मुगल बादशाह शाहजहां के दौर की बात आते ही अक्सर ताजमहल और मुमताज महल का जिक्र होता है. लेकिन शाहजहां के परिवार और उसकी सत्ता की कहानी में एक ऐसा पहलू भी है, जो काफी दिलचस्प है. शाहजहां ने अपनी तीनों जवान बेटियों- जहांआरा, रोशनआरा और गौहरआरा की शादी नहीं होने दी. इसके पीछे सिर्फ पारिवारिक वजह नहीं, बल्कि सत्ता और उत्तराधिकार की राजनीति छिपी थी.
दरअसल, शाहजहां अपनी सत्ता के सामने खड़े होने वाले शाही दावेदारों की संख्या को सीमित रखना चाहता था. इसी रणनीति का एक हिस्सा उसकी बेटियों को शादी से दूर रखना भी था. इतिहासकारों के मुताबिक, उसका मकसद यह था कि बेटियों से ऐसे बच्चे पैदा न हों जो आगे चलकर मुगल तख्त के दावेदार बन जाएं.
बेटियों की शादी रोकने के पीछे क्या थी शाहजहां की रणनीति?
मुगल साम्राज्य में बादशाह के बेटों के बीच उत्तराधिकार को लेकर संघर्ष होना आम बात थी. तख्त का कोई तय नियम नहीं था कि सबसे बड़ा बेटा ही बादशाह बनेगा. ऐसे में शाही परिवार में जितने ज्यादा पुरुष दावेदार होते, सत्ता की लड़ाई उतनी ही पेचीदा हो सकती थी.
शाहजहां इस खतरे को समझता था. इसलिए उसने अपने परिवार में संभावित शाही दावेदारों की संख्या को सीमित रखने की कोशिश की. इसी रणनीति के तहत उसने अपनी तीनों बेटियों जहांआरा, रोशनआरा और गौहरआरा को शादी करने का अधिकार नहीं दिया. इसका सीधा मतलब था कि उनकी शादी से पैदा होने वाली अगली पीढ़ी के शाही बच्चों की संख्या भी नहीं बढ़ेगी.
यह तरीका दक्षिण एशिया के संदर्भ में असामान्य जरूर था, लेकिन इतिहास में दूसरे साम्राज्यों में भी कभी-कभार सत्ता और उत्तराधिकार को नियंत्रित करने के लिए ऐसी रणनीतियां अपनाई गई थीं.
बेटियों को राजनीति से दूर नहीं रखा
इस पूरी कहानी को सिर्फ इस तरह देखना सही नहीं होगा कि शाहजहां ने अपनी बेटियों को महल में बंद करके रखा था. असल में उन्हें राजनीतिक भूमिका निभाने का मौका मिला. यानी शाहजहां ने बेटियों की शादी रोककर उनके जरिए पैदा होने वाले संभावित शाही उत्तराधिकारियों की संख्या को सीमित किया, लेकिन उन्हें खुद राजनीति में सक्रिय रहने दिया.
शाहजहां ने अपनी बेटियों की शादी तो नहीं होने दी, लेकिन उन्हें राजनीति से दूर रखने की कोशिश भी नहीं की. बल्कि उसने उन्हें राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा लेने की पूरी छूट दी. शाही परिवार में उस समय उसके चार बेटे भी थे - दारा शिकोह, शुजा, औरंगजेब और मुराद. आगे चलकर यही चारों भाई मुगल तख्त के लिए संघर्ष करने वाले प्रमुख दावेदार बने. शाहजहां की तीनों बेटियों ने भी इस सत्ता संघर्ष में अपने-अपने भाइयों का साथ दिया.
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शाहजहां की सबसे बड़ी बेटी जहांआरा अपने भाई दारा शिकोह की मजबूत समर्थक बन गई थीं. शाहजहां खुद भी दारा शिकोह को पसंद करता था और उसे अपने बाद तख्त का सबसे मजबूत दावेदार मानता था. इसलिए जहांआरा का राजनीतिक झुकाव भी दारा की तरफ रहा.
वहीं दूसरी तरफ रोशनआरा ने औरंगजेब का साथ दिया. तीसरी बेटी गौहरआरा ने मुराद का पक्ष लिया. यानी शाहजहां की बेटियां खुद भले ही तख्त की दावेदार नहीं थीं, लेकिन मुगल सत्ता की सबसे बड़ी राजनीतिक लड़ाई में उनकी अपनी-अपनी भूमिका थी.