मिडिल-ईस्ट में चल रहे युद्ध की वजह से पैदा हुए ईंधन संकट से दुनिया जूझ रही है. इससे पेट्रोल, डीजल और LPG की ऐसी कमी हो गई है, जो पहले कभी नहीं देखी गई. जहां एक तरफ भारत ने कीमतों में आए इस झटके को काफ़ी हद तक संभाल लिया है और घरेलू ईंधन की कीमतों में बहुत ज़्यादा बढ़ोतरी नहीं हुई है, वहीं दूसरी तरफ यह स्थिति अभी भी चिंता का विषय बनी हुई है. क्योंकि ऐसा लगता है कि अमेरिका और इज़रायल द्वारा ईरान के ख़िलाफ़ छेड़े गए युद्ध का कोई अंत नज़र नहीं आ रहा है, जिसके परिणामस्वरूप 'स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़' में दोहरी नाकेबंदी हो गई है.
मिडिल-ईस्ट में चल रहे संघर्ष की वजह से जैसे-जैसे वैश्विक तेल की कीमतें बढ़ रही हैं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोगों से वर्क फ्रॉम होम, वर्चुअल मीटिंग और पेट्रोल व डीज़ल का समझदारी से इस्तेमाल करके ईंधन बचाने की अपील की है. यह कदम कम वक्त के लिए तो मददगार साबित हो सकते हैं, लेकिन आयातित तेल पर भारत की भारी निर्भरता एक पुरानी समस्या है.
दशकों से भारत बड़ी पाइपलाइन परियोजनाओं के जरिए दीर्घकालिक समाधान खोजने की कोशिश कर रहा है. इनमें से कई विचारों पर जैसे कि 'ओमान-भारत डीपवाटर पाइपलाइन', 'भारत-श्रीलंका तेल पाइपलाइन' और 'TAPI गैस पाइपलाइन' सबसे पहले 1990 के दशक और 2000 के दशक की शुरुआत में चर्चा की गई थी, और यहां तक कि उन पर सहमति भी बन गई थी. हालांकि, भू-राजनीति, भारी लागत और अन्य चुनौतियों के कारण इन परियोजनाओं में देरी हो गई.
हाल के ईंधन संकट ने इन पुरानी परियोजनाओं को फिर से चर्चा में ला दिया है. भारत अपनी ज़रूरत का करीब 85-90% कच्चा तेल आयात करता है, ऐसे में इन पाइपलाइनों को अब ऐसी महत्वपूर्ण अधूरी परियोजनाओं के तौर पर देखा जा रहा है, जो आखिरकार देश को वैश्विक रुकावटों के प्रति उसकी संवेदनशीलता कम करने में मदद कर सकती हैं.
हालांकि, आयात पर निर्भरता कम करने और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव घटाने के मकसद से PM मोदी की अपील एक अस्थायी उपाय हो सकती है, लेकिन भारत को दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ढांचागत समाधानों की जरूरत है. अगर इन परियोजनाओं को सफलतापूर्वक लागू किया जाता है, तो ये बार-बार होने वाले ईंधन संकटों का अधिक स्थायी समाधान प्रस्तुत कर सकती हैं.
अपनी कच्चे तेल की ज़रूरतों का करीब 85-90% आयात करने की वजह से भारत वैश्विक आपूर्ति में आने वाले झटकों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बना हुआ है. यहां उन तीन प्रमुख पाइपलाइन परियोजनाओं पर विस्तार से नज़र डाली गई है, जिन्हें अस्थिर समुद्री मार्गों और टैंकर शिपमेंट के संभावित रणनीतिक विकल्पों के रूप में देखा जा रहा है.
1. गहरे पानी में ओमान-भारत पाइपलाइनें, समुद्र के नीचे का रास्ता
सबसे महत्वाकांक्षी प्रस्तावों में से एक ओमान-भारत गहरे पानी की बहुउद्देशीय पाइपलाइन (OIDMPP) है. इस प्रोजेक्ट पर चर्चा 1990 के दशक की शुरुआत में शुरू हुई थी. 1,600 किलोमीटर लंबी यह पाइपलाइन ओमान के रास अल जिफान से गुजरात के पोरबंदर तक समुद्र तल के साथ-साथ चलेगी और कुछ हिस्सों में इसकी गहराई 3,500 मीटर तक होगी.
मुख्य रूप से प्राकृतिक गैस के परिवहन के लिए डिजाइन की गई यह पाइपलाइन जमीनी सीमाओं और राजनीतिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों से होकर नहीं गुजरेगी. यह एक सीधा और सुरक्षित रास्ता देती है, जिसके जरिए आयातित एलएनजी की तुलना में कम लागत पर गैस की आपूर्ति की जा सकती है. मुमकिन है कि प्रति मिलियन ब्रिटिश थर्मल यूनिट (BTU) 2-3 डॉलर सस्ती. अनुमानों के मुताबिक, इस परियोजना की लागत करीब $5-6 बिलियन हो सकती है और यह दो दशकों तक बड़ी मात्रा में गैस की आपूर्ति कर सकती है.
विशेष रूप से ओमान खाड़ी क्षेत्र में भारत के सबसे महत्वपूर्ण, लेकिन अभी तक पूरी तरह से उपयोग में न लाए गए रणनीतिक साझेदारों में से एक है.
ग्लोबल लेवल पर ऊर्जा की ऊंची कीमतों और शिपिंग मार्गों में आई रुकावटों के मौजूदा माहौल में इस प्रोजेक्ट पर एक बार फिर से ध्यान दिया जा रहा है.
रक्षा विशेषज्ञ और सीनियर पत्रकार संदीप उन्नीथन ने सोमवार को सोशल मीडिया पोस्ट में कहा, "1600 किलोमीटर लंबी ओमान-भारत डीप-वॉटर पाइपलाइन प्रोजेक्ट (OIDMPP) पर 1990 के दशक से ही बातचीत चल रही है. रास अल जिफान से पोरबंदर तक. इसे समुद्र तल से 3500 मीटर नीचे बिछाया जाएगा. अब इस प्रोजेक्ट पर 'तेजी से काम करने' का वक्त आ गया है."
होर्मुज स्ट्रेट जैसे तंग रास्तों से गुजरने वाले एलएनजी टैंकरों के उलट, यह ग्राउंडेड पाइपलाइन ज्यादा स्थिर और अनुमानित आपूर्ति प्रदान करेगी.
तकनीक से जुड़ी सुविधाओं पर स्टडी कई साल पहले पूरी हो चुकी हैं, लेकिन प्रोजेक्ट अभी तक शुरू नहीं हुआ है. इसके रिवाइवल से भारत को गैस आयात में डायवर्सिटी लाने और अंतरराष्ट्रीय कीमतों में बार-बार होने वाली बढ़ोतरी से खुद को बचाने में मदद मिल सकती है.
यह भी पढ़ें: 'होर्मुज से बिना Tax दिए निकले भारत के 10 जहाज', सरकार का बयान- LPG, पेट्रोल-डीजल की कोई कमी नहीं
2. भारत-श्रीलंका तेल पाइपलाइन, एक क्षेत्रीय जुड़ाव
चर्चा में मौजूद एक ज़्यादा तात्कालिक और व्यावहारिक प्रोजेक्ट भारत-श्रीलंका सीमा-पार तेल पाइपलाइन है. इस प्रोजेक्ट पर बातचीत 2026 में फिर से शुरू हुई, जिसमें भारत, श्रीलंका और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) शामिल हैं.
19 अप्रैल को उपराष्ट्रपति CP राधाकृष्णन और श्रीलंका के राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके ने कोलंबो में हुई एक मीटिंग के दौरान प्रस्तावित भारत-श्रीलंका सीमा-पार तेल पाइपलाइन पर चर्चा की. यह प्रस्तावित पाइपलाइन तमिलनाडु के नागपट्टिनम को श्रीलंका के रणनीतिक ट्रिंकोमाली टैंक फ़ार्म से जोड़ेगी और बाद में कोलंबो तक बढ़ाई जाएगी. यह कई तरह के पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स को ले जाएगी और ट्रिंकोमाली को भंडारण, बंकरिंग और रिफाइनिंग सुविधाओं के साथ एक प्रमुख क्षेत्रीय ऊर्जा केंद्र के रूप में विकसित करने में मदद करेगी. भारत के लिए यह पाइपलाइन कई तरह से फायदेमंद है.
सबसे पहले यह ईंधन की सप्लाई के लिए एक छोटा और सुरक्षित रास्ता बनाता है, जिससे लंबे और महंगे समुद्री सफ़रों पर निर्भरता कम होती है, जो अक्सर दुनिया भर में होने वाली रुकावटों की चपेट में आ जाते हैं. इससे भारत ट्रिनकोमाली के बड़े प्राकृतिक बंदरगाह का इस्तेमाल रणनीतिक भंडारण के लिए कर पाएगा, जिससे संकट के वक्त सप्लाई की विश्वसनीयता बेहतर होगी.
यह प्रोजेक्ट UAE से इन्वेस्टमेंट्स भी लाता है. इसके साथ ही एक करीबी पड़ोसी के साथ ऊर्जा सहयोग को भी मज़बूत करता है. रिफाइंड प्रोडक्ट्स की आवाजाही को आसान बनाकर, यह घरेलू ईंधन की उपलब्धता को स्थिर करने और भारतीय उपभोक्ताओं के लिए कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव को कंट्रोल करने में मदद कर सकता है. अधिकारी इसे एक अहम 'एनर्जी ब्रिज' के रूप में देखते हैं, जो एनर्जी सिक्योरिटी और द्विपक्षीय संबंधों, दोनों को बढ़ावा देता है.
3. राजनीतिक अड़चनों में फंसी TAPI गैस पाइपलाइन
तुर्कमेनिस्तान-अफगानिस्तान-पाकिस्तान-भारत (TAPI) गैस पाइपलाइन एक ऐसा प्रोजेक्ट है, जिसमें हाल के वक्त में सबसे ज़्यादा प्रगति हुई है, फिर भी इसका पूरी तरह से साकार होना अभी भी अनिश्चित बना हुआ है. 1,814 किलोमीटर लंबी TAPI का टारगेट तुर्कमेनिस्तान के बड़े गल्किनिश गैस क्षेत्र से हर साल 33 अरब क्यूबिक मीटर तक प्राकृतिक गैस दक्षिण एशिया तक पहुंचाना है. तुर्कमेनिस्तान वाला हिस्सा (करीब 214 किलोमीटर) पूरा हो चुका है. अफगानिस्तान में तालिबान की सुरक्षा गारंटी के तहत निर्माण कार्य आगे बढ़ा है.
2024 में अफगानिस्तान ने कहा था कि 10 अरब डॉलर की गैस पाइपलाइन पर काम शुरू होगा. किर्गिस्तान स्थित समाचार आउटलेट, 'द टाइम्स ऑफ सेंट्रल एशिया' के मुताबिक, 2026 के मध्य तक, हेरात शहर की ओर करीब 40-50 किलोमीटर पाइपलाइन बिछाई जा चुकी है और 120 किलोमीटर से ज़्यादा के रास्ते को तैयार करने का काम चल रहा है.
TOLO News के मुताबिक, अफगान अधिकारियों को उम्मीद है कि वे 2026 के अंत तक हेरात वाले हिस्से को पूरा कर लेंगे. हालांकि, अफगानिस्तान के सामने अभी भी बड़ी चुनौतियां हैं.
भारत तक पहुंचने से पहले इस पाइपलाइन को पाकिस्तान से होकर गुजरना होगा और इस अहम हिस्से में अब तक करीब कोई प्रगति नहीं हुई है. भले ही गैस पाकिस्तान-भारत सीमा तक पहुंच जाए, लेकिन इसकी लगातार आपूर्ति स्थिर राजनीतिक व्यवस्थाओं पर निर्भर करेगी, एक ऐसी चीज जिसे नई दिल्ली ने ऐतिहासिक रूप से अविश्वसनीय पाया है.
यह भी पढ़ें: LNG टैंकर धड़ाधड़ पहुंच रहे पाकिस्तान! ईरान ने क्यों दी होर्मुज में 'स्पेशल एंट्री'
हालांकि, TAPI अफगानिस्तान के लिए ट्रांजिट राजस्व ला सकती है और पाकिस्तान के लिए ऊर्जा स्रोतों में विविधता ला सकती है, लेकिन भारत-पाकिस्तान के बीच भरोसे की कमी की वजह से आने वाले वक्त में जल्द इसका पूरी तरह से लागू होना मुश्किल लगता है.
प्रधानमंत्री मोदी का ऊर्जा संरक्षण का आह्वान एक समझदारी भरा तात्कालिक कदम है, जो Covid-19 महामारी के दौरान उठाए गए कदमों की याद दिलाता है. लेकिन अकेले ऐसे कदम भारत की आयातित ऊर्जा पर संरचनात्मक निर्भरता को दूर नहीं कर सकते.
ओमान-भारत डीपवाटर पाइपलाइन, भारत-श्रीलंका तेल लिंक और TAPI पाइपलाइ... ये सभी एक ही टारगेट तक पहुंचने के अलग-अलग रास्ते हैं. पहले दो प्रोजेक्ट्स में भू-राजनीतिक जोखिम अपेक्षाकृत कम है, लेकिन TAPI के सामने बड़ी राजनीतिक बाधाएं हैं. ये प्रोजेक्ट्स असल में साकार हो पाएंगे या नहीं, यह काफी हद तक भू-राजनीति और खुद साझेदारों पर निर्भर करेगा. अगर ये सफल हो जाते हैं, तो ये पाइपलाइनें भारत को 'चोकपॉइंट्स' से बचने में मदद करेंगी.