भारत अपनी अलग-अलग संस्कृति और अनोखे खान-पान के लिए दुनियाभर में जाना जाता है. देश के कई हिस्सों में ऐसे पारंपरिक व्यंजन बनाए जाते हैं जिनके बारे में सुनकर हर कोई हैरान रह जाता है. इन्हीं में से एक है लाल चींटी की चटनी जिसे ओडिशा के मयूरभंज जिले और छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में बहुत चाव से खाया जाता है. इसे मयूरभंज की काई चटनी भी कहा जाता है.
क्यों चींटी की चटनी है खास
ये चटनी लाल बुनकर चींटियों जिन्हें वैज्ञानिक भाषा में ओकोफिला स्माराग्डिना कहा जाता है, उससे बनती है. इसे मयूरभंज काई चटनी भी कहते हैं. इस चटनी को 2 जनवरी 2024 को ज्योग्राफिकल इंडिकेशन (GI) टैग मिला. इसे यह दर्जा सिमलीपाल के जंगलों में इसकी खास भौगोलिक उत्पत्ति, आदिवासी समुदायों द्वारा इसे बनाने के अनोखे पारंपरिक तरीकों, बेमिसाल स्वाद, औषधीय गुणों, पोषक तत्वों और गहरी सांस्कृतिक विरासत के कारण मिला.
'द हिंदू' की रिपोर्ट के अनुसार, ये चटनी प्रोटीन, कैल्शियम, जिंक, विटामिन B-12, आयरन, मैग्नीशियम, पोटेशियम, सोडियम, कॉपर, फाइबर और 18 अमीनो एसिड से भरपूर होती है जो इम्यून सिस्टम को मजबूत करने और बीमारियों को दूर रखने के लिए जानी जाती है.
सेहत के लिए क्यों खास है लाल चींटी की चटनी?
लाल चींटियों के शरीर में प्राकृतिक रूप से फॉर्मिक एसिड होता है जो इस चटनी को बिना नींबू या अमचूर के ही एक अनोखी तीखी और खट्टी रंगत देता है.
इसमें भरपूर मात्रा में प्रोटीन, जिंक, आयरन और विटामिन B-12 पाया जाता है, जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को कई गुना बढ़ा देता है.
बस्तर और ओडिशा के आदिवासियों का मानना है कि इस चटनी के सेवन से सर्दी-जुकाम, फ्लू, जोड़ों के दर्द और यहां तक कि डेंगू व मलेरिया जैसी बीमारियों से राहत मिलती है.
कैसे बनाते हैं चींटी की चटनी
जंगलों में साल या आम के पेड़ों से लाल चींटियों और उनके घोंसलों (अंडों सहित) को सावधानी से इकट्ठा किया जाता है. इसके बाद इन्हें साफ करके पत्तों और तिनकों से अलग किया जाता है.
साफ की गई चींटियों और उनके अंडों को ठंडे पानी से हल्का धोकर छान लिया जाता है ताकि किसी तरह की धूल-मिट्टी न रहे.
इसके बाद सिलबट्टे पर लाल चींटियों को हरी मिर्च, लहसुन, अदरक, हरी धनिया और नमक के साथ पीसा जाता है. इसे मिक्सी की जगह सिलबट्टे पर ही पीसा जाता है ताकि इसका प्राकृतिक स्वाद और पोषण बना रहे. इसे लोग अलग-अलग चीजों जैसे रोटी, चावल के साथ खाते हैं.