scorecardresearch
 

Malaiyo Recipe: ओस और दूध के झाग से बनी खास मिठाई! स्वाद चखने यहां विदेश से आ रहे लोग

वाराणसी की विश्व प्रसिद्ध मलइयो के बनाने की विधि बहुत अलग है. इसकी खासियत ही इसे बनाने का पारंपरिक तरीका है. सर्द रात में दूध को खुले आसमान में ओस के नीचे रखा जाता है. सुबह तैयार हुए दूध के झाग को बड़ी मथनी से फेंटा जाता है. इसके बाद इसमें चीनी, केसर, इलायची, पिस्ता, बादाम और अन्य मेवे मिलाए जाते हैं.

Advertisement
X
मलइयो साल के सिर्फ तीन महीने ही मिलता है. नवंबर के बाद जब हल्की-हल्की ओस पड़ती है, तब यह मिठाई बनना शुरू होती है और फिर फरवरी तक बनती है. (Photo: ITG)
मलइयो साल के सिर्फ तीन महीने ही मिलता है. नवंबर के बाद जब हल्की-हल्की ओस पड़ती है, तब यह मिठाई बनना शुरू होती है और फिर फरवरी तक बनती है. (Photo: ITG)

काशी की पहचान सिर्फ मंदिरों, घाटों और गलियों से नहीं, बल्कि अपने अनोखे खान-पान से भी है. बनारस की गलियों में एक पारंपरिक मिठाई की खुशबू और स्वाद लोगों को अपनी ओर खींचरही है. इसे यहां ‘मलइयो’ या ‘ओस की मिठाई’ के नाम से जाना जाता है. केसर, बादाम और दूध से बनी मलइयो स्वास्थ्य का स्वादिष्ट खजाना है. हल्की, झागदार और मुंह में घुल जाने वाली मलइयो का स्वाद लेने देश-विदेश से टूरिस्ट बनारस की गलियों का रुख करते हैं. उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा मलइयो को वन जिला वन व्यंजन (ODOC) में शामिल किया गया है, जिससे अब मलइयो को विश्व स्तरीय पहचान मिलेगी.

ओस और दूध के झाग का अनोखा मेल
वाराणसी की विश्व प्रसिद्ध मलइयो के बनाने की विधि बहुत अलग है. इसकी खासियत ही इसे बनाने का पारंपरिक तरीका है. सर्द रात में दूध को खुले आसमान में ओस के नीचे रखा जाता है. सुबह तैयार हुए दूध के झाग को बड़ी मथनी से फेंटा जाता है. इसके बाद इसमें चीनी, केसर, इलायची, पिस्ता, बादाम और अन्य मेवे मिलाए जाते हैं. तैयार मलइयो को मिट्टी के कुल्हड़ में परोसा जाता है, जिससे इसका स्वाद और भी बढ़ जाता है.

साल में सिर्फ 3 महीने मिलता है मलइयो
मलइयो साल के सिर्फ तीन महीने ही मिलता है. नवंबर के बाद जब हल्की-हल्की ओस पड़ती है, तब यह मिठाई बनना शुरू होती है और फिर फरवरी तक बनती है. इसका स्वाद मुख्य रूप से सर्दियों के मौसम में ही लिया जा सकता है. ठंड के साथ ही इसकी मांग भी बढ़ जाती है. यही वजह है कि बनारस आने वाले पर्यटकों के लिए मलइयो का स्वाद लेना एक खास अनुभव बन चुका है.

Advertisement

लंका चौक स्थित पहलवान लस्सी के संचालक मनोज यादव के मुताबिक, मलइयो एक मिठाई ही नहीं, बल्कि स्वास्थ्य का खजाना भी है. इसमें केसर, इलायची, पिस्ता, बादाम मिलाए जाते है. इसे ओस में रखकर तैयार किया जाता है. उन्होंने इसे आंखों के लिए फायदेमंद भी बताया है. एक तरफ जहां वाराणसी के लोगों को सालभर मलइयो का इंतजार रहता है. वहीं, इसका स्वाद कई विदेशी पर्यटकों को भी काशी की गलियों में खींच लाता है.

कैसे बनती है मलइयो?
मनोज यादव बताते हैं मलइयो बनाने में 10 से 12 घंटे का समय लगता है. सबसे पहले दूध को खूब गर्म किया जाता है. फिर उसे रात में ओस के नीचे छत पर रातभर रखा जाता है. इसके बाद उसे नीचे उतारकर केसर, बादाम, पिस्ता और इलायची इत्यादि मिलाए जाते हैं. फिर उसमें से निकल रहे झाग को इकट्ठा कर मलइयो को तैयार किया जाता है.

मलइयो की कीमत आमतौर पर लोगों की पहुंच में रहती है. कुल्हड़ में परोसी जाने वाली यह झागदार मिठाई काशी की खान-पान परंपरा की एक अलग पहचान बन चुकी है. घाटों की ठंडी हवा, गलियों की रौनक और हाथ में कुल्हड़ भर मलइयो काशी की सर्दियों का यह स्वाद पर्यटकों को लंबे समय तक याद रहता है.

इनपुट: सुरेंद्र कुमार गुप्ता

---- समाप्त ----
Live TV

Advertisement
Latest News in Hindi »
Advertisement