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शादी का झूठा वादा करने वाले शख्स को सुप्रीम कोर्ट ने कर दिया बरी, आपसी संबंध को अपराध न बनाने की सलाह

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आपसी सहमति से बने रिश्ते के खत्म होने के बाद पुराने यौन संबंधों को रेप का मामला नहीं बनाया जा सकता. हालांकि, कोर्ट ने साफ किया कि असली यौन हिंसा के मामलों में सख्ती से कार्रवाई होनी चाहिए.

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कोर्ट ने कहा कि आपसी सहमति से बने संबंध को बाद में अपराध नहीं कहा जा सकता है. (सांकेतिक तस्वीर-Pexel)
कोर्ट ने कहा कि आपसी सहमति से बने संबंध को बाद में अपराध नहीं कहा जा सकता है. (सांकेतिक तस्वीर-Pexel)

शादी का झूठा वादा करके रेप के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एक शख्स को आरोपों से बरी कर दिया है. अदालत ने कहा कि दो वयस्कों के बीच आपसी सहमति और प्यार से बने रिश्ते में हुए यौन संबंधों को सिर्फ इसलिए बाद में अपराध नहीं माना जा सकता, क्योंकि उनका रिश्ता खत्म हो गया. कोर्ट ने कहा कि हाल के वर्षों में ऐसा चलन देखने को मिल रहा है, जहां टूट चुके रिश्तों को बाद में आपराधिक मामलों में बदल दिया जाता है.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह समझना जरूरी है कि क्या कोई रिश्ता शुरुआत से ही धोखे और झूठ पर आधारित था, जिसकी वजह से सहमति का कोई आधार नहीं था, या फिर रिश्ता खत्म होने के बाद व्यक्ति को पहले बनाए गए यौन संबंधों पर पछतावा हो रहा है. अदालत के मुताबिक, इन दोनों परिस्थितियों में बड़ा फर्क है.

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कोर्ट ने कहा कि कानून बनाने वालों का मकसद यह नहीं था कि आपसी सहमति से बने रिश्ते में वयस्कों के बीच हुए यौन संबंधों को रिश्ता टूटने के बाद अपराध बना दिया जाए. रेप जैसे गंभीर अपराध को उन मामलों तक सीमित रखा जाना चाहिए, जहां वास्तव में यौन हिंसा, जबरदस्ती या सहमति के साथ धोखाधड़ी हुई हो.

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रेप के मामलों में चुप्पी भी बड़ी चुनौती

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सावधानी बरतने की जरूरत पर भी जोर दिया. अदालत ने कहा कि रेप ऐसा अपराध है, जो महिला की शारीरिक स्वायत्तता और गरिमा पर सीधा हमला करता है. इसके बावजूद ऐसे मामले बड़ी संख्या में दर्ज नहीं हो पाते. कई पीड़िताएं अपने और परिवार की इज्जत बचाने के लिए न्याय मांगने के बजाय चुप रहना चुनती हैं.

कोर्ट ने कहा कि जहां यौन हिंसा और जबरदस्ती के साफ सबूत हों, वहां ऐसे मामलों की पूरी गंभीरता से जांच और कार्रवाई होनी चाहिए. अदालत ने यह भी कहा कि कुछ मामलों में रेप से जुड़े कानूनों के दुरुपयोग का मतलब यह नहीं है कि वास्तविक पीड़िताओं की शिकायतों को नजरअंदाज किया जाए. न्याय व्यवस्था का इस्तेमाल किसी को परेशान करने के लिए भी नहीं होना चाहिए.

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सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि असफल रिश्ते को अपने आप रेप का मामला नहीं माना जा सकता. इसके लिए यह देखना जरूरी है कि शुरुआत में सहमति धोखे से हासिल की गई थी या दोनों वयस्कों के बीच संबंध आपसी सहमति से बने थे.

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