सरकार कहती है हर घर नल से पानी पहुंच रहा है, लेकिन मध्य प्रदेश के धार जिले के उटावा गांव में हकीकत कुछ और ही है. 43 डिग्री की प्रचंड गर्मी में महिलाएं रोज अपनी जान जोखिम में डालकर 50 फीट गहरी खाई में उतरती हैं, जहां धरती की दरारों से रिसती बूंदों को बर्तनों में जमा करती हैं. आजतक संवाददाता रवीश पाल की ग्राउंड रिपोर्ट इस बात को उजागर करती है कि जल जीवन मिशन के भव्य दावों और गांव की जमीनी हकीकत के बीच गहरी खाई है.स्थानीय विधायक ने सरकार की नाकामी पर सवाल उठाए हैं, जबकि विभाग ने भूजल स्तर गिरने को समस्या का कारण बताया है.
उटावा गांव से करीब एक किलोमीटर दूर एक सुनसान घाटी की तस्वीरें सूखे रेगिस्तान जैसी नजर आती हैं, जहां विकास के बड़े-बड़े वादे तो किए गए लेकिन धरातल पर कुछ नहीं बदला. गांव की गलियों में नल और पाइप तो दिखाई देते हैं, लेकिन वे पूरी तरह सूखे पड़े हैं. भीषण गर्मी के इस मौसम में पानी की किल्लत ने ग्रामीणों का जीना मुहाल कर दिया है.
जिस जगह पर पानी का एकमात्र जरिया मौजूद है, वहां का रास्ता किसी के भी रोंगटे खड़े कर सकता है. इस सुनसान घाटी में पहुंचने के लिए महिलाओं को लगभग 50 फीट गहरी खाई में उतरना पड़ता है. चारों तरफ नुकीली और ऊंची चट्टानें हैं, जहां जरा-सा पैर फिसलने का मतलब सीधे मौत का खतरा है.
इस खतरनाक खाई के नीचे पहुंचकर जो हकीकत दिखाई देती है, वह हैरान करने वाली है. वहां पानी किसी सोते या झरने की तरह बहता नहीं है, बल्कि धरती से धीरे-धीरे टपकता है. रिसाव से जब वह छोटा सा गड्ढा भरता है, तब जाकर महिलाएं अपने बर्तनों में पानी जमा कर पाती हैं.
एक बर्तन पानी के लिए कई घंटे इंतजार
खाई के नीचे बना पानी का वह छोटा-सा गड्ढा एक बार खाली हो जाने के बाद उसे दोबारा भरने में करीब दो घंटे का समय लग जाता है. तब तक गांव की महिलाएं भीषण गर्मी और चिलचिलाती धूप में इसी तरह कतार लगाकर अपनी बारी का इंतजार करती रहती हैं. उनके लिए डर से बड़ी उनकी प्यास बन चुकी है.
पानी भर लेने के बाद भी इन महिलाओं की जंग खत्म नहीं होती है. असली परीक्षा तो तब शुरू होती है जब कई लीटर पानी सिर पर रखकर उन्हें वापस उसी खड़ी चढ़ाई पर चढ़ना पड़ता है. खाली हाथ नीचे उतरना फिर भी आसान है, लेकिन वजन के साथ ऊपर आना मौत को चुनौती देने जैसा है.
विधायक का आरोप
सरदारपुर के स्थानीय विधायक प्रताप ग्रेवाल ने इस बदहाली को लेकर सरकार पर तीखा हमला बोला. उन्होंने आधिकारिक बाइट में आरोप लगाया कि 'हर घर नल, हर घर जल' का नारा सिर्फ बड़े-बड़े भाषणों और विज्ञापनों तक ही सीमित रह गया है, जबकि जमीनी स्तर पर जनता आज भी बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रही है.
पीएचई विभाग ने ग्राम पंचायत पर फोड़ा ठीकरा
दूसरी तरफ, पीएचई विभाग के सरदारपुर के असिस्टेंट इंजीनियर विनोद महाजन ने इस जलसंकट की पूरी जिम्मेदारी ग्राम पंचायत पर डाल दी है. उन्होंने बताया कि उटावा गांव में एक करोड़ 17 लाख रुपये की भारी लागत से जल जीवन मिशन की योजना को पूरा करके ग्राम पंचायत को सुपुर्द कर दिया गया था.
इंजीनियर के मुताबिक, इस साल क्षेत्र का भूजल स्तर अत्यधिक कम हो जाने की वजह से यह गंभीर समस्या पैदा हुई है. विभाग द्वारा गांव में जो नया नलकूप (ट्यूबवेल) खोदा गया था, वह भी जलस्तर नीचे चले जाने के कारण उम्मीद के मुताबिक पानी नहीं दे पा रहा है जिससे संकट गहरा गया है.
सरकारी फाइलों में भले ही करोड़ों रुपये खर्च होना और जल जीवन मिशन का काम शत-प्रतिशत पूरा होना दर्ज हो, लेकिन उटावा की हकीकत इन दावों की पोल खोलती है. सरकारी दावों की सच्चाई इस खाई में बूंद-बूंद होकर रिस रही है, जहां आज भी देश के नागरिक पानी जैसी बुनियादी जरूरत के लिए तरस रहे हैं.