15 अगस्त करीब आते ही हवा में देशभक्ति का शोर थोड़ा बढ़ जाता है. लाउडस्पीकर बजने लगते हैं, सोशल मीडिया की प्रोफाइल पिक्चर बदलने लगती हैं और स्पीच में आज़ादी की कसमें खाई जाने लगती हैं. लेकिन सवाल ये है कि आज के भारत में क्या आज़ादी की परिभाषा वही है, जो हम हर साल लाल किले से सुनते आ रहे हैं?
खासकर तब जब देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा उस पीढ़ी का है जिसे दुनिया Gen-Z यानी ज़ेन-जी कह रही है. 1997 से 2012 के बीच पैदा हुई यह जमात जब आज़ादी शब्द सुनती है, तो उसके ज़हन में सिर्फ 1947 का इतिहास या कोई खोखला नारा नहीं आता.
इनके लिए आज़ादी का मतलब बेहद प्रैक्टिकल, पर्सनल और रोज़मर्रा की जिंदगी में मिलने वाली सांस से जुड़ा है. Gen-Z कैसा सोचता है और क्या कर सकता है, इसका हल्का-सा नज़ारा अभी सभी ने जंतर-मंतर पर देखा ही है. इसलिए जब बात जेन-ज़ी और आज़ादी की होगी, तो बात अलग-अलग स्पेस की करनी होगी…
ऑफिस और आज़ादी
क्यूंकि वर्क कल्चर और वर्क फोर्स एक बड़ी बहस है, इसलिए शुरुआत इसी से करते हैं. ज़ेन-जी को समझने के लिए सबसे पहले उनके काम और ऑफिस के रिश्ते को देखना होगा. इस जेनरेशन ने कॉरपोरेट जगत के बरसों पुराने ढर्रे को एक झटके में नकार दिया है. इनके लिए नौकरी का मतलब सिर्फ महीने की 30 तारीख को अकाउंट में आने वाली सैलरी और 12 घंटे का बर्नआउट नहीं है. ये 'हसल कल्चर' को अपनी पहचान मानने से साफ इनकार करते हैं.
ज़ेन-जी दफ़्तर में भी आज़ादी ढूंढता है, जो उसके लिए मेंटल पीस, फ्लैक्सिबिलिटी और बात-बात पर टोका-टोकी से मुक्ति मिलने से आती है. वर्क-लाइफ बैलेंस इनके लिए कोई बोनस नहीं, बल्कि पहली शर्त है. अगर किसी काम में मानसिक सुकून नहीं है, तो ये उस नौकरी को लात मारने में एक मिनट का संकोच नहीं करते.
परिवार और आज़ादी
ऑफिस से अब घर की तरफ आइए, परिवार और समाज के मोर्चे पर भी यह पीढ़ी उतनी ही बेबाक है. हमारे माता-पिता वाली पीढ़ी ने हमेशा 'लोग क्या कहेंगे' के डर में अपने सपनों का गला घोंटा है. लेकिन ज़ेन-जी ने अपनी बाउंड्रीज़ खींच दी हैं. शादी कब करनी है, किससे करनी है, करियर क्या होगा या बच्चा चाहिए भी या नहीं… इन सारे सवालों के जवाब वे किसी रिश्तेदार या समाज की पंचायती से तय नहीं करते. रिश्तों में 'टॉक्सिक कम्प्रोमाइज़' करने के बजाय वे 'इमोशनल स्पेस' को चुनते हैं.
क्रिएटिविटी की आज़ादी
जेन-ज़ी की सबसे बड़ी ताकत उनकी क्रिएटिविटी है. क्यूंकि क्रिएटिविटी और तकनीक ने इस पीढ़ी को वो ताकत दी है जो शायद इतिहास में किसी के पास नहीं थी. AI, इंटरनेट और सोशल मीडिया ने इन्हें किसी बड़े बैनर, मीडिया हाउस या प्रोडक्शन कंपनी की गुलामी से आज़ाद कर दिया है.
आज बिहार या राजस्थान के किसी गांव में बैठा एक लड़का अपने फोन से वो कंटेंट बना रहा है, जो सीधे लाखों लोगों तक पहुंचता है. इनके लिए क्रिएटिविटी की आज़ादी का मतलब है, बिना किसी बिचौलिए या सेंसरशिप के अपनी बात सीधे दुनिया के आगे रखना. यही वजह है कि आज के हीरो अलग हैं, आज के इन्फ्लूएंसर अलग हैं. मेरठ में बैठा लड़का जर्मनी के एक यूट्यूबर को अपना हीरो मान सकता है, वहीं झारखंड के एक गांव का लड़का पूरी दुनिया को अपने कंटेंट का दीवाना बना सकता है.
रही बात सरकार और नागरिक अधिकारों की, तो ज़ेन-जी को नारों से बहलाना नामुमकिन है. इनके लिए आज़ादी का मतलब है सवाल पूछने का बेझिझक हक, अपनी पहचान को बिना किसी डर के जीने की आज़ादी और एक ऐसी व्यवस्था, जहां पर्यावरण से लेकर रोज़गार तक के मुद्दों पर सीधी जवाबदेही हो. इसलिए ये जेनरेशन वादों नहीं एक्शन पर विश्वास करती है.
India बनाम भारत का Gen-Z
लेकिन यहां एक पेंच है. हम अक्सर Gen-Z को एक ही चश्मे से देखने की भूल कर बैठते हैं. जैसे अभी हुआ है, जंतर-मंतर प्रोटेस्ट में शामिल लोगों को ही सब जेन-ज़ी मान बैठे हैं, उनके ट्रेंडिंग वर्ड को ही Gen-Z की लैंग्वेज मान बैठे हैं. लेकिन ये समझना ज़रूरी है कि भारत का ज़ेन-जी कोई एक सांचे में ढला हुआ ग्रुप नहीं है.
दिल्ली-मुंबई के किसी चमचमाते कैफे में हाथ में आईफोन लिए बैठे ज़ेन-जी के लिए आज़ादी का मतलब है, सोलो ट्रिप पर जाना, डिजिटल नोमैड बनना या अपनी जेंडर आइडेंटिटी को खुलकर फ्लॉन्ट करना. उसकी लड़ाई बुनियादी ज़रूरतों की नहीं, बल्कि 'लाइफस्टाइल' और 'सेल्फ-एक्सप्रेशन' की है.
लेकिन ज़रा लोकेशन बदलकर देखिए. यूपी, बिहार या एमपी के किसी टियर-3 शहर या गांव के ज़ेन-जी को देखिए. उसके लिए आज़ादी का पहला और आखिरी पायदान सिर्फ एक है, फाइनेंशियल इंडिपेंडेंस. एक पक्की नौकरी, घर की तंगहाली से मुक्ति और सामाजिक-जातिगत बंधनों को तोड़ना ही उसके लिए असली आज़ादी है. जब तक जेब में पैसा और हाथ में काम नहीं होगा, तब तक मेंटल हेल्थ या वर्क-लाइफ बैलेंस जैसे शब्द उसके लिए महज़ लक्जरी हैं.
अगर बात जेंडर के हिसाब से बदलेंगे, तो ग्रामीण इलाकों की लड़कियों के लिए आज़ादी की जंग और भी जमीनी है. उनके लिए आज़ादी का मतलब सिर्फ इतना है कि शाम 7 बजे के बाद भी बिना डर के सड़क पर निकल सकें, अपनी पढ़ाई पूरी कर सकें और कम उम्र में शादी के मंडप में धकेले जाने से खुद को बचा सकें.
यानी मेट्रो का ज़ेन-जी जहां 'पर्सनल स्पेस' की आज़ादी ढूंढ रहा है, वहीं छोटे कस्बों का ज़ेन-जी आज भी अवसरों की बराबरी की लड़ाई लड़ रहा है.
जेन-ज़ी और 2047
अब आइए 2047 के उस 'विकसित भारत' के सपने पर, जिसका ज़िक्र हर जगह होता है. जब भारत अपनी आज़ादी के 100 साल पूरे करेगा, तब यही ज़ेन-जी 35 से 50 साल की उम्र में देश की बागडोर संभाल रहा होगा. जिस जेन-ज़ी को लोग अभी कोस रहे हैं, या लापरवाह और हल्की सोच वाला कह रहे हैं, 2047 में वही देश चला रहा होगा.
2047 के भारत को लेकर इनकी सोच पारंपरिक देशभक्ति वाली नहीं है. ये सिर्फ जीडीपी के आंकड़ों या तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था के दावों से खुश होने वाले लोग नहीं हैं. ज़ेन-जी जिस भारत का सपना देखता है, वहां सांस लेने के लिए साफ हवा हो, पीने के लिए साफ़ पानी हो, क्लाइमेट चेंज को एक गंभीर संकट माना जाए और हर नागरिक को बिना किसी भेदभाव के आगे बढ़ने का मौका मिले. ये सिर्फ कंज्यूमर बनकर नहीं रहना चाहते, ये क्रिएटर और प्रॉब्लम-सॉल्वर बनना चाहते हैं.
कुल मिलाकर बात यह है कि Gen-Z के लिए आज़ादी कोई 15 अगस्त की एक दिन की परेड नहीं है, न ही यह किसी सरकार का दिया हुआ अहसान है. इनके लिए आज़ादी अपनी शर्तों पर जीने, सवाल खड़े करने, और अपनी पहचान को बिना किसी झिझक के स्वीकार करने का नाम है. 2047 का विकसित भारत तभी बनेगा, जब हम ज़ेन-जी के इन तीखे सवालों और आज़ादी की इस नई ज़िद को खारिज करने के बजाय, उनके साथ खड़े होना सीखेंगे.