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महाराष्ट्र के मंत्री छगन भुजबल को कोर्ट से बड़ी राहत, 10 साल बाद सभी मामलों से बरी

महाराष्ट्र के मंत्री छगन भुजबल को लगभग 10 वर्षों बाद कलिना लाइब्रेरी से जुड़े ACB मामले में बरी कर दिया गया है. आरोप थे कि उन्होंने मुंबई यूनिवर्सिटी की जमीन को लाइब्रेरी निर्माण के लिए दिया था, जबकि बाकी जमीन एक डेवलपर को 99 साल की लीज पर दी गई थी. स्पेशल कोर्ट ने पाया कि इसमें कोई अवैध कमाई या लेन-देन नहीं हुआ.

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कलिना लाइब्रेरी से जुड़े ACB मामले में बरी हुए छगन भुजबल (Photo: PTI)
कलिना लाइब्रेरी से जुड़े ACB मामले में बरी हुए छगन भुजबल (Photo: PTI)

महाराष्ट्र सरकार में मंत्री छगन भुजबल को लगभग 10 सालों बाद उन पर लगे सभी मामलों से बरी कर कर दिया गया है. गुरुवार को भुजबल को कलिना लाइब्रेरी से जुड़े ACB के आखिरी मामले से भी बरी कर दिया गया.

कलिना लाइब्रेरी से जुड़े ACB के जिस अंतिम मामले में भुजबल आरोपी थे, उससे उन्हें गुरुवार को बरी कर दिया गया.

क्या था मामला

दरअसल महाराष्ट्र सरकार में मंत्री छगन भुजबल पर आरोप था कि उन्होंने मुंबई यूनिवर्सिटी की कलिना में मौजूद एक अहम जमीन का टुकड़ा लाइब्रेरी बनाने के लिए सरकार को दिया था.

इस मामले में आरोप थे कि छगन भुजबल के नेतृत्व वाले PWD विभाग ने कथित तौर पर 2009 में कुल चार एकड़ जमीन के एक हिस्से पर लाइब्रेरी बनाने के लिए टेंडर जारी किए थे और बाकी जमीन एक डेवेलपर को 99 साल के लिए 1 रुपये प्रति वर्ग मीटर की दर्ज से लीज पर दे दी थी. इसे ACB ने गैर कानून बताया था. 

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इस मामले में वकील सुदर्शन खवासे ने छगन भुजबल का पक्ष रखा. मामले में भुजबल के अलावा कुछ अन्य लोगों को भी बरी कर दिया गया है. स्पेशल कोर्ट ने पाया कि इसमें कोई अवैध कमाई नहीं हुई और न ही कोई 'क्विड प्रो क्वो' (लेन-देन या बदले में कुछ पाने की बात) हुई. इस मामले में छगन भुजबल को बरी कर दिया गया है. 

कोर्ट ने क्या कहा

वहीं, मामले की सुनवाई के दौरान स्पेशल जज ने अभियोजन पक्ष की उस थ्योरी को खारिज कर दिया जिसमें कहा गया था कि मंत्री ने अपने मातहत अधिकारियों को 'अप्रत्यक्ष समर्थन' दिया था. 

जज ने कहा, "हो सकता है कि बाद में कोई प्रशासनिक फ़ैसला गलत, आर्थिक रूप से नुकसानदेह या प्रक्रिया के हिसाब से अनियमित पाया जाए. इस मामले में अभियोजन पक्ष के पास आरोपी के खिलाफ़ ऐसा कोई अतिरिक्त सबूत नहीं है."

जांचकर्ताओं का यह भी आरोप था कि भुजबल ने अपने वेलफेयर फाउंडेशन के ज़रिए कॉर्पोरेट स्पॉन्सरशिप के नाम पर ₹2.5 करोड़ की रिश्वत ली थी. हालांकि, कोर्ट को रिश्वत की कोई लिखित मांग भी नहीं मिली. जज ने इस बात पर ज़ोर दिया कि कथित गैर-कानूनी फ़ायदा सही बैंकिंग चैनलों के ज़रिए चैरिटेबल स्पॉन्सरशिप के तौर पर मिला था.

जज ने कहा, "सिर्फ़ इस बात से कि किसी सरकारी कर्मचारी से जुड़े फाउंडेशन को पैसे मिले हैं, धारा 13(1)(d) (आर्थिक फ़ायदे के लिए आपराधिक कदाचार) के तहत अपराध साबित नहीं होता." उन्होंने आगे कहा कि कथित मोडस ऑपरेंडी और कथित 'अप्रत्यक्ष समर्थन' सिर्फ़ अनुमान की बातें हैं और बिना किसी सबूत के इनसे कोई साजिश साबित नहीं होती.

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इस मामले में जज ने निष्कर्ष में कहा कि जो भी कड़ियां बताई गई वे या तो बिना किसी सबूत की हैं या फिर अभियोजन पक्ष के ही दस्तावेजों और बयानों से नहीं मिलती. 

भुजबल पर भ्रष्टाचार के दो मामले और उनसे जुड़े प्रवर्तन निदेशालय (ED) का एक मामला दर्ज किया गया था. केंद्रीय एजेंसी द्वारा 2016 में गिरफ्तार किए जाने के बाद वे दो साल से ज़्यादा समय तक जेल में रहे थे. अब उन्हें इन तीनों मामलों से बरी कर दिया गया है.

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