कॉलेज में एडमिशन के लिए होने वाली सीयूईटी (CUET) परीक्षा पर एक संसदीय समिति ने बड़े सवाल उठाए हैं. समिति का कहना है कि परीक्षा का मल्टीपल चॉइस (MCQ) यानी चार विकल्पों वाला फॉर्मेट ह्यूमैनिटीज और सोशल साइंस जैसे विषयों के लिए बिल्कुल सही नहीं है. राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह की अगुवाई वाली इस संसदीय समिति ने मंगलवार को अपनी रिपोर्ट सौंपी है. कमेटी ने सरकार से परीक्षा के डिजाइन और सवालों की क्वालिटी की दोबारा समीक्षा करने को कहा है, ताकि यह नई शिक्षा नीति (NEP) के मकसद को पूरा कर सके.
कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में साफ शब्दों में समझाया है कि इतिहास, भूगोल, राजनीति विज्ञान और समाजशास्त्र जैसे विषयों में बच्चे की अपनी स्वतंत्र सोच और समझ देखी जाती है. इन विषयों में किसी सवाल का जवाब सिर्फ एक सही विकल्प चुनकर नहीं दिया जा सकता. ऐसे सब्जेक्ट्स में खुलकर लिखने और अपने विचार रखने की जरूरत होती है. समिति के मुताबिक, मौजूदा MCQ पैटर्न इन विषयों की बुनियादी सोच से मेल नहीं खाता है.
जेएनयू जैसे विश्वविद्यालयों पर क्या होगा असर?
न्यूज एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, कमेटी का मानना है कि देश भर के कॉलेजों के लिए एक साझा एंट्रेंस टेस्ट कराने के अपने फायदे हैं. हालांकि, इससे जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी जैसे बड़े संस्थानों की जरूरतें पूरी नहीं हो पा रही हैं. जेएनयू में एडमिशन की अपनी एक अलग व्यवस्था रही है. इसे समाज के पिछड़े और अलग-अलग क्षेत्रों के बच्चों को बराबरी का मौका देने के लिए बनाया गया था. कमेटी के कुछ सदस्य इसे एडमिशन का इकलौता जरिया बनाने के पक्ष में नहीं हैं.
चिंताओं पर क्या है सरकार का जवाब?
इस पूरे मामले पर सरकार ने भी अपनी बात रखी है. उसने संसदीय समिति की सभी चिंताओं को नोट कर लिया है. यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) और परीक्षा कराने वाली नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) को इस बारे में जरूरी सलाह भेज दी गई है. सरकार ने बताया कि सीयूईटी से छात्रों को एक ही परीक्षा से कई यूनिवर्सिटीज में एडमिशन की बड़ी सुविधा मिली है. साल 2025 में इसके लिए 13.54 लाख से ज्यादा छात्रों ने आवेदन किया था.
आपको बता दें कि संसद की स्टैंडिंग कमेटी ने ये तमाम सिफारिशें उच्च शिक्षा विभाग की अनुदान मांगों से जुड़ी एक ताजा रिपोर्ट में की हैं, जिसे 381st Action Taken Report कहा जाता है.