कहते हैं, हर कारोबार के पीछे कोई न कोई आइडिया होता है. कोई बाजार में खाली जगह देखता है, कोई लोगों की जरूरत समझता है और कोई अपनी ही परेशानी का हल खोजते-खोजते कारोबारी बन जाता है. सहारनपुर की शाजिया की कहानी तीसरी तरह की है. उन्हें बाजार में मिलने वाले साबुन से परेशानी थी. नहाने के बाद त्वचा इतनी रूखी हो जाती कि तुरंत बॉडी लोशन लगाना पड़ता. चेहरा धोने के बाद भी त्वचा में खिंचाव बना रहता. कई बार लोशन लगाने के बाद भी उन्हें राहत महसूस नहीं होती थी.
एक दिन उन्होंने सोचा कि जब बाजार में मिलने वाले साबुन से इतनी परेशानी हो रही है, तो क्यों न खुद ही कुछ ऐसा बनाया जाए जो उनकी जरूरत के मुताबिक हो. उन्हें उस वक्त यह नहीं पता था कि इस कोशिश से एक दिन उनका अपना छोटा-सा कारोबार खड़ा हो जाएगा.

आज शाजिया करीब 20 तरह के साबुन बना रही हैं. उनके बनाए साबुन सहारनपुर के आसपास के इलाकों से निकलकर दिल्ली, कश्मीर और हैदराबाद तक पहुंच रहे हैं. ऑर्डर इंस्टाग्राम से आते हैं. फ्लिपकार्ट और मीशो जैसे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर भी उनके उत्पाद मौजूद हैं. और इस सफर की शुरुआत हुई थी सिर्फ दो तरह के साबुन से. शाजिया यूपी के सहारनपुर के खाताखेड़ी इलाके में रहती हैं. करीब दो साल पहले तक उनके पास साबुन बनाने का कोई कारोबार नहीं था. न कोई दुकान थी, न कोई बड़ा बिजनेस प्लान. बस एक परेशानी थी, जिसका हल वह तलाश रही थीं.
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वह बताती हैं कि बाजार में मिलने वाले साबुन इस्तेमाल करने के बाद उनकी त्वचा बहुत ज्यादा रूखी हो जाती थी. मुंह धोने के तुरंत बाद बॉडी लोशन लगाना पड़ता था. इसके बावजूद स्किन में खिंचाव बना रहता था. फिर उन्होंने नेचुरल चीजों से साबुन बनाने के बारे में सोचा. लेकिन सिर्फ सोचने से साबुन नहीं बनता. इसके लिए जानकारी और सही तरीका भी चाहिए था. इसलिए वह कृषि विज्ञान केंद्र पहुंचीं. वहां उन्होंने साबुन बनाने की ट्रेनिंग ली. ट्रेनिंग के दौरान उन्हें एलोवेरा और मुल्तानी मिट्टी से साबुन बनाना सिखाया गया. यानी शुरुआत में उनके पास सिर्फ दो विकल्प थे.

दो साबुन से 20 वैरायटी तक कैसे पहुंचीं?
शाजिया ने सबसे पहले मुल्तानी मिट्टी का साबुन बनाया. फिर उसे खुद इस्तेमाल किया और परिवार के लोगों को भी दिया. धीरे-धीरे उन्होंने आसपास के लोगों को भी अपने बनाए साबुन दिखाने शुरू किए. लोगों ने इस्तेमाल किया तो उन्हें पसंद आए. किसी को एलोवेरा वाला अच्छा लगा, किसी को मुल्तानी मिट्टी वाला. फिर लोगों ने दोबारा साबुन मंगाने शुरू कर दिए.
यहीं से शाजिया को लगा कि इस काम को आगे बढ़ाया जा सकता है. वह बताती हैं कि ट्रेनिंग में उन्हें दो तरह के साबुन बनाना सिखाया गया था. बाकी चीजें उन्होंने धीरे-धीरे खुद सीखीं. नए प्रयोग किए और अलग-अलग सामग्री के साथ साबुन तैयार करने लगीं. अब उनके पास करीब 20 तरह के साबुन हैं. इनमें एलोवेरा, नीम, राइस, रोज, शहद, केसर, चारकोल और मुल्तानी मिट्टी जैसे विकल्प शामिल हैं. सोचिए, जिस काम की शुरुआत अपनी त्वचा के लिए दो साबुन बनाने से हुई थी, उसमें अब ग्राहकों के पास चुनने के लिए करीब 20 विकल्प हैं.

पड़ोसियों ने पसंद किया, तो दोबारा ऑर्डर आने लगे
किसी नए कारोबार के लिए पहला ग्राहक मिलना एक बात है और उसी ग्राहक का दोबारा लौटकर आना दूसरी. शाजिया के कारोबार में भी यही दूसरी बात अहम बन गई. उन्होंने शुरुआत में अपने पड़ोसियों और जानने वालों को साबुन दिए. लोगों ने इस्तेमाल किया और पसंद आने पर फिर से मंगाए. किसी को रोज वाला साबुन चाहिए था तो कोई नीम या एलोवेरा वाला साबुन मांगता था. शाजिया बताती हैं कि उनके आसपास के कुछ लोग शुरुआत से ही उनके साबुन इस्तेमाल कर रहे हैं. जब साबुन खत्म होता है तो वे एक-दो पीस ही सही, लेकिन दोबारा ऑर्डर जरूर करते हैं.
शाजिया ने शुरुआत में कीमत भी इसी बात को ध्यान में रखकर तय की. उनके साबुन 50 रुपये से शुरू होते हैं. वह कहती हैं कि जिस इलाके में वह रहती हैं, वहां हर कोई महंगे उत्पाद नहीं खरीद सकता. इसलिए उन्होंने कम कीमत से शुरुआत की. उनका कहना है कि शुरुआत में उनका ध्यान ज्यादा मुनाफा कमाने पर नहीं था. वह चाहती थीं कि लोगों को उनका बनाया साबुन पसंद आए और उनका काम आगे बढ़े. धीरे-धीरे यही हुआ. ग्राहक बढ़े और ऑर्डर भी आने लगे.

साबुन में कौन-कौन सी चीजें इस्तेमाल करती हैं?
शाजिया अलग-अलग तरह के साबुन बनाने के लिए अलग सामग्री का इस्तेमाल करती हैं. उनके मुताबिक, इसमें ग्लिसरीन बेस, गोट मिल्क यानी बकरी के दूध वाला बेस, मिल्क पाउडर, गुलाब जल और विटामिन C जैसी चीजें शामिल हैं. राइस वैरायटी में चावल से जुड़ी सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है. इसके अलावा वह एलोवेरा, नीम, गुलाब और मुल्तानी मिट्टी जैसी चीजों से अलग-अलग साबुन तैयार करती हैं.

अब कहानी पड़ोसियों से आगे निकल चुकी है. शाजिया इंस्टाग्राम पर अपने उत्पादों के वीडियो साझा करती हैं. यूट्यूब पर भी उन्होंने अपने साबुन से जुड़े वीडियो डाले हैं. इसके अलावा ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए भी बिक्री करती हैं. उनका कहना है कि उन्हें देश के अलग-अलग हिस्सों से ऑर्डर मिलते हैं. कश्मीर से भी ऑर्डर आया, हैदराबाद से भी और दिल्ली में भी उनके उत्पाद भेजे गए. एक छोटे से कमरे में तैयार होने वाला साबुन अब पैक होकर दूसरे शहरों तक जा रहा है. ग्राहक अपनी पसंद बताते हैं और शाजिया उसी के हिसाब से साबुन तैयार करती हैं.
सरकारी योजना और ट्रेनिंग से मिला सहारा
शाजिया के इस सफर में कृषि विज्ञान केंद्र से मिली ट्रेनिंग की भूमिका रही. इसके अलावा उन्होंने मुख्यमंत्री युवा उद्यमी विकास अभियान योजना के तहत मिलने वाले ऋण की मदद से काम बढ़ाने की पहल की. यूपी सरकार की इस स्कीम में पात्र लोगों को काम के लिए पांच लाख तक का ब्याजमुक्त ऋण मिल सकता है. शाजिया के पास कोई बड़ी फैक्ट्री नहीं है. न शुरुआत में बड़ा निवेश था और न ही कोई लंबी कारोबारी योजना. पहले उन्होंने अपने लिए साबुन बनाया. फिर परिवार को दिया. पड़ोसियों ने पसंद किया तो ऑर्डर मिलने लगे. दो तरह के साबुन से शुरू हुआ काम करीब 20 वैरायटी तक पहुंच गया.