ट्रांसजेंडर अधिकारों और जैविक महिलाओं के कानूनी दायरे से जुड़े संवेदनशील मुद्दे पर केंद्र सरकार जल्द ही सुप्रीम कोर्ट में अपना विस्तृत जवाब दाखिल करेगी. NGO 'वीमेंस डिक्लेरेशन इंडिया' की नई याचिका में ट्रांसजेंडर कानून के तहत 'जैविक महिलाओं' और 'ट्रांस व्यक्तियों' की पहचान पर सवाल उठाए गए हैं.
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन सदस्यीय बेंच के सामने इस मामले की सुनवाई हुई. केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने जवाब दाखिल करने के लिए अदालत से समय मांगा.
उन्होंने बताया कि नए ट्रांसजेंडर एक्ट को चुनौती देने वाली कई अलग-अलग याचिकाएं दायर की गई हैं और सरकार सभी बिंदुओं को शामिल करते हुए एक समेकित जवाब तैयार कर रही है.
जैविक महिलाओं के अधिकारों का मुद्दा
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के वकील ने अदालत के सामने तर्क रखा कि ट्रांसजेंडर कानून में 'इंटरसेक्स' और 'ट्रांस महिलाओं' को तो पहचान दी गई है. लेकिन जैविक महिलाओं का अलग से कोई जिक्र नहीं है. वकील ने कहा कि महिलाओं को मिले विशेष अधिकारों का दायरा इस तरह बढ़ाने से जैविक महिलाओं के अधिकारों का हनन हो रहा है.
उन्होंने सवाल उठाया कि महिला पुलिस अधिकारी का तलाशी लिया जाना, जांच के लिए महिला नर्स का होना, या मातृत्व अवकाश जैसी सुविधाएं सिर्फ जैविक महिलाओं के लिए हैं. इन्हें ट्रांस महिलाओं पर लागू नहीं किया जा सकता. इसके अलावा, पंचायतों में महिलाओं के लिए मिलने वाले आरक्षण के लाभ को लेकर भी सवाल खड़े किए गए.
सुरक्षा और निष्पक्षता पर सॉलिसिटर जनरल के तर्क
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने व्यावहारिक समस्याओं की बात करते हुए कहा कि मूल समस्या खुद को 'महिला या पुरुष मानने' के दावों से जुड़ी है. उन्होंने कहा कि अगर जन्म से पुरुष रहा कोई व्यक्ति खुद को महिला बताकर महिलाओं की खेल प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेता है, तो उसमें शारीरिक रूप से पुरुष जितनी ही ताकत होगी.
उन्होंने कुछ वैश्विक घटनाओं का हवाला देते हुए बताया कि जन्म से पुरुष रहे व्यक्तियों को महिलाओं की जेलों में रखने पर भी समस्याएं आई हैं. कानून-व्यवस्था का उदाहरण देते हुए SG ने कहा कि किसी महिला को सूर्यास्त के बाद गिरफ्तार नहीं किया जा सकता, लेकिन अगर कोई अपराधी अचानक दावा कर दे कि 'मैं खुद को महिला मानता हूं', तो मुश्किलें पैदा हो जाएंगी. विशेष अधिकार देना और खुद की पहचान का दावा करना- दो अलग बातें हैं.
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फिलहाल, सॉलिसिटर जनरल की ओर से सरकार का पक्ष अदालत के पटल पर रखे जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट इस मामले पर आगे की सुनवाई करेगा.