कैंसर जैसी गंभीर बीमारी का इलाज कराना पहले ही महंगा है. मरीजों को दवाओं के लिए भी कई गुना ज्यादा पैसे चुकाने पड़ते हैं. केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में माना है कि अस्पताल मरीजों से दवाओं और इलाज में इस्तेमाल होने वाली दूसरी चीजों के लिए बहुत ज्यादा कीमत वसूलते हैं. सरकार ने इसे गलत बताया है. साथ ही, इस पर रोक लगाने के लिए कदम उठाने की बात कही है.
केंद्र सरकार ने कोर्ट को बताया कि मरीजों और अस्पतालों के बीच मोलभाव की स्थिति बराबर नहीं होती. इलाज की जरूरत के चलते मरीज कई बार अस्पताल की ओर से बताई गई कीमत चुकाने को मजबूर होते हैं. सरकार ने गैर-अनुसूचित कैंसर की दवाओं पर ट्रेड मार्जिन को अधिकतम मूल्य (MRP) के 30 प्रतिशत तक सीमित करने का प्रस्ताव दिया है. सरकार का अनुमान है कि इससे दवाओं की कीमतें 20 से 70 प्रतिशत तक घट सकती हैं. इससे मरीजों को हर साल करीब 2,500 करोड़ रुपये की बचत होने का अनुमान है.
छोटी मेडिकल चीजों की कीमत तय करना चुनौती
सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाली मेडिकल उपभोग की वस्तुओं की कीमत 1 रुपये से लेकर 350 रुपये या उससे अधिक तक होती है. इन सभी पर एक समान मुनाफे की सीमा तय करना आसान नहीं है. कम कीमत वाली वस्तुओं की बिक्री में भी खर्च होता है. ऐसे में एक समान सीमा तय करने से इस खर्च को पूरा करना मुश्किल हो सकता है.
नियम बनाने के लिए चर्चा जारी
केंद्र सरकार ने कोर्ट को बताया कि इस समस्या से निपटने के लिए वह सभी संबंधित पक्षों से बातचीत कर रही है. सरकार उचित नियम बनाने की तैयारी में भी है. गैर-अनुसूचित कैंसर की दवाओं पर ट्रेड मार्जिन सीमित करने का प्रस्ताव इसी दिशा में एक कदम है. हालांकि, अभी यह प्रस्ताव है. इसे लागू करने के बाद ही पता चलेगा कि दवाओं की कीमतों में कितनी कमी आती है और मरीजों को कितनी राहत मिलती है.