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भगवान बद्रीविशाल को ठंड में ओढ़ाया जाने वाला कंबल बद्रीनाथ मंदिर पहुंचा... माणा की बेटियां निभाती हैं सदियों पुरानी परंपरा

उत्तराखंड के बद्रीनाथ धाम में भगवान बदरीविशाल को ठंड में घृत कंबल ओढ़ाने की सदियों पुरानी परंपरा निभाई जाती है. चमोली के सीमांत गांव माणा की महिलाएं और बेटियां व्रत रखकर एक ही दिन में यह कंबल तैयार करती हैं. मंदिर के कपाट बंद होने पर मुख्य पुजारी कंबल पर शुद्ध घी और केसर का लेप लगाते हैं और इसे भगवान के विग्रह पर ओढ़ाया जाता है.

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मंदिर पहुंचाया गया भगवान का कंबल. (Photo: ITG)
मंदिर पहुंचाया गया भगवान का कंबल. (Photo: ITG)

पहाड़ों पर बर्फ पड़ रही है. तापमान शून्य से नीचे चला गया है. बद्रीनाथ धाम के कपाट बंद होने वाले हैं. ऐसे में भगवान बद्रीविशाल को ठंड से बचाने के लिए एक खास कंबल तैयार किया जाता है. इसे कोई मशीन नहीं बनाती. न ही इसे बाजार से खरीदा जाता है. इसे तैयार करती हैं उत्तराखंड के सीमांत गांव माणा की महिलाएं और बेटियां. और इस कंबल की खासियत है कि इसे भगवान को ओढ़ाने से पहले शुद्ध घी और केसर से लेपित किया जाता है.

इसे घृत कंबल कहा जाता है. बद्रीनाथ धाम से जुड़ी यह परंपरा सदियों से चली आ रही है. मान्यता है कि जैसे एक मां सर्दी में अपने बच्चे को गर्म रखने के लिए उसकी चिंता करती है, वैसे ही भक्त भगवान बद्रीविशाल को ठंड से बचाने के भाव से यह कंबल अर्पित करते हैं.

इस साल भी माणा गांव के मोल्फा परिवार ने एकादशी पर घृत कंबल और पहाड़ी गाय का शुद्ध देसी घी भगवान बदरीविशाल को अर्पित किया है. इस कंबल की कहानी सिर्फ इसके घी से तैयार होने तक सीमित नहीं है. इसमें पहाड़ की महिलाओं की आस्था, पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा और भगवान के प्रति वात्सल्य का भाव भी शामिल है.

Chamoli Ghrit Blanket for Badrivishal Arrives at Badrinath Temple During Winter

एक दिन का व्रत, फिर तैयार होता है घृत कंबल

घृत कंबल तैयार करने की परंपरा अपने आप में खास है. कार्तिक महीने में शुभ दिन पर माणा गांव की सुहागिन महिलाएं और कुंवारी कन्याएं व्रत रखती हैं. इसके बाद वे मिलकर एक ही दिन में यह कंबल तैयार करती हैं. इस साल जानवी मोल्फा, रिद्धिमा मोल्फा, आरोही मोल्फा और सृष्टि मोल्फा ने घृत कंबल बनाया. मोल्फा परिवार ने इसे भगवान बद्रीविशाल को अर्पित किया. आखिर इस कंबल को बनाने की जिम्मेदारी माणा गांव की महिलाओं और बेटियों के पास ही क्यों है?

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स्थानीय मान्यता के अनुसार, भगवान बद्रीनाथ के लिए घृत कंबल तैयार करने की परंपरा आदि गुरु शंकराचार्य के समय से जुड़ी हुई है. माणा गांव के पूर्व प्रधान पीतांबर मोल्फा बताते हैं कि उनके गांव के लोगों को पीढ़ियों से भगवान बद्रीनाथ के लिए यह कंबल तैयार कर भेंट करने का विशेष दायित्व मिला हुआ है. यानी यह सिर्फ एक धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि एक ऐसी विरासत है जिसे एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी को सौंपती आ रही है.

Chamoli Ghrit Blanket for Badrivishal Arrives at Badrinath Temple During Winter

भगवान को कंबल ओढ़ाकर छह महीने के लिए बंद हो जाते हैं कपाट

बद्रीनाथ धाम के कपाट जब शीतकाल के लिए बंद किए जाते हैं, तब घृत कंबल की परंपरा का सबसे अहम हिस्सा पूरा होता है. मंदिर के मुख्य पुजारी यानी रावल इस कंबल पर शुद्ध घी और केसर का लेप लगाते हैं. इसके बाद कंबल से भगवान बद्रीविशाल के विग्रह को ढक दिया जाता है. धार्मिक मान्यता है कि अगले छह महीने तक भगवान इसी कंबल में विराजमान रहते हैं. बद्रीनाथ धाम हिमालय की ऊंचाई पर है. सर्दियों में यहां तापमान शून्य से नीचे चला जाता है. ऐसे में भक्तों के मन में भगवान को कंबल ओढ़ाने का भाव किसी मां के अपने बच्चे को ठंड से बचाने जैसा है.

यह भी पढ़ें: Char Dham Yatra 2026: भगवान बद्रीविशाल की डोली जोशीमठ से रवाना, 23 अप्रैल को खुलेंगे बद्रीनाथ धाम के कपाट

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आम तौर पर कंबल हमारे लिए ठंड से बचने का साधन होता है. लेकिन इस परंपरा में कंबल के साथ जुड़ा भाव उससे कहीं बड़ा है. यह भगवान के प्रति श्रद्धा को मां के वात्सल्य की भाषा में व्यक्त करने का तरीका है. घृत कंबल की कहानी कपाट बंद होने पर खत्म नहीं होती. असली इंतजार तो अगले छह महीने बाद होता है, जब गर्मियों में बद्रीनाथ धाम के कपाट फिर से खोले जाते हैं. उस समय भगवान बद्रीविशाल के विग्रह से घृत कंबल उतारा जाता है.

Chamoli Ghrit Blanket for Badrivishal Arrives at Badrinath Temple During Winter

इसके बाद कंबल के छोटे-छोटे टुकड़े श्रद्धालुओं को महाप्रसाद के रूप में बांटे जाते हैं. मान्यता यह भी कहती है कि जब छह महीने बाद कंबल उतारा जाता है, तो उस पर लगा घी अगर ताजा और नम मिले, तो इसे अच्छी बारिश, खुशहाली और समृद्धि का संकेत माना जाता है.

माणा गांव और बद्रीनाथ धाम से जुड़े श्रद्धालुओं के लिए इस परंपरा का भावनात्मक महत्व बहुत गहरा है. माणा गांव उत्तराखंड के चमोली जिले में भारत-चीन सीमा के पास स्थित है. इसे देश के प्रथम गांव के रूप में भी जाना जाता है. यहां की जीवनशैली, संस्कृति और धार्मिक परंपराएं हिमालय के कठिन भूगोल से जुड़ी हैं. माणा के लोगों के लिए धाम सिर्फ एक मंदिर नहीं, बल्कि उनकी सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा भी है. पीतांबर मोल्फा के मुताबिक, उनका परिवार कई पीढ़ियों से इस परंपरा को निभाता आ रहा है. उनके लिए इसे आगे बढ़ाना पूर्वजों से मिली जिम्मेदारी को संभालने जैसा है.

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