
इंटरनेट पर इन दिनों फूड डिलीवरी ऐप्स से पैसे बचाने का एक अनोखा और शातिर हैक खूब वायरल हो रहा है. सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बने इस नए तरीके में लोग भारी-भरकम चार्जेस और बिल से बचने के लिए एक मजेदार तरकीब अपना रहे हैं.
क्या है वायरल तरकीब
इसमें किसी डिलीवरी ऐप पर एक छोटा सा ऑर्डर दें (जैसे एक रोटी का) और फिर रेस्टोरेंट को फोन करके कहें कि इसे आपके एक बहुत बड़े ऑफलाइन ऑर्डर के साथ मिला दे. अगर आप सोच रहे हैं कि इससे पीछे मकसद क्या है तो आपको बता दें कि इस जुगाड़ का सीधा मकसद फूड ऐप्स के हैवी कमीशन, जीएसटी और डिलीवरी चार्ज से बचना है.
चलिए हम आपसे पूछते हैं कि ऑनलाइन खाना ऑर्डर करते समय कुछ पैसे बचाने के लिए आप किस हद तक जा सकते हैं? आप जोमैटो (Zomato) और स्विगी (Swiggy) के बीच स्विच करते हैं, यह देखने के लिए कि वही बर्गर कहां सस्ता मिल रहा है. आप किसी एक कूपन कोड को चुनने से पहले तीन-तीन कूपन कोड आजमाते हैं. या फिर आपको अचानक याद आता है कि एक खास क्रेडिट कार्ड पर खाने की डिलीवरी पर 10% कैशबैक मिलता है. कभी-कभी आप उस दोस्त को भी फोन कर लेते हैं जिसके पास कोई कूपन कार्ड होता है.
लेकिन यह नया पैंतरा इन सभी पुराने तरीकों से चार कदम आगे है. यह उन कस्टमर्स के लिए एक नया हथियार बन गया है जो कंपनियों के बढ़ते प्लेटफॉर्म चार्ज और हिडन कॉस्ट से परेशान हो चुके हैं. लेकिन ये कितना नैतिक है और इससे वाकई कुछ हासिल होने वाला है भी या नहीं, ये हम आपको बताने जा रहे हैं.
कम पैसों में कैसे मिलेगा ज्यादा खाना
इसका आइडिया बहुत सीधा-सादा है. जोमैटो या स्विगी पर 40 रुपये की एक रोटी ऑर्डर करें. फिर सीधे रेस्टोरेंट को फोन करें. पनीर बटर मसाला, दाल मखनी, बटर नान, बिरयानी, गुलाब जामुन. यानी पूरे परिवार के लिए रात का पूरा खाना ऑर्डर करें और रेस्टोरेंट को UPI के जरिए अलग से पेमेंट करें. फिर उनसे कहें कि वो यह सारा खाना उस एक छोटे से जोमैटो ऑर्डर के साथ पैक कर दें. डिलीवरी राइडर आता है, पार्सल उठाता है और आपको पूरी दावत वाला खाना डिलीवर कर देता है. इस बीच जोमैटो को सिर्फ उस एक 40 रुपये वाली रोटी पर ही कमीशन मिलता है.

इस वायरल हैक को लेकर इंटरनेट दो धड़ों में बंट गया है. जहां कुछ लोग इसे स्मार्ट सेविंग तो वहीं कुछ इसे एथिक्स के खिलाफ और कंपनियों के साथ धोखा मान रहे हैं. कई लोगों का तो यह भी कहना है कि अगर यह ट्रेंड बढ़ा तो फूड डिलीवरी कंपनियों की नींद उड़ना तय है.
जाहिर है कि कंपनियों के इस बड़े लूपहोल की हकीकत जानने के लिए हमने भी इस हैक को खुद ग्राउंड पर टेस्ट करने का फैसला किया है इसलिए हमने पूरे दिल्ली-NCR में रेस्टोरेंट को फोन करना शुरू किया और लगभग तुरंत ही हमें एहसास हो गया कि यह कोई आसान काम नहीं था.
हर कोशिश की शुरुआत अजीब तरह से होती थी. 'हेलो भैया, एक रिक्वेस्ट है.' फिर बात समझानी पड़ती थी. फिर कन्फ्यूजन होता था. फिर चुप्पी छा जाती थी. कभी-कभी तो शक भी होता था. कुछ रेस्टोरेंट ने तो हमारी बात पूरी होने से पहले ही मना कर दिया.
ध्यान रखनी होंगी ये चीजें
यहां सबसे जरूरी बात यह है कि जिसका जिक्र किसी ने भी ऑनलाइन नहीं किया था. यह ट्रिक हर जगह एक जैसी काम नहीं करती. असल में कई रेस्टोरेंट में तो इसका कोई मतलब ही नहीं बनता. कई जगहों पर बात करने के बाद हमें यह बात समझ आई.
इस ट्रिक के काम करने के लिए आपको सबसे पहले एक ऐसा रेस्टोरेंट ढूंढ़ना होगा जो क्लाउड किचन न हो क्योंकि क्लाउड किचन ज्यादातर डिलीवरी प्लेटफॉर्म पर ही निर्भर रहते हैं और शायद ही कभी सीधे तौर पर कम कीमत पर खाना देते हैं.
इसके अलावा वो रेस्टोरेंट जो अपनी खुद की डिलीवरी टीम न रखता हो क्योंकि जिन रेस्टोरेंट के पास अपनी डिलीवरी टीम होती है, वे किसी एग्रीगेटर को बीच में लाने के बजाय पूरा ऑर्डर खुद ही संभालना पसंद करते हैं.
इसके अलावा यह कोई ऐसी जगह नहीं है जो हर बिल का सख्ती से रिकॉर्ड रखती हो और सब पर एक जैसा टैक्स लगाती हो, क्योंकि ऐसी जगहों पर इस तरह का इंतजाम होने की संभावना कम ही होती है. अगर वो ऐसा करते भी हैं तो भी आपको ऑफलाइन ऑर्डर पर GST देना ही पड़ता है.
प्रीमियम रेस्टोरेंट के सहयोग करने की संभावना तो और भी कम होती है क्योंकि वे आमतौर पर ज्यादा सख्त SOPs, एक जैसे बिलिंग सिस्टम और ज्यादा ऑर्डर वॉल्यूम के साथ काम करते हैं.
इसके अलावा ऑफलाइन मेन्यू की कीमतें ऑनलाइन मेन्यू से सस्ती होती हैं. ग्राहक को असली बचत यहीं से होती है. याद रखें कि आप प्लेटफॉर्म फीस और डिलीवरी चार्ज तो देते ही हैं. चाहें आपका ऑर्डर सिर्फ एक रोटी का हो या पूरे 1,500 रुपये के खाने का. असली बचत तो सिर्फ ऑनलाइन मेन्यू की बढ़ी हुई कीमतों से बचकर ही होती है.
और सच कहूं तो यह शर्तों की एक बहुत लंबी लिस्ट है.
रेस्टोरेंट ने कैसे प्रतिक्रिया दी
इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि कई रेस्टोरेंट ने हमारे इस अनुरोध को ठुकरा दिया कि वे एक बड़े ऑफलाइन ऑर्डर को एक छोटे से ऑनलाइन ऑर्डर के साथ मिला दें.
एक कोरियन रेस्टोरेंट, जिसे हमने फोन किया था, उसने तुरंत इस रिस्क की ओर इशारा किया. उन्होंने हमसे कहा, डिलीवरी एग्जीक्यूटिव हमारी शिकायत कर सकता है.
कई रेस्टोरेंट ने तो बस इतना ही कहा, 'मैम, आप ऐप पर नॉर्मली ऑर्डर कर दीजिए.'
RK पुरम में बिरयानी ज्वॉइंट ने हमसे कहा कि वो ये सिरदर्द मोल नहीं लेना चाहते. मालिक ने कहा, 'हम पहले से ही बहुत ज्यादा ऑर्डर लेते हैं. बेवजह की उलझन क्यों पैदा करें? अगर कोई चीज छूट जाती है तो उसे कौन संभालेगा. कम से कम ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए हर चीज ठीक से रिकॉर्ड हो जाती है.'
लेकिन एक रेस्टोरेंट बिहार कुजीन ईटरी ने हमारी बात को लगभग तुरंत ही पूरी तरह से समझ लिया और इस आइडिया के लिए पूरी तरह से तैयार हो गया.

ऑर्डर बहुत ही सीधा-सादा था. 4 पोर्शन मटन करी जिसकी कीमत 280 रुपये थी और 4 पोर्शन राइस जिनमें से हर एक की कीमत 60 रुपये थी.
अब यहां आता है मजेदार पार्ट.... जब मैंने Zomato कार्ट में एक पोर्शन राइस ऐड किया और बाकी सब कुछ सीधे रेस्टोरेंट से ऑर्डर किया तो कुल बिल 1,432 रुपये आया. लेकिन जब मैंने पूरा ऑर्डर ऐप में सामान्य तरीके से डाला तो Zomato ने अपने-आप 200 रुपये की छूट दे दी और कुल बिल घटाकर 1,279 रुपये कर दिया.
तो उस सो कॉल्ड वायरल ट्रिक को आजमाने की कोशिश में मैं असल में पैसे बचाने के बजाय 153 रुपये गंवा रही थी.
हां एग्रीगेटर कमीशन से बचकर रेस्टोरेंट ज्यादा कमा सकता था लेकिन एक ग्राहक के तौर पर इसका कोई फायदा नहीं था.
इस बीच नोएडा के एक रेस्टोरेंट ने हमसे साफ-साफ कह दिया कि हम या तो पूरा ऑर्डर ऑफलाइन करें या फिर ऑनलाइन. डिलीवरी वाला कोई न कोई दिक्कत खड़ी कर देगा.
और ये डर सही निकला.....
क्या डिलीवरी एग्जीक्यूटिव कोई दिक्कत खड़ी कर सकते हैं?
Swiggy के एक पुराने कर्मचारी ने हमें बताया कि तकनीकी तौर पर डिलीवरी एग्जीक्यूटिव को यह चेक करना होता है कि क्या आइटम ऐप में दिखाए गए ऑर्डर से मोटे तौर पर मेल खाते हैं. उन्होंने कहा, 'अगर चीजें मेल नहीं खातीं तो उन्हें सपोर्ट टीम को इसकी जानकारी देनी होती है.'
अगर प्लेटफॉर्म को लगता है कि रेस्टोरेंट बार-बार कमीशन देने से बच रहे हैं जबकि वो उनके लॉजिस्टिक्स नेटवर्क का इस्तेमाल कर रहे हैं तो रेस्टोरेंट पर जुर्माना लग सकता है या उन्हें लिस्ट से हटाया भी जा सकता है.
लेकिन जिन राइडर्स से हमने बात की, उनका नजरिया अलग था. एक डिलीवरी एग्जीक्यूटिव ने कहा, 'सब कुछ सील होता है. हम पैकेट खोलकर उनकी जांच नहीं कर सकते.'
फिर भी उन्होंने माना कि कभी-कभी यह गड़बड़ी साफ-साफ दिख जाती है.
अगर ऐप में 150 रुपये का ऑर्डर दिखता है और कोई खाने के तीन बड़े-बड़े बैग थमा देता है तो इसे नजरअंदाज करना मुश्किल होता है. ऐसे में राइडर के पास दो ही रास्ते होते हैं. इसे नजरअंदाज करके आगे बढ़ जाए या इसकी रिपोर्ट करे.
दिलचस्प बात यह है कि राइडर्स को दोनों ही सूरतों में न तो ज्यादा फायदा होता है और न ही ज्यादा नुकसान. उनकी कमाई ज्यादातर डिलीवरी की दूरी पर निर्भर करती है. न कि पैकेट के अंदर रखे खाने की कीमत पर.
इसलिए उनमें से कई लोगों को इसमें दखल देना फायदेमंद नहीं लगता. जब तक कि गड़बड़ी बहुत ज्यादा साफ-साफ न दिख रही हो.
तो क्या आपके पैसे बचते हैं?
ठीक है मान लेते हैं कि आपको कोई ऐसा रेस्टोरेंट मिल जाता है जहां ऑफलाइन कीमतें कम हैं और फूड डिलीवरी ऐप ने भी आपको कोई डिस्काउंट नहीं दिया है तो हो सकता है कि आपके कुछ पैसे बच जाएं. लेकिन इसकी गुंजाइश कम है. जैसा कि हमने खुद पाया.
हमने मशहूर छोटा सा ऑर्डर देने की कोशिश की. एक रोटी. कीमत: 40 रुपये. फीस वगैरह मिलाकर आखिर में कुल कितने पैसे देने पड़े. 117 रुपये. यानी हैक शुरू होने से पहले ही करीब 80 रुपये तो यूं ही खर्च हो गए.
फिर फोन कॉल के जरिए असली ऑर्डर करने की कोशिश की जिसमें दाल मखनी, बटर चिकन, एक्स्ट्रा रोटियां. इसमें वास्तविक बचत लगभग 80 रुपये थी. बस इतना ही. क्या हमने ऑर्डर दे दिया? नहीं, यह इसके लायक नहीं लगा. मुझे लगा कि मैं भोजन की गुणवत्ता से समझौता कर रही हूं क्योंकि उस रेस्टोरेंट को 3.5 स्टार रेटिंग भी नहीं मिली थी.
लेकिन साफ सवाल है कि क्या 100 रुपये की बचत वाकई में डिनर को एक खोज में बदलने लायक है?
क्योंकि यह प्रक्रिया थका देने वाली है. सबसे पहले आपको रेस्तरां से सहमति लेनी होगी. फिर आपको पूरी बात समझानी होगी. फिर आप ऐप ऑर्डर अलग से दें. फिर पैकेजिंग का कॉर्डिनेशन. फिर ये उम्मीद कि आपका खाना लेकर आ रहा राइडर इस पर सवाल नहीं उठाएगा और ये उम्मीद है कि कुछ भी गलत नहीं होगा.
इसके अंत तक आपको ऐसा महसूस होता है जैसे आपने लगभग बिना किसी बड़े फायदे के बड़ी चोरी को अंजाम दिया है.
इस बीच कई लोगों ने यह भी पहले ही सोचना करना शुरू कर दिया है कि फूड डिलीवरी प्लेटफॉर्म इसे कैसे रोक सकते हैं. कुछ लोगों ने सुझाव दिया कि सवारियों को पैकेट के बाहर चिपकाए गए इनवॉइस को चेक करना चाहिए. कुछ ने कहा कि रेस्तरां को डिलीवर करने से पार्सल की तस्वीर लेकर भेजने के लिए कहा जा सकता है. कुछ लोगों ने तर्क दिया कि कम कीमत के ऑर्डर पर बड़ा पैकेज खुद ही सबकुछ साफ-साफ बता सकता है.
हमने जोमैटो से पूछा कि क्या वो इसे खतरे के रूप में देखते हैं तो उन्होंने इस सवाल का जवाब देने से इनकार कर दिया.
लेकिन इसे स्वयं आजमाने के बाद यहां सबसे बड़ी सीख यह है कि यह एक क्रांतिकारी जुगाड़ कम और असुविधाजनक जुगाड़ ज्यादा है. हां यह कभी-कभी काम करता है और कुछ रेस्तरां इच्छुक भी रहते हैं जिससे आप थोड़े से पैसे बचा सकते हैं. लेकिन जब तक आप इस पूरे ऑपरेशन को अपने अंजाम तक पहुंचा लेते हैं तो उस समय आपको सामान्य ऑर्डरिंग ज्यादा बेहतर और आरामदायक लगने लगती है.