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'NICE' प्रोजेक्ट में कुछ भी NICE नहीं', कर्नाटक हाई कोर्ट की तल्ख टिप्पणी!

कर्नाटक हाई कोर्ट ने नंदी इंफ्रास्ट्रक्चर कॉरिडोर एंटरप्राइज़ (NICE) द्वारा लागू किए गए बेंगलुरु-मैसूर इंफ्रास्ट्रक्चर कॉरिडोर प्रोजेक्ट (BMICP) को कर्नाटक के सबसे बड़े घोटालों में से एक बताया है.

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कर्नाटक हाई कोर्ट (File photo)
कर्नाटक हाई कोर्ट (File photo)

कर्नाटक हाई कोर्ट ने गुरुवार को नंदी इंफ्रास्ट्रक्चर कॉरिडोर एंटरप्राइज़ (NICE) प्रोजेक्ट को लेकर बहुत ही सख्त टिप्पणी की. नंदी इंफ्रास्ट्रक्चर कॉरिडोर एंटरप्राइज़ (NICE) द्वारा लागू किए गए बेंगलुरु-मैसूर इंफ्रास्ट्रक्चर कॉरिडोर प्रोजेक्ट (BMICP) को कर्नाटक हाई कोर्ट ने राज्य के "सबसे बड़े घोटालों में से एक" बताया है. कोर्ट ने NICE और कर्नाटक इंडस्ट्रियल एरियाज़ डेवलपमेंट (KIADB) की उन अपीलों को खारिज किया है जिनमें किसानों के मुआवज़ा तय करने में हुई लंबी देरी के कारण ज़मीन अधिग्रहण रद्द करने के आदेश को चुनौती दी गई थी. कोर्ट का कहना है कि पहला आदेश सही था. 

जस्टिस डी.के. सिंह और टी.एम. नाफ की बेंच ने कहा है कि राज्य अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी निभाने में नाकाम रहा है. उसने अपने निजी हितों को बढ़ने दिया और हजारों जमीन मालिकों को उनके मुआवजे और आवीजिका से वंचित रखा. 

बेंच ने टिप्पणी की है कि 'NICE प्रोजेक्ट में कुछ भी NICE(अच्छा) नहीं है', साथ ही यह भी कहा कि इसमें किसानों की बजाय प्रमोटरों का ज्यादा हित हुआ. इस परियोजना के लिए लगभग 20, 193 एकड़ भूमि का अधिग्रहण किया गया था लेकिन 23 साल बाद भी मुआवजे को लेकर कोई फैसला नहीं किया गया. कोर्ट ने इस बात को दोहराया कि अनुच्छेद 300A के तहत मुआवजे का भुगतान एक संवैधानिक दायित्व है. 

26 साल में एक्सप्रेसवे का सिर्फ 5 किमी हिस्सा हुआ पूरा 

इस परियोजना में 111 किलोमीटर का एक्सप्रेसवे, पेरिफेरल और लिंक रोड, और पांच आत्मनिर्भर टाउनशिप बनाने की योजना थी लेकिन अब तक यह पूरा नहीं हो पाया है. राज्य के हलफ़नामे का ज़िक्र करते हुए, कोर्ट ने कहा कि लगभग 26 वर्षों में प्रस्तावित एक्सप्रेसवे का सिर्फ 5 किमी हिस्सा ही पूरा हुआ. साथ ही कोर्ट ने इस बात का भी संज्ञान लिया कि अधिग्रहित ज़मीन के कुछ हिस्सों का इस्तेमाल कमर्शियल लेन-देन और निजी विकास समझौतों के लिए किया गया था. कोर्ट ने इसे "कानून और संविधान के साथ धोखाधड़ी" करार किया. कोर्ट का कहना है कि इस मामले में स्वतंत्र जांच और NICE के खातों की फ़ोरेंसिक ऑडिट होनी चाहिए. 

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डिवीज़न बेंच ने प्रभावित ज़मीन मालिकों से जुड़ी अधिग्रहण की कार्रवाई को रद्द करने के अपने पिछले आदेश को बरकरार रखा. कोर्ट के इस फैसले के साथ उन किसानों को बड़ी राहत मिली जिनकी ज़मीन दशकों से फंसी हुई थी. 
 

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