
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तीसरे कार्यकाल के पहले मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है. राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि यह विस्तार 5 जुलाई या 11 जुलाई के बाद कभी भी हो सकता है. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि प्रधानमंत्री अपनी नई टीम में किन चेहरों को जगह देंगे और किन मंत्रियों की छुट्टी हो सकती है.
सियासी हलकों में इस बार युवाओं, महिलाओं और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के प्रतिनिधित्व को बढ़ाने की संभावना पर सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है. सूत्रों के अनुसार, सरकार मंत्रिमंडल विस्तार के जरिए नई सोशल इंजीनियरिंग का संदेश देने की तैयारी में है. इसके पीछे केवल राजनीतिक समीकरण ही नहीं, बल्कि 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य, महिला आरक्षण और आने वाले विधानसभा चुनावों जैसे कई बड़े कारण भी बताए जा रहे हैं.
दरअसल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार अपने भाषणों में युवा शक्ति को देश की सबसे बड़ी ताकत बताते रहे हैं. मौजूदा लोकसभा में 30 वर्ष से कम उम्र का एक सांसद, 31 से 40 वर्ष के बीच 15 सांसद और 41 से 50 वर्ष के बीच 39 सांसद हैं. वहीं मौजूदा केंद्रीय मंत्रिपरिषद में 50 वर्ष तक की आयु वाले मंत्रियों की हिस्सेदारी करीब 24 प्रतिशत है.

वर्ष 2014 में मोदी सरकार के पहले मंत्रिमंडल की औसत आयु 62 वर्ष थी, जो 2019 में घटकर 60 वर्ष और 2021 के बड़े फेरबदल के बाद 58 वर्ष रह गई. 2024 में भी मंत्रिपरिषद की औसत आयु 58 वर्ष ही है. ऐसे में कयास लगाए जा रहे हैं कि इस बार और अधिक युवा सांसदों को मौका देकर मंत्रिमंडल को और युवा बनाया जा सकता है.
'महिला आरक्षण' से पहले कैबिनेट में बढ़ेगी नारी शक्ति?
पीएम मोदी ने संसद से लेकर लाल किले तक देश में केवल चार जातियां बताई हैं- नारी, युवा, गरीब और किसान. महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने की दिशा में बढ़ती सरकार क्या इस बार मंत्रिमंडल में भी महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ाएगी? दरअसल, वर्तमान में संसद में एनडीए की 58 महिला सांसद हैं, लेकिन केंद्रीय मंत्रिमंडल में अभी सिर्फ 7 महिला मंत्री (2 कैबिनेट और 5 राज्य मंत्री) हैं, जो कुल मंत्रियों का करीब 10 प्रतिशत है. वर्ष 2021 के विस्तार में यह आंकड़ा रिकॉर्ड 11 तक पहुंचा था.
वर्तमान में निर्मला सीतारमण (वित्त) और अन्नपूर्णा देवी (महिला एवं बाल विकास) जैसे बड़े चेहरों के अलावा रक्षा खडसे, शोभा करंदलाजे, अनुप्रिया पटेल, सावित्री ठाकुर और निमूबेन बंभानिया टीम का हिस्सा हैं. आगामी महिला आरक्षण विधेयक को देखते हुए इस विस्तार में नए महिला चेहरों को शामिल कर पीएम मोदी विपक्ष के सामने एक बड़ा और कड़ा संदेश दे सकते हैं.

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि सरकार महिला आरक्षण से जुड़े संवैधानिक संशोधन को आगे बढ़ाना चाहती है, तो उससे पहले मंत्रिमंडल में महिलाओं की संख्या बढ़ाकर बड़ा राजनीतिक संदेश देने की कोशिश कर सकती है.
ओबीसी और एससी वर्ग पर बड़ा दांव
ओबीसी प्रतिनिधित्व भी इस विस्तार में अहम मुद्दा माना जा रहा है. विपक्ष लगातार जातिगत जनगणना और पिछड़ों के हक के मुद्दे पर सरकार को घेरता रहा है. 2024 के लोकसभा चुनावों में INDIA Bloc के दांव से पिछड़ा वर्ग का एक हिस्सा एनडीए से छिटका भी है.
वर्तमान मंत्रिपरिषद में 27 मंत्री ओबीसी समुदाय से आते हैं, जो कुल मंत्रियों का लगभग 38 प्रतिशत है. इसके अलावा 10 मंत्री अनुसूचित जाति (एससी), पांच अनुसूचित जनजाति (एसटी) और पांच अल्पसंख्यक समुदाय से हैं. भाजपा लंबे समय से ओबीसी वर्ग में अपनी मजबूत पकड़ बनाए रखने की रणनीति पर काम कर रही है. विपक्ष की ओर से जातिगत जनगणना और सामाजिक न्याय के मुद्दों को उठाए जाने के बाद सरकार भी इस वर्ग को मजबूत संदेश देने की कोशिश कर सकती है.

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आगामी उत्तर प्रदेश और पंजाब विधानसभा चुनावों को देखते हुए ओबीसी, एससी और महिला नेताओं को मंत्रिमंडल में अधिक प्रतिनिधित्व मिल सकता है. साथ ही ऐसे चेहरों को प्राथमिकता दी जा सकती है जो युवा भी हों, महिला भी हों और ओबीसी समुदाय से भी आते हों. इसे भाजपा की नई सोशल इंजीनियरिंग रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है.
हालांकि अभी तक मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर सरकार की ओर से कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है. लेकिन यह लगभग तय माना जा रहा है कि प्रदर्शन के आधार पर कुछ मंत्रियों के विभाग बदले जा सकते हैं, कुछ की छुट्टी हो सकती है और कई नए चेहरे सरकार का हिस्सा बन सकते हैं. ऐसे में अब सभी की नजर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अगले कदम पर टिकी है.