लोगों से ज़रूरत पड़ने पर सलाह लेने में और हर वक्त सलाह लेने में फर्क है. फर्क सबसे पहले तो इस बात का है कि क्या आपको उस सलाह की जरूरत भी है या नहीं. या आपने किसी से सलाह मांगी भी है या नहीं. ‘तुम्हें ऐसा करना चाहिए’, ‘मेरी मानो तो ये करो’ और ‘हमारे टाइम में ऐसा होता था’, जैसी बातें जेन जी को हमेशा पसंद नहीं आतीं. ऐसा नहीं है कि नई पीढ़ी सलाह सुनना नहीं चाहती. परेशानी तब होती है, जब बिना पूछे हर बात पर सलाह मिलने लगे. जेन जी अपनी जिंदगी और फैसलों को लेकर खुद सोचना और फैसला करना ज्यादा पसंद करती है.
सलाह और दखल में फर्क
जेन जी के लिए सलाह तभी अच्छी लगती है, जब उसकी जरूरत हो. अगर कोई उसकी बात समझकर और उसकी स्थिति को ध्यान में रखकर राय देता है, तो वो उसे सुन सकती है. लेकिन बिना पूरी बात समझे तुरंत सलाह देना उसे दखल जैसा लग सकता है.
साइकोलॉजी टुडे में लेखिका और कोच सोफी रीगल बताती हैं कि जेन जी अक्सर माता-पिता की सही सलाह भी इसलिए नजरअंदाज कर देते हैं क्योंकि उनके लिए सिर्फ सलाह नहीं, बल्कि सलाह देने वाला व्यक्ति भी मायने रखता है. वो इसे 'मैसेंजर इफैक्ट' बताती हैं, यानी एक ही बात किसी ऐसे व्यक्ति से सुनने पर ज्यादा असर कर सकती है, जिस पर जेन जी भरोसा या रिस्पेक्ट करते हैं. रीगल के मुताबिक, माता-पिता की सलाह कई बार उन्हें सुझाव के बजाय आदेश जैसी लग सकती है।.इसलिए सलाह देने से पहले ये पूछना बेहतर है कि बच्चा सलाह लेने के लिए तैयार है या नहीं. उनका कहना है, 'सलाह देने वाले व्यक्ति को सलाह के रास्ते में बाधा न बनने दें' यानी अगर बच्चा आपकी कही बात किसी दोस्त या दूसरे व्यक्ति से सुनकर मान लेता है, तो इसे अपनी हार न समझें; असली मकसद ये होना चाहिए कि वह सही फैसला ले.
नई पीढ़ी बातचीत में अपनी बात रखने की आजादी चाहती है. हर परेशानी का जवाब या समाधान तुरंत मिलना जरूरी नहीं होता. कभी-कभी लगातार सलाह मिलने से सामने वाला फ्रस्ट्रेट हो जाता है और उसे ऐसा लगता है कि उसे किसी के एडवाइज की जरूरत थी ही नहीं.
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अपने फैसले खुद लेना चाहती है जेन जी
इंटरनेट और सोशल मीडिया की वजह से जेन जी के पास जानकारी की कमी नहीं है. करियर, पढ़ाई, रिश्ते, पैसे और जिंदगी से जुड़े कई फैसलों पर वो खुद जानकारी जुटा सकती है. इस वजह से जब कोई बार-बार उसे बताता है कि क्या करना चाहिए, तो उसे लग सकता है कि उसकी सोच और समझ पर भरोसा नहीं किया जा रहा.
सलाह बुरी नहीं, तरीका मायने रखता है
जेन जी के लिए सलाह की बजाय बातचीत ज्यादा जरूरी है. वो चाहती है कि उसकी बात पहले सुनी जाए और फिर जरूरत हो तो राय दी जाए. इसका मतलब ये नहीं कि नई पीढ़ी बड़ों की बात नहीं मानती. सही टाइम पर, सही तरीके से और उसकी स्थिति समझकर दी गई सलाह आज भी उसके लिए मायने रखती है.
पहले सुनें, फिर सलाह दें
नई पीढ़ी के लिए किसी की बात सुनना भी बातचीत का जरूरी हिस्सा है. हर बार समाधान देना जरूरी नहीं होता. कई बार सामने वाला सिर्फ अपनी बात साझा करना चाहता है.
इसलिए जेन जी सलाह के खिलाफ नहीं है. वो बस चाहती है कि एडवाइज देने से पहले उससे पूछा जाए कि उसे सच में एडवाइज चाहती भी है या नहीं या उसे सिर्फ किसी के कंपनी का जरूरत है.