इजरायल में चुनाव हो रहे हैं और इस बार प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की कुर्सी दांव पर है. उनका मुकाबला पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइजेनकोट से है. बताया जा रहा है कि इस बार नेतन्याहू को कांटे की टक्कर मिल रही है.इजरायल में यह चुनाव इसलिए भी अहम है, क्योंकि 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले के बाद पहली बार देश में आम चुनाव हो रहे हैं. इसके बाद गाजा में युद्ध हुआ और लेबनान, सीरिया और ईरान तक इजरायल के संघर्ष का दायरा बढ़ा. अब मतदाताओं के सामने सवाल है कि देश की कमान फिर नेतन्याहू के हाथ में रहेगी या कोई दूसरा नेता सरकार बनाएगा.
इजरायल में चुनाव का तरीका भारत से थोड़ा अलग है. यहां वोटर सीधे किसी उम्मीदवार को चुनने के बजाय राजनीतिक पार्टी को वोट देते हैं. चुनाव के बाद यह भी जरूरी नहीं कि सबसे ज्यादा सीटें जीतने वाली पार्टी का नेता ही प्रधानमंत्री बने. सरकार बनाने के लिए उसे दूसरी पार्टियों का समर्थन भी जुटाना पड़ सकता है. आइए, आसान भाषा में समझते हैं कि इजरायल में चुनाव कैसे होता है और प्रधानमंत्री की कुर्सी का फैसला कैसे होता है.
इजरायल में कितनी पार्टियां चुनाव लड़ रही हैं?
इजरायल के 27 अक्टूबर 2026 के चुनाव में कई पार्टियों और चुनावी सूचियों ने हिस्सा लिया है. चुनाव से पहले प्रकाशित सूचियों के मुताबिक, करीब 37 से 38 राजनीतिक सूचियां मैदान में थीं. माना जा रहा है कि इसमें से 10 से 12 पार्टियां ही संसद में पहुंच सकती हैं. भारत की तरह इजरायल में भी अलग-अलग विचारधारा वाली पार्टियां हैं.
जैसे बेंजामिन नेतन्याहू की पार्टी का नाम लिकुड (Likud) है. यह दक्षिणपंथी विचारधारा वाली पार्टी है. इजरायल के चुनाव में पार्टियों की पहचान बैलेट पर छपे हिब्रू अक्षरों से होती है. लिकुड का चुनावी कोड 'मखल' है. इस बार नेतन्याहू को चुनौती देने वालों में गादी आइजेनकोट की याशार पार्टी सबसे अहम है. आइजेनकोट इजरायल की सेना के पूर्व प्रमुख रह चुके हैं. उनकी पार्टी का चुनावी कोड 'डेरेख' है. नेतन्याहू के विरोधी खेमे में पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट और यायर लैपिड से जुड़ा गठबंधन भी अहम है. इसकी चुनावी पहचान 'रक' है.
इजरायल की संसद में कितनी सीटें हैं?
इजरायल की संसद को नेसेट (Knesset) कहा जाता है. इसमें कुल 120 सीटें हैं. भारत में लोकसभा का सामान्य कार्यकाल पांच साल होता है, जबकि इजरायल की संसद का सामान्य कार्यकाल चार साल है.
भारत से कितना अलग है इजरायल का चुनाव?
भारत में जब चुनाव होता है, तो हर इलाके से उम्मीदवार चुनाव लड़ते हैं. जैसे जयपुर, दिल्ली या लखनऊ की अपनी लोकसभा सीट होती है. वोटर अपने इलाके के उम्मीदवार को वोट देता है. जिस उम्मीदवार को बाकी उम्मीदवारों से ज्यादा वोट मिलते हैं, वह सांसद बन जाता है. इजरायल में ऐसा नहीं होता.
वहां पूरे देश को एक ही चुनाव क्षेत्र की तरह माना जाता है. हर वोटर को राजनीतिक पार्टियों के विकल्प मिलते हैं और वह उनमें से अपनी पसंद की पार्टी को वोट देता है. यानी वोट किसी एक इलाके के उम्मीदवार के लिए नहीं, बल्कि पार्टी के लिए होता है.
मान लीजिए कि इजरायल में तीन पार्टियां चुनाव लड़ रही हैं. पार्टी A को पूरे देश में 40 फीसदी वोट मिले, पार्टी B को 30 फीसदी और पार्टी C को भी 30 फीसदी वोट मिले. अगर इन पार्टियों के सभी वोट चुनाव में मान्य हों और सीटों का बंटवारा इसी अनुपात में हो, तो 120 सीटों में पार्टी A को करीब 48, पार्टी B को 36 और पार्टी C को 36 सीटें मिलेंगी.
यानी भारत में किसी सीट पर सबसे ज्यादा वोट पाने वाला उम्मीदवार जीत सकता है, भले ही उसे कुल वोटों का आधा हिस्सा न मिला हो. लेकिन इजरायल में पार्टियों को पूरे देश में मिले वोटों के अनुपात में संसद में सीटें मिलती हैं. इसी व्यवस्था को आनुपातिक प्रतिनिधित्व यानी प्रोपोर्शनल रिप्रेजेंटेशन कहा जाता है.
फिर ये कैसे डिसाइड होगा कि कौन सांसद बनेगा...
इजरायल में चुनाव से पहले हर पार्टी अपने उम्मीदवारों की एक सूची तैयार करती है. इस सूची में उम्मीदवारों का क्रम पहले से तय होता है. पार्टी का प्रमुख नेता अक्सर सूची में पहले नंबर पर होता है. इसके बाद दूसरे, तीसरे और अन्य उम्मीदवारों के नाम होते हैं. चुनाव में पार्टी को जितनी सीटें मिलती हैं, उसकी सूची में उतने ही शुरुआती उम्मीदवार संसद पहुंचते हैं. उदाहरण के लिए, अगर किसी पार्टी को 20 सीटें मिलीं, तो उसकी सूची में पहले 20 नंबर पर मौजूद उम्मीदवार सांसद बनेंगे.
भारत में वोटर अपने क्षेत्र से किसी खास व्यक्ति को सांसद चुन सकता है. इजरायल में वोटर पार्टी चुनता है और पार्टी की उम्मीदवार सूची के क्रम के आधार पर सांसद तय होते हैं. यही दोनों देशों के चुनावी सिस्टम का सबसे बड़ा अंतर है. इसमें सबसे खास बात ये है कि इजरायल में किसी पार्टी को संसद में जगह पाने के लिए देशभर में कम से कम 3.25 फीसदी वोट हासिल करने होते हैं. इसे चुनावी सीमा या इलेक्टोरल थ्रेशहोल्ड कहा जाता है. अगर इतने वोट नहीं मिले तो उनका एक भी सांसद नहीं होगा.
प्रधानमंत्री कैसे बनता है?
इजरायल की संसद में कुल 120 सीटें हैं. सरकार को सामान्य तौर पर कम से कम 61 सांसदों का समर्थन जुटाना होता है. इसे बहुमत कहा जाता है. किसी एक पार्टी को अकेले 61 या उससे ज्यादा सीटें मिल जाएं, तो उसके लिए सरकार बनाना आसान हो सकता है. इजरायल के चुनावी इतिहास में किसी एक पार्टी को अपने दम पर ऐसा स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है. इसीलिए वहां आम तौर पर गठबंधन सरकार बनती है. फिर वहां भी बातचीत करके पार्टियों के साथ गठबंधन किया जाता है.