22 सितंबर 1980 इतिहास में एक ऐसी तारीख के तौर पर दर्ज है. जब ईरान और इराक के बीच एक लंबे और बेहद खतरनाक युद्ध की शुरुआत हुई थी. इसी दिन इराकी सेना ने पड़ोसी देश ईरान पर बड़े पैमाने पर हमला कर दिया था. यह लड़ाई करीब 8 साल तक चली और 20 अगस्त 1988 को युद्धविराम के साथ खत्म हुई. इतने लंबे संघर्ष में लाखों लोग मारे गए. इस जंग की वजह से लंबे समय तक फारस की खाड़ी हालात अस्थिर रहे.
इस युद्ध में सैनिकों के साथ बड़ी संख्या में आम नागरिक भी मारे गए. अलग-अलग अनुमानों के मुताबिक, कुल हताहतों की संख्या 10 से 20 लाख तक रही, जबकि मरने वालों की संख्या करीब 5 लाख आंकी गई. इनमें इराकी सेना के हाथों मारे गए हजारों कुर्द लोग भी शामिल थे. आखिर दोनों देशों के बीच ऐसा क्या हुआ कि एक हमला करीब आठ साल लंबे युद्ध में बदल गया? आइए जानते हैं.
कैसे बढ़ी ईरान और इराक के बीच दुश्मनी?
ईरान और इराक के बीच तनाव कोई नया नहीं था. इराक के 1921 में अस्तित्व में आने के बाद से ही दोनों देशों के बीच कई मुद्दों को लेकर विवाद रहा. इनमें सबसे अहम विवाद शत्त अल-अरब जलमार्ग को लेकर था. यह वह जलमार्ग है जहां टिगरिस और यूफ्रेट्स नदियां मिलती हैं. इसका दक्षिणी हिस्सा दोनों देशों की सीमा बनाता है.
1975 में दोनों देशों के बीच अल्जीयर्स समझौता हुआ. इसके तहत इराक ने इस जलमार्ग पर अपना कुछ नियंत्रण छोड़ा. इसके बदले ईरान ने उत्तरी इराक में कुर्द विद्रोहियों को दिया जा रहा समर्थन वापस लेने पर सहमति जताई. लेकिन यह समझौता लंबे समय तक दोनों देशों के रिश्तों में स्थायी शांति नहीं ला सका.
ईरानी क्रांति ने बदल दिया पूरा समीकरण
दोनों देशों के बीच तनाव को बढ़ाने वाली एक बड़ी घटना 1978-79 की ईरानी क्रांति थी. इस क्रांति के बाद ईरान के पश्चिम समर्थक शासक शाह मोहम्मद रजा पहलवी की सत्ता खत्म हो गई और आयतोल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी के नेतृत्व में एक इस्लामी शासन सत्ता में आया.
उस समय इराक के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन थे. वह जुलाई 1979 में इराक के राष्ट्रपति और सत्तारूढ़ बाथ पार्टी के नेता बने थे. इराक में शिया मुसलमानों की बड़ी आबादी थी, जबकि सद्दाम का शासन सुन्नी अल्पसंख्यक नेतृत्व वाला था. उन्हें डर था कि ईरान की क्रांति का असर इराक के शिया बहुल इलाकों में भी फैल सकता है.
सद्दाम हुसैन 1975 के सीमा समझौते को भी बदलना चाहते थे. उनकी कोशिश शत्त अल-अरब जलमार्ग के दोनों किनारों पर इराक का नियंत्रण मजबूत करने की थी. यही जलमार्ग इराक के लिए फारस की खाड़ी तक पहुंच का अहम रास्ता था.
22 सितंबर 1980 को इराक ने कर दिया हमला
ईरानी क्रांति के बाद ईरान की सेना कमजोर स्थिति में थी. सद्दाम हुसैन ने इसी को मौका माना. 22 सितंबर 1980 को इराक ने ईरान पर बड़े पैमाने पर हमला कर दिया. सबसे पहले इराकी विमानों ने ईरान के एयरबेस पर बमबारी की. इसके बाद इराकी सेना ने ईरान के तेल उत्पादक सीमावर्ती इलाके खुज़ेस्तान में जमीनी हमला शुरू कर दिया.
शुरुआत में इराक को सफलता मिली. उसने खोर्रमशहर पर कब्जा कर लिया और नवंबर तक कुछ दूसरे इलाकों में भी बढ़त बना ली. लेकिन यह बढ़त ज्यादा दिनों तक कायम नहीं रह सकी.
ईरान ने पलटवार किया
ईरानी सेना ने कड़ा जवाब दिया. नियमित सेना के साथ क्रांति के बाद बनी मिलिशिया ने भी लड़ाई में हिस्सा लिया. 1981 में ईरान ने पलटवार शुरू किया और 1982 की शुरुआत तक उसने लगभग अपना खोया हुआ पूरा इलाका वापस हासिल कर लिया. इसके बाद इराकी सेना युद्ध से पहले वाली सीमा तक पीछे हट गई.
इराक ने शांति की कोशिश की, लेकिन ईरान के सर्वोच्च नेता खुमैनी युद्ध खत्म करने के लिए तैयार नहीं हुए. ईरान का लक्ष्य अब सद्दाम हुसैन की सत्ता को हटाना भी था. जुलाई 1982 में ईरानी सेना इराकी इलाके में दाखिल हुई और बसरा बंदरगाह पर कब्जे की कोशिश की. हालांकि यह कोशिश सफल नहीं हुई.
फिर शुरू हुआ लंबा और थकाऊ युद्ध
इसके बाद दोनों देशों के बीच लड़ाई एक तरह के गतिरोध में बदल गई. ईरान और इराक की सीमा के आसपास मोर्चे बन गए और दोनों तरफ से लगातार हमले होते रहे. मिसाइलों और विमानों से शहरों, सैन्य ठिकानों और तेल से जुड़े ठिकानों को निशाना बनाया गया.
तेल की सप्लाई को लेकर भी इसका असर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पड़ा. फारस की खाड़ी में अमेरिका और कुछ दूसरे पश्चिमी देशों ने अपने युद्धपोत भेजे ताकि वैश्विक बाजार के लिए तेल की आवाजाही प्रभावित न हो.
ईरान के पास सैनिकों की संख्या ज्यादा थी, लेकिन इराक के पास ज्यादा आधुनिक हथियार और बेहतर प्रशिक्षित सैन्य अधिकारी थे. इराक को सऊदी अरब, कुवैत और कुछ दूसरे अरब देशों से सीधी मदद मिली. पश्चिमी देशों से भी उसे अप्रत्यक्ष समर्थन मिला.
ईरान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग पड़ा
1979 से 1981 के बीच तेहरान स्थित अमेरिकी दूतावास में बंधक संकट के बाद ईरान का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलगाव बढ़ गया था. युद्ध के दौरान ईरान के प्रमुख सहयोगियों में सीरिया और लीबिया शामिल थे. दूसरी ओर, इराक को कई अरब देशों का समर्थन मिला.
लेकिन युद्ध के दौरान इराक की एक कार्रवाई ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारी नाराजगी पैदा की. इराकी सेना ने रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल किया. इसका इस्तेमाल ईरानी सैनिकों के अलावा इराक के कुर्द नागरिकों के खिलाफ भी किया गया, जिनके बारे में माना जाता था कि वे ईरान के प्रति सहानुभूति रखते थे.
1988 में बदली तस्वीर
करीब आठ साल तक चली लड़ाई ने दोनों देशों को बुरी तरह थका दिया था. 1988 की शुरुआत तक ईरान के कई हमले नाकाम हो चुके थे. इसके बाद इराक ने खुद बड़े पैमाने पर जमीनी हमले शुरू किए.
इराक को युद्ध के मैदान में लगातार कुछ सफलताएं मिलने लगीं. इससे ईरान के नेताओं को समझ आने लगा कि इस युद्ध में निर्णायक जीत हासिल करना बेहद मुश्किल है. आखिरकार जुलाई 1988 में दोनों देश संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता में युद्धविराम के लिए तैयार हो गए. यह युद्ध औपचारिक रूप से 20 अगस्त 1988 को खत्म हुआ.