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बोरवेल में गिरते बच्चे, सेना का रेस्क्यू और फिर मातम... क्यों नहीं खत्म हो रही ये त्रासदी?

हरियाणा के अंबाला में चार साल के मासूम नितिन सिंह की बोरवेल में गिरने से मौत हो गई. 21 घंटे तक रेस्क्यू ऑपरेशन चला, लेकिन बच्चे को बचाया नहीं जा सका. यह हादसा 2006 के प्रिंस रेस्क्यू केस की याद दिलाता है, जिसे देश ने उम्मीद की मिसाल माना था. पिछले बीस साल में कई राज्यों में दर्जनों बच्चे बोरवेल में गिर चुके हैं. इसकी बड़ी वजह है बंद पड़े बोरवेल को ठीक से सील न करना और नियमों का पालन न होना.

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त्रासदियों और सुरक्षा नियमों के कमजोर क्रियान्वयन पर सवाल खड़े कर दिए हैं (Representational Photo: AI Generated)
त्रासदियों और सुरक्षा नियमों के कमजोर क्रियान्वयन पर सवाल खड़े कर दिए हैं (Representational Photo: AI Generated)

हरियाणा के अंबाला में एक बार फिर बोरवेल हादसे ने पूरे देश को झकझोर दिया है. यहां चार साल के मासूम नितिन सिंह एक खुले पड़े बोरवेल में गिर गया था. सेना और आपदा राहत टीमों ने 21 घंटे तक लगातार रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया, लेकिन बच्चे को बचाया नहीं जा सका. इस हादसे ने साल 2006 में हरियाणा के कुरुक्षेत्र में हुए प्रिंस रेस्क्यू केस की याद दिला दी है, जब देश ने एक बच्चे को बचते हुए देखा था.

साल 2006 में पांच साल के प्रिंस नाम के बच्चे की कहानी पूरे देश ने टीवी पर देखी थी. वह करीब 60 फीट गहरे बोरवेल में गिर गया था. दो दिन तक सेना के जवान, इंजीनियर और डॉक्टर मिलकर उसे बचाने में जुटे रहे. 

रेस्क्यू टीम ने बोरवेल के बगल में एक और गड्ढा खोदा और फिर बगल से रास्ता बनाकर बच्चे को सुरक्षित बाहर निकाला. उस समय यह रेस्क्यू पूरे देश के लिए एक उम्मीद की मिसाल बन गया था. लोगों को लगा था कि अब ऐसा हादसा दोबारा नहीं होगा, लेकिन ऐसा हुआ नहीं.

पिछले बीस साल में हरियाणा, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, कर्नाटक, तमिलनाडु, पंजाब और उत्तर प्रदेश जैसे कई राज्यों में दर्जनों बच्चे बोरवेल में गिर चुके हैं. कुछ बच्चों की जान बचाई जा सकी, लेकिन कई मासूमों ने अपनी जान गंवाई. 

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2012 में हरियाणा के मानेसर में मासूम माही कई दिन बोरवेल में फंसी रही और उसका शव ही बाहर निकल पाया. 2019 में पंजाब के संगरूर में फतेहवीर सिंह नाम का बच्चा 100 घंटे से ज्यादा बोरवेल में फंसा रहा, लेकिन उसे बचाया नहीं जा सका. इसी तरह तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली में सुजीत विल्सन नाम के बच्चे का शव भी कई दिन बाद बोरवेल से बरामद हुआ था.

इन हादसों की सबसे बड़ी वजह है ढीली-ढाली निगरानी और सख्त नियमों का पालन न होना. हर साल देशभर में खेती और पीने के पानी के लिए हजारों बोरवेल खोदे जाते हैं. जब बोरवेल से पानी निकलना बंद हो जाता है, तो उसे अक्सर बंद करने की बजाय वैसे ही खुला छोड़ दिया जाता है. 

यह भी पढ़ें: अंबाला: जिंदगी की जंग हार गया बोरवेल में गिरा मासूम, 21 घंटे बाद हुआ रेस्क्यू लेकिन नहीं बची जान

कुछ बोरवेल को लकड़ी के तख्तों या प्लास्टिक शीट से हल्का सा ढक दिया जाता है, तो कुछ पूरी तरह खुले रहते हैं. ये बोरवेल देखने में सिर्फ कुछ इंच चौड़े होते हैं, लेकिन जमीन के अंदर सैकड़ों फीट गहरे जाते हैं. यही वजह है कि खेलते समय बच्चे इनमें आसानी से गिर जाते हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे बंद पड़े बोरवेल को ढकने और घेरने के निर्देश दिए हैं, लेकिन इन नियमों का पालन ठीक से नहीं होता. जमीन मालिक, ठेकेदार और स्थानीय प्रशासन के बीच जिम्मेदारी बंटी रहती है, जिससे कोई भी असली जवाबदेही नहीं लेता.

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बोरवेल में फंसे बच्चे को निकालना बेहद मुश्किल काम होता है, इसलिए हर बार सेना को बुलाया जाता है. एक संकरी और गहरी सुरंग से बच्चे को सुरक्षित निकालना बड़ी मेहनत और सही तकनीक मांगता है. 

भारतीय सेना के पास ट्रेंड इंजीनियर और खास उपकरण होते हैं, इसलिए एनडीआरएफ और एसडीआरएफ के साथ मिलकर सेना ही आखिरी उम्मीद बनती है. लेकिन हर बार यह सवाल उठता है कि आखिर सेना को बार बार ऐसे हादसों से निपटने के लिए क्यों बुलाना पड़ता है, जबकि ये हादसे रोके जा सकते थे.

अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में बंद बोरवेल को सीमेंट या खास तकनीक से पूरी तरह सील किया जाता है. वहां हर बोरवेल का रिकॉर्ड रखा जाता है और जांच होती रहती है. नियम तोड़ने पर जमीन मालिक पर भारी जुर्माना लगता है. 

यूरोप के कई देशों में भी हर बोरवेल का रजिस्ट्रेशन जरूरी होता है, ताकि प्रशासन को उसकी सही जानकारी रहे. भारत में भी नियम मौजूद हैं, लेकिन उन्हें सख्ती से लागू नहीं किया जाता.

विशेषज्ञों का कहना है कि बंद बोरवेल को तुरंत सील किया जाना चाहिए और हर नए बोरवेल की जियो टैगिंग करके एक राष्ट्रीय डेटाबेस में दर्ज किया जाना चाहिए. जिला प्रशासन को समय-समय पर जांच करनी चाहिए और पंचायतों को खतरनाक बोरवेल की पहचान पहले से करनी चाहिए. 

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लापरवाही से किसी की जान जाने पर सख्त कानूनी कार्रवाई जरूरी है. ड्रोन और सैटेलाइट मैपिंग जैसी तकनीक से भी खुले बोरवेल की पहचान आसान हो सकती है.

अंबाला का यह हादसा एक बार फिर याद दिलाता है कि जब तक जमीनी स्तर पर सख्ती नहीं होगी, तब तक ऐसी घटनाएं रुकने वाली नहीं हैं.

(इंडिया टुडे वेबसाइट में प्रकाशित मूल लेख का अनुवाद)

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