सुप्रीम कोर्ट ने प्री-कॉन्सेप्शन एंड प्री-नेटल डायग्नोस्टिक टेक्नीक्स (PCPNDT) एक्ट के तहत अवैध लिंग जांच मामलों में कानूनी स्थिति स्पष्ट कर दी है. शीर्ष अदालत ने कहा है कि पुलिस सीधे FIR दर्ज कर जांच नहीं कर सकती. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कार्रवाई का मुख्य अधिकार सिर्फ सक्षम प्राधिकारी के पास है.
स्टेट ऑफ यूपी बनाम बृजपाल सिंह मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा कि पुलिस स्वतंत्र रूप से PCPNDT अधिनियम के तहत अपराधों की जांच या सीधे तौर पर प्राथमिकी (FIR) दर्ज नहीं कर सकती है. अधिनियम के तहत कार्रवाई करने, शिकायत दर्ज करने, खोज और जब्ती करने का प्राथमिक अधिकार केवल सक्षम प्राधिकार के पास ही है. इस तकनीकी कानून में मेडिकल विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है, इसलिए पुलिस की भूमिका केवल सक्षम प्राधिकारी को सहायता प्रदान करने तक सीमित रहेगी.
कमियों को नहीं माना जा सकता 'मामूली गलती'
पीसीपीएनडीटी कानून के तहत सक्षम प्राधिकारी के पास क्लीनिकों, अस्पतालों और डायग्नोस्टिक प्रयोगशालाओं पर छापा मारने, रिकॉर्ड जब्त करने और उल्लंघन पर पंजीकरण रद्द करने का पूरा अधिकार है.
शीर्ष अदालत के अनुसार, कार्रवाई करने, शिकायत दर्ज करने तथा तलाशी लेने का प्राथमिक दायित्व सक्षम प्राधिकार का ही है. पुलिस इन मामलों में स्वतंत्र रूप से कार्रवाई शुरू नहीं कर सकती, बल्कि केवल पूरक के तौर पर मदद करेगी.
अदालत ने जून 2026 में डॉ. रमेश बनाम महाराष्ट्र मामले के ऐतिहासिक फैसला का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि अल्ट्रासाउंड केंद्रों पर रखे जाने वाले 'फॉर्म एफ' में किसी भी तरह की कमी या अधूरी जानकारी को मामूली लिपिकीय गलती नहीं माना जा सकता.
कोर्ट ने साफ किया कि रिकॉर्ड के रख-रखाव में लापरवाही कानून का गंभीर उल्लंघन माना जाएगा है, क्योंकि ये डॉक्यूमेंट्स कन्या भ्रूण हत्या रोकने के अहम सबूत हैं. कानून के प्रावधान को किसी भी स्तर पर कमजोर होने से आर्टिकल 21 के तहत बालिका का जीवन अधिकार को सिर्फ एक औपचारिकता बनाकर रख देगा. कोर्ट ने कहा कि सख्त प्रवर्तन यानी स्ट्रिक्ट इन्फोर्समेंट जरूरत कोर्ट के अनुसार हो.
मानसिकता न बदलने तक जरूरी है ठोक कानून
सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित प्राधिकारियों को नियमित निरीक्षण करने, अवैध क्लीनिकों और अपंजीकृत अल्ट्रासाउंड मशीनों पर सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए हैं. कोर्ट ने कहा कि जब तक बेटियों के प्रति सामाजिक मानसिकता पूरी तरह नहीं बदलती, तब तक कानून को कठोरता से लागू रखना जरूरी है. वहीं, सरकार द्वारा चलाई जा रही 'बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ' और 'लक्ष्मी योजना' जैसी सरकारी योजनाएं दिखाती हैं कि बालिकाओं के प्रति पूर्वाग्रह खत्म करने के लिए निरंतर कानूनी और समाजिक प्रयासों की आवश्यकता है.