हरिद्वार में गंगा की धारा थमते ही हजारों लोगों के लिए खजाने की तलाश का रास्ता खुल गया है. कोई सूखी नहर की रेत में सिक्के खोज रहा है, तो कोई पत्थरों के बीच सोने-चांदी के आभूषण तलाशने में जुटा है. इन लोगों की नजर हर उस चीज पर रहती है, जिसे श्रद्धालु सालभर मां गंगा में अर्पित करते हैं. सुबह से शाम तक 8-8 घंटे की मेहनत के बाद किसी के हाथ कुछ सिक्के लगते हैं, तो किसी की किस्मत खुलने पर कीमती गहने भी मिल जाते हैं. खास बात यह है कि कई परिवार इस मौके का पूरे साल इंतजार करते हैं, क्योंकि इसी कमाई से उनके घर का खर्च चलता है.
गंगा बंद होते ही शुरू हो जाती है खजाने की तलाश
दरअसल, हरिद्वार से उत्तर प्रदेश के कानपुर देहात तक जाने वाली उत्तरी खंड गंगनहर को वार्षिक रखरखाव और मरम्मत के लिए दशहरे की रात से 18 दिनों के लिए बंद किया गया है. इस दौरान उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग नहर की सिल्ट सफाई और घाटों की मरम्मत का काम कर रहा है. गंगनहर में 7-8 नवंबर की रात पानी दोबारा छोड़े जाने की उम्मीद है. इसी बीच हरिद्वार के घाटों और सूखी नहर के हिस्सों में बड़ी संख्या में लोग सिक्के और धातुएं खोजने उतर गए हैं.
हर की पौड़ी के ब्रह्मकुंड घाट से लेकर अस्थि प्रवाह घाट, नाई घाट, सुभाष घाट और मालवीय घाट तक लोग रेत और पत्थरों के बीच बारीकी से खोजबीन कर रहे हैं. कोई हाथों से रेत हटाता है, तो कोई धातु की चीजें तलाशते हुए आगे बढ़ता है. उनकी उम्मीद है कि घंटों की मेहनत के बाद कुछ ऐसा मिल जाए, जिसे बेचकर अच्छी कमाई की जा सके.
किसी को सिक्के, तो किसी को मिल जाते हैं सोने-चांदी के गहने
गंगा में खजाना तलाशने वाले लोगों के मुताबिक श्रद्धालु सालभर गंगा में सिक्के और दूसरी चीजें अर्पित करते हैं. पानी बंद होने के बाद जब नहर के हिस्से सूख जाते हैं, तब उन्हें इन वस्तुओं को तलाशने का मौका मिलता है. खोजबीन के दौरान तांबे, पीतल और दूसरी धातुओं की वस्तुओं के साथ सिक्के भी मिलते हैं. कभी-कभी सोने-चांदी के आभूषण मिलने की भी बात सामने आती है. हालांकि, हर किसी को कीमती सामान मिले, यह जरूरी नहीं है.
पन्नालाल, शुभम, राजा और विशु जैसे लोग इसी उम्मीद में घंटों तक नहर में तलाश करते हैं. उनका कहना है कि यह काम जितना मेहनत वाला है, उतना ही किस्मत पर भी निर्भर करता है. किसी दिन थोड़ी कमाई होती है, तो किसी दिन ज्यादा सामान मिल जाता है.
गंगा की बंदी का सालभर इंतजार करते हैं ये परिवार
इन लोगों के लिए गंगा की वार्षिक बंदी महज नहर सूखने का समय नहीं, बल्कि कमाई का एक अहम मौका है. कई परिवार दशहरे से दीपावली तक इसी काम में जुटे रहते हैं. उन्हें उम्मीद रहती है कि इस दौरान मिलने वाले सिक्कों और धातुओं को बेचकर वे अपने परिवार का लालन-पालन कर सकेंगे. गंगनहर में पानी लौटने के बाद यह अवसर भी खत्म हो जाता है.
इस खोजबीन का एक दूसरा पहलू भी है. रेत और पत्थरों के बीच वस्तुएं तलाशते समय लोग वहां जमा दूसरी चीजों को भी हटाते हैं, जिससे कुछ हिस्सों की सफाई में मदद मिलती है. फिलहाल, हरिद्वार में गंगनहर की बंदी के दौरान खजाने की यह तलाश जारी है. पानी लौटने से पहले इन लोगों की कोशिश है कि ज्यादा से ज्यादा सामान मिल जाए, ताकि उनकी मेहनत से परिवार का खर्च निकल सके.