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पैलेस ऑफ वर्साय जहां ट्रंप ने डील साइन की, वहां हुई संधि से पड़ी थी दूसरे वर्ल्ड वॉर की नींव

आज वर्साय के महल में फिर से इतिहास दोहराया गया. अमेरिका और ईरान के बीच जारी जंग को रोकने को लेकर दोनों देशों ने समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं. यह वही पैलेस ऑफ वर्साय है, जहां फर्स्ट वर्ल्ड वॉर के बाद मित्र देशों ने समझौते के नाम पर जर्मनी के साथ अपमानजनक संधि की थी. इस संधि की शर्तों ने ही दूसरे विश्वयुद्ध के बीज बोये थे. ऐसे में जानते हैं कि आज से करीब 107 साल पहले पैलेस ऑफ वर्साय की संधि क्या थी, जिसने दुनिया को विनाशकारी दूसरे विश्वयुद्ध के करीब खींच लाया था.

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इसी पैलेस ऑफ वर्साय में पहले विश्वयुद्ध के बाद हुई थी जर्मनी के साथ संधि, जिसकी शर्तों ने दूसरे विश्वयुद्ध का रास्ता तैयार किया (Photo - Pexels)
इसी पैलेस ऑफ वर्साय में पहले विश्वयुद्ध के बाद हुई थी जर्मनी के साथ संधि, जिसकी शर्तों ने दूसरे विश्वयुद्ध का रास्ता तैयार किया (Photo - Pexels)

फ्रांस का पैलेस ऑफ वर्साय एक बार फिर सुर्खियों में है. क्योंकि आज इसी ऐतिहासिक महल में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान के बीच समझौतों पर हस्ताक्षर हुआ. यह वही पैलेस ऑफ वर्साय है, जहां करीब 107 साल पहले एक ऐसी डील साइन हुई थी, जिसने दुनिया में शांति लाने के बजाय दूसरे विश्वयुद्ध की नींव रख दी थी.

पहले विश्वयुद्ध के बाद 1919 में यहीं पर हुई वर्साय की संधि को इतिहास की सबसे विवादित शांति संधियों में गिना जाता है. कहा जाता है कि इस समझौते ने जर्मनी को इतना अपमानित और कमजोर कर दिया कि वहां पैदा हुआ गुस्सा आगे चलकर एडॉल्फ हिटलर और नाजीवाद के उभार की वजह बना. यही घटनाक्रम आखिरकार दूसरे विश्वयुद्ध तक पहुंच गया.

पहले विश्वयुद्ध के बाद जुटे थे दुनिया के बड़े नेता
1918 में प्रथम विश्वयुद्ध खत्म हुआ तो विजेता देशों के नेता फ्रांस की राजधानी पेरिस के पास स्थित पैलेस ऑफ वर्साय में इकट्ठा हुए. अमेरिका के राष्ट्रपति वुडरो विल्सन, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड लॉयड जॉर्ज, फ्रांस के प्रधानमंत्री जॉर्ज क्लेमेंसो और इटली के नेता विट्टोरियो ऑरलैंडो ने युद्ध के बाद की दुनिया का नक्शा तय करना शुरू किया.

दिलचस्प बात यह थी कि जिस जर्मनी को युद्ध में हराया गया था, उसे बातचीत में बराबरी का मौका ही नहीं दिया गया. हार चुके देशों को केवल शर्तें मानने के लिए बुलाया गया था.

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जर्मनी पर थोपी गईं अपमानजनक शर्तें
28 जून 1919 को वर्साय की संधि पर हस्ताक्षर हुए. संधि की सबसे विवादित बात यह थी कि पूरे युद्ध की जिम्मेदारी अकेले जर्मनी पर डाल दी गई. इसे 'वॉर गिल्ट क्लॉज' यानी युद्ध अपराध धारा कहा गया.

इसके अलावा जर्मनी पर कई सख्त शर्तें लागू कर दी गईं. वर्साय में हुए इस समझौते के शर्तों के मुताबिक, जर्मनी को अपनी करीब 10 प्रतिशत भूमि छोड़नी पड़ी.उसके सभी विदेशी उपनिवेश छीन लिए गए. सेना और नौसेना को बेहद सीमित कर दिया गया. वायुसेना रखने पर रोक लगा दी गई. राइनलैंड क्षेत्र को सैन्य गतिविधियों से मुक्त कर दिया गया. जर्मनी पर भारी-भरकम युद्ध क्षतिपूर्ति का बोझ डाल दिया गया.

जर्मनी से 132 अरब गोल्ड राइख्समार्क का मांगा हर्जाना 
जर्मनी को 132 अरब गोल्ड राइख्समार्क का हर्जाना चुकाने के लिए कहा गया. यह रकम इतनी बड़ी थी कि उस समय के कई अर्थशास्त्रियों का मानना था कि जर्मन अर्थव्यवस्था इसे कभी पूरी तरह चुका ही नहीं पाएगी.

जर्मनी में बढ़ता गया गुस्सा
जर्मन जनता ने इस संधि को शांति समझौते के बजाय अपमान का दस्तावेज माना. लोगों को लगने लगा कि उनके नेताओं ने देश को झुका दिया है. जिन्होंने इस संधि पर हस्ताक्षर किए, उन्हें जर्मनी में 'नवंबर क्रिमिनल्स' यानी नवंबर के अपराधी तक कहा जाने लगा.

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युद्ध हारने के बाद पहले से ही आर्थिक संकट झेल रहे जर्मनी में बेरोजगारी, महंगाई और राजनीतिक अस्थिरता बढ़ती चली गई. जनता के मन में एक ही भावना थी—वर्साय की संधि का बदला.

हिटलर ने इसी गुस्से को बनाया हथियार
1920 और 1930 के दशक में एडॉल्फ हिटलर और उसकी नाजी पार्टी ने जर्मनों के इसी गुस्से को अपने पक्ष में इस्तेमाल किया. हिटलर लगातार कहता था कि वर्साय की संधि ने जर्मनी का अपमान किया है और वह इसे पलटकर रहेगा.1929 की महामंदी ने हालात और खराब कर दिए आर्थिक संकट से जूझ रहे जर्मनी में नाजी पार्टी की लोकप्रियता तेजी से बढ़ी और 1933 में हिटलर सत्ता तक पहुंच गया.

यह भी पढ़ें: जब हिटलर ने तोड़ दी वर्साय की संधि, एक साल बाद ही शुरू हो गया था दूसरा विश्व युद्ध

ऐसे टूटी वर्साय की संधि
सत्ता में आते ही हिटलर ने वर्साय संधि की शर्तों को चुनौती देना शुरू कर दिया. 1935 में उसने संधि के सैन्य प्रतिबंधों को मानने से इनकार कर दिया. इसके बाद मार्च 1936 में उसने राइनलैंड में फिर से सेना भेज दी. यह वही इलाका था जिसे वर्साय संधि के तहत सैन्य गतिविधियों से मुक्त रखा गया था.इस कदम ने दुनिया को साफ संकेत दे दिया कि जर्मनी अब वर्साय की शर्तों को नहीं मान रहा है.

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इसके बाद हिटलर यहीं नहीं रुका. उसने ऑस्ट्रिया को अपने कब्जे में लिया, फिर चेकोस्लोवाकिया के हिस्सों को हड़प लिया और आखिरकार 1939 में पोलैंड पर हमला कर दिया. यही हमला दूसरे विश्वयुद्ध की शुरुआत बना.

शांति की संधि, जिसने युद्ध का रास्ता खोल दिया
वर्साय की संधि का मकसद दुनिया में स्थायी शांति स्थापित करना था, लेकिन इतिहासकारों का बड़ा वर्ग मानता है कि इसकी कठोर शर्तों ने उल्टा असर किया. जर्मनी को कमजोर करने की कोशिश ने वहां बदले की भावना पैदा कर दी. इसी माहौल में हिटलर जैसा नेता उभरा और दुनिया एक बार फिर युद्ध की आग में झोंक दी गई.

यह भी पढ़ें: जब हिटलर ने जर्मन सेना में भर्ती शुरू की, तोड़ दी थी वर्साय की संधि

यही वजह है कि आज जब पैलेस ऑफ वर्साय में किसी नई अंतरराष्ट्रीय डील की चर्चा होती है, तो इतिहास के जानकारों को 1919 की वही संधि याद आ जाती है. एक ऐसा समझौता, जिसे शांति लाने के लिए किया गया था, लेकिन जिसने आगे चलकर मानव इतिहास के सबसे विनाशकारी युद्ध की नींव रख दी.

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