इस साल जून में राज्यसभा चुनाव होने वाले हैं. ऐसे में कांग्रेस का टारगेट आने वाले चुनावी दौर में सबसे ज्यादा फायदा उठाने वाली पार्टियों में से एक बनना है. इस पुरानी पार्टी को कर्नाटक, मध्य प्रदेश, राजस्थान और झारखंड में कुल मिलाकर छह सीटें मिल सकती हैं.
मौजूदा वक्त में राज्यसभा के अंदर कांग्रेस के 29 सदस्य हैं. अगर पार्टी अनुमानित संख्या हासिल करने में कामयाब हो जाती है, तो उच्च सदन में उसकी संख्या बढ़कर 30 ज्यादा हो जाएगी, जिससे संसदीय लोकतंत्र में उसकी बात का वजन काफी बढ़ जाएगा.
उच्च सदन में सीटों का फायदा कर्नाटक से मिलने की उम्मीद है, जहां विधानसभा में कांग्रेस के पास मजबूत बहुमत है. वहीं, मध्य प्रदेश, राजस्थान और झारखंड को भी कम से कम एक-एक सीट के लिहाज से पार्टी के लिए अनुकूल माना जा रहा है.
चुनावी गणित के मुताबिक, इस चुनाव चक्र में कांग्रेस की कुल सीटों में कर्नाटक का योगदान सबसे ज्यादा रहने की उम्मीद है. 224 सदस्यों वाली विधानसभा में 136 विधायकों के साथ, अगर चार सीटों पर चुनाव होते हैं, तो पार्टी आसानी से तीन राज्यसभा सीटों पर जीत का टारगेट रख सकती है. ऐसे मुकाबले में जीतने के लिए हर उम्मीदवार को करीब 46 विधायकों के वोटों की जरूरत होगी.
सूत्रों के मुताबिक, कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ही अब तक कर्नाटक से आगामी राज्यसभा चुनावों के लिए एकमात्र पक्के उम्मीदवार हैं. अन्य संभावित उम्मीदवारों में कर्नाटक कांग्रेस यूनिट के प्रमुख और उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार के भाई डी.के. सुरेश और भारतीय युवा कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष बी.वी. श्रीनिवास शामिल हैं. उत्तरी कर्नाटक की एक प्रभावशाली लिंगायत महिला नेता और पूर्व विधायक अंजली निंबालकर के नाम पर भी राज्यसभा सीट के लिए चर्चा चल रही है.
मध्य प्रदेश में विपक्ष में होने के साथ कांग्रेस के लिए राज्यसभा की एक सीट आराम से हासिल करना तय माना जा रहा है. 230 सदस्यों वाली विधानसभा में करीब 66 विधायकों के साथ, पार्टी 59 वोटों के उस संभावित कोटे को पार कर लेती है, जिसकी जरूरत तब पड़ती है, जब तीन सीटों पर चुनाव लड़ा जाए.
हालांकि, राज्यसभा की इस अकेली सीट के लिए कई संभावित उम्मीदवार हैं, जो संभवतः कांग्रेस के खाते में जाएगी. इन उम्मीदवारों में पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ और दिग्विजय सिंह से लेकर मीनाक्षी नटराजन (जिन्हें अक्सर 'टीम राहुल' का सदस्य माना जाता है) और निमाड़ क्षेत्र के एक प्रमुख OBC नेता अरुण यादव तक शामिल हैं. पार्टी मध्य प्रदेश से राज्यसभा सीट के लिए किसी नए चेहरे पर भी दांव लगा सकती है, जिससे किसी एक सीनियर लीडर का पक्ष लेने से बचा जा सके, जैसा कि हरियाणा के राज्यसभा चुनावों के दौरान हुआ था.
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राजस्थान से कांग्रेस को राज्यसभा की एक सीट मिलने की उम्मीद है. सूबे में सत्ता गंवाने के बावजूद, पार्टी के पास इतनी विधायी ताकत (विधायकों की संख्या) मौजूद है कि वह चार सीटों वाले चुनाव में जरूरी 41 वोटों का कोटा आसानी से पूरा कर सके. सूत्रों के मुताबिक, राजस्थान में इस दौड़ में सबसे आगे चल रहे नाम हैं: तीन बार मुख्यमंत्री रह चुके अशोक गहलोत, राज्य विधानसभा चुनाव में हार के बाद राज्यसभा में जाने से वे राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में बने रहेंगे. दूसरे नंबर पर हैं, कांग्रेस के तेज़-तर्रार मीडिया चेयरमैन पवन खेड़ा, जो हाल ही में असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा द्वारा दायर मानहानि के मुकदमे के चलते कानूनी मुश्किलों में घिर गए थे.
इस दौड़ में एक और मज़बूत दावेदार हैं, निवर्तमान सांसद नीरज डांगी. वे एक दलित नेता हैं, जिन्हें पार्टी का वफादार माना जाता है और अपने मौजूदा कार्यकाल के दौरान वे राज्यसभा में पार्टी की एक मुखर आवाज रहे हैं. पूर्व मंत्री और AICC के महासचिव भंवर जितेंद्र सिंह भी अलवर क्षेत्र का एक जाना-माना चेहरा हैं और दिल्ली में पार्टी आलाकमान से अपनी नजदीकी के चलते उनकी किस्मत भी चमक सकती है.
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कांग्रेस को झारखंड में राज्यसभा की एक सीट पक्की करने के लिए INDIA ब्लॉक के गणित और हेमंत सोरेन के नेतृत्व वाली सहयोगी पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा के समर्थन पर निर्भर रहना पड़ सकता है. 81 सदस्यों वाली विधानसभा में, दो सीटों के मुकाबले में जीत का आंकड़ा करीब 28 वोटों के आसपास रहने की उम्मीद है, जिससे गठबंधन के बीच तालमेल बेहद जरूरी हो जाता है. मुख्य दावेदारों में कारोबारी-राजनेता धीरज साहू, कांग्रेस के सीनियर लीडर सुबोध कांत सहाय, प्रभावशाली आदिवासी नेता बंधु तिर्की शामिल हैं. इसके अलावा दो पूर्व PCC अध्यक्ष राजेश ठाकुर और प्रदीप बलमुचू भी राज्यसभा की सीट पाने की दौड़ में शामिल हैं.
ऐसे में अगर अनुमानित नतीजे सच साबित होते हैं, तो कांग्रेस अपनी मौजूदा राज्यसभा सीटों की संख्या में छह सीटों का इजाफा कर सकती है, जिससे उसकी कुल ताकत 29 से बढ़कर 30 से ज्यादा हो सकती है. इस तरह की बढ़त से उच्च सदन में सत्ता के समीकरणों में कोई बहुत बड़ा बदलाव तो नहीं आएगा, लेकिन इससे विपक्षी गठबंधन के अंदर कांग्रेस की मोलभाव करने की स्थिति मजबूत होगी और अगले राष्ट्रीय चुनावी चक्र से पहले संसद में उसकी मौजूदगी और भी मजबूत हो जाएगी.