, जो लगभग हर किसी के मन में आता है. वो है कि आखिर फिर चिप्स का पैकेट छोटा क्यों नहीं बनाया जाता है. इसका जवाब ये है कि पैकेट की शेप सिर्फ चिप्स की मात्रा देखकर तय नहीं की जाती है.
पैकेजिंग इस तरह बनाई जाती है कि चिप्स सुरक्षित रहें, मशीनों से आसानी से पैक हो सकें, ट्रांसपोर्ट में नुकसान न हो, अलग-अलग तरह के चिप्स के लिए पर्याप्त जगह मिल सके. इस बात को याद रखना बहुत जरूरी है कि चिप्स गिनकर नहीं बल्कि वजन से बिकते हैं. बहुत से लोग पैकेट का साइज देखकर अंदाजा लगाते हैं कि उसमें ज्यादा चिप्स होंगे. लेकिन कंपनियां चिप्स वजन (नेट वेट) के हिसाब से बेचती हैं, न कि पैकेट कितना भरा हुआ दिख रहा है. यानी अगर पैकेट पर 50 ग्राम लिखा है, तो उसमें 50 ग्राम चिप्स ही होंगे, चाहे पैकेट बड़ा दिखाई दे या छोटा.
क्या कंपनियां ग्राहकों को धोखा देती हैं?
बड़ा पैकेट देखकर ज्यादा चिप्स होने का एहसास जरूर हो सकता है, लेकिन पैकेट के अंदर छोड़ी गई खाली जगह का मतलब ग्राहकों को धोखा देना बिल्कुल नहीं है. ऐसे में कंपनियां किसी भी ग्राहक को बेवकूफ नहीं बनाती हैं. पैकेट को खाली छोड़ने के पीछे उनकी मंशा सिर्फ चिप्स को लंबे समय तक फ्रेश रखने, कुरकुरापन बनाए रखने, ट्रांसपोर्ट के दौरान टूटने से बचाने और चिप्स की शेल्फ लाइफ बढ़ाने की होती है.