सड़क पर गाड़ी चलाते समय सिर्फ यह जरूरी नहीं है कि आपको गाड़ी चलाना आता हो. आंखों से साफ दिखाई देना, जरूरी आवाजें सुनाई देना और गाड़ी पर पूरा कंट्रोल होना भी उतना ही जरूरी है. यही वजह है कि ड्राइविंग लाइसेंस बनवाते समय कुछ लोगों की मेडिकल जांच की जाती है. परिवहन सेवा पर मौजूद ड्राइविंग लाइसेंस के सरकारी फॉर्म में भी ऐसी कई परेशानियों के बारे में पूछा जाता है, जो गाड़ी चलाते समय खतरा पैदा कर सकती हैं. इनमें आंखों की कमजोरी, रात में कम दिखाई देना, लाल और हरे रंग को पहचानने में परेशानी, अचानक बेहोशी और हाथ-पैर की गंभीर परेशानी जैसी चीजें शामिल हैं. तो चलिए जानते हैं.
अचानक बेहोश हो जाते हैं तो सावधान
सोचिए, कोई व्यक्ति सड़क पर गाड़ी चला रहा है और अचानक उसे चक्कर आ गया या वह बेहोश हो गया. ऐसे में गाड़ी कौन संभालेगा? यही वजह है कि अचानक बेहोशी या मिर्गी जैसी समस्या को ड्राइविंग के मामले में गंभीरता से देखा जाता है. अगर किसी व्यक्ति को ऐसी परेशानी होती है, तो मेडिकल जांच में यह देखा जा सकता है कि उसके लिए गाड़ी चलाना सुरक्षित है या नहीं. गाड़ी चलाने के लिए सामने की सड़क साफ दिखाई देना बहुत जरूरी है. ट्रैफिक लाइट, सड़क के बोर्ड, सामने की गाड़ी और पैदल चल रहे लोगों को समय पर देखना जरूरी होता है. इसीलिए ड्राइविंग लाइसेंस बनवाते समय आंखों की जांच की जाती है. अगर किसी व्यक्ति की नजर बहुत कमजोर है और चश्मा लगाने के बाद भी जरूरी चीजें साफ नहीं दिखाई देतीं, तो उसकी ड्राइविंग फिटनेस पर डॉक्टर की राय ली जा सकती है.
कलर ब्लाइंड हैं तो क्या गाड़ी नहीं चला सकते?
यह सवाल बहुत लोगों के मन में रहता है. कलर ब्लाइंडनेस में कुछ रंगों को पहचानने में परेशानी होती है. खासकर लाल और हरे रंग को पहचानने की क्षमता को मेडिकल जांच में देखा जाता है. ऐसा इसलिए क्योंकि सड़क पर ट्रैफिक लाइट और दूसरे जरूरी संकेतों में रंगों का बहुत महत्व है. लेकिन यहां एक बात साफ समझ लें. कलर ब्लाइंडनेस होने का मतलब यह नहीं है कि हर व्यक्ति को अपने आप गाड़ी चलाने से रोक दिया जाएगा.

मेडिकल जांच में यह देखा जाता है कि व्यक्ति रंगों को कितनी अच्छी तरह पहचान पाता है और लागू नियमों के हिसाब से वह सुरक्षित तरीके से गाड़ी चला सकता है या नहीं. इसलिए यह कहना कि हर कलर ब्लाइंड व्यक्ति को ड्राइविंग लाइसेंस नहीं मिल सकता, सही नहीं होगा. कुछ लोगों को दिन में तो ठीक दिखाई देता है, लेकिन रात में सड़क देखने में परेशानी होती है. गाड़ी चलाते समय यह भी बड़ी समस्या बन सकती है. रात में सामने से आती गाड़ी, पैदल व्यक्ति या सड़क का कोई संकेत देर से दिखाई दे तो हादसा हो सकता है. इसलिए मेडिकल जांच में रात में देखने की परेशानी को भी ध्यान में रखा जाता है.
कान से ठीक से सुनाई नहीं देता तो?
गाड़ी चलाते समय आंखों के साथ कान भी बहुत काम आते हैं. पीछे से एंबुलेंस का सायरन बज रहा हो, कोई गाड़ी हॉर्न दे रही हो या आसपास कोई खतरे की आवाज हो, तो ड्राइवर को उसे सुनकर सावधान होना पड़ता है. अगर किसी व्यक्ति को सुनने में इतनी गंभीर परेशानी है कि वह जरूरी आवाजें नहीं सुन पाता, तो उसकी स्थिति को भी मेडिकल जांच में देखा जा सकता है.
गाड़ी चलाते समय स्टेरिंग, ब्रेक, क्लच और दूसरे कंट्रोल का इस्तेमाल करना पड़ता है. अगर किसी व्यक्ति के हाथ या पैर में ऐसी गंभीर परेशानी है, जिसकी वजह से वह इन चीजों को ठीक से इस्तेमाल नहीं कर सकता, तो उसकी ड्राइविंग क्षमता की जांच की जा सकती है. यहां भी सिर्फ बीमारी या शारीरिक परेशानी देखकर फैसला नहीं होता. असली सवाल यह होता है कि क्या वह व्यक्ति गाड़ी को सुरक्षित तरीके से संभाल सकता है?

हर बीमारी में लाइसेंस नहीं रुकता
यह बात भी समझना जरूरी है कि किसी व्यक्ति को कोई बीमारी होने का मतलब यह नहीं है कि उसे गाड़ी चलाने से रोक दिया जाएगा. मेडिकल जांच का मकसद यह देखना है कि व्यक्ति सड़क पर गाड़ी चलाते समय खुद के लिए और दूसरों के लिए सुरक्षित है या नहीं. इसलिए नजर, रंग पहचानने की क्षमता, सुनने की क्षमता, अचानक बेहोशी जैसी परेशानी और शरीर की स्थिति को देखकर जरूरत के हिसाब से फैसला किया जाता है.
तो किन लोगों की जांच जरूरी हो सकती है?
सीधी भाषा में कहें तो जिन लोगों को बहुत कम दिखाई देता है, रात में देखने में परेशानी है, लाल-हरे रंग को पहचानने में दिक्कत है, सुनने में गंभीर परेशानी है, अचानक बेहोशी आती है, मिर्गी की समस्या है या हाथ-पैर की ऐसी दिक्कत है जिससे गाड़ी संभालना मुश्किल हो सकता है, उनकी ड्राइविंग फिटनेस टेस्ट की जा सकती है. कलर ब्लाइंडनेस को लेकर कोई भी फैसला सिर्फ बीमारी का नाम देखकर नहीं किया जाता. मेडिकल जांच और लागू नियमों के आधार पर ही तय होता है कि व्यक्ति सुरक्षित तरीके से गाड़ी चला सकता है या नहीं.