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रांची की बेटी ने 120 मिनट में लिखे 120 पन्ने, बनाया वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया,'अपन झारखंड' के नाम से छपेगी बुक

रांची की हिंदी लेखिका डॉ. मेघा रानी ने महज 120 मिनट में 120 मौलिक हस्तलिखित पन्ने लिखकर विश्व रिकॉर्ड बनाया है. उनकी इस उपलब्धि को 'बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड' ने मान्यता दी है. झारखंड के इतिहास और संस्कृति पर आधारित उनकी पांडुलिपि जल्द ही 'अपन झारखंड' नाम से पुस्तक के रूप में प्रकाशित होगी.

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रांची की बेटी ने 120 मिनट में लिखे 120 पन्ने, बनाया वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया (Photo: itg)
रांची की बेटी ने 120 मिनट में लिखे 120 पन्ने, बनाया वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया (Photo: itg)

झारखंड के रांची की बेटी और हिंदी लेखिका डॉ. मेघा रानी ने अपनी लेखनी से झारखंड का नाम वैश्विक मंच पर रोशन किया है. उन्होंने महज 120 मिनट में 120  पन्ने लिखकर नया विश्व रिकॉर्ड बनाया है. इस उपलब्धि को 2 जुलाई को 'बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड' ने आधिकारिक मान्यता दी. खास बात यह है कि इन 120 पन्नों में उन्होंने झारखंड के इतिहास, संस्कृति और विरासत को शब्दों में उकेरा है. अब यही पांडुलिपि 'अपन झारखंड' नामक पुस्तक के रूप में जल्द प्रकाशित होगी.

राजधानी रांची की जानी-मानी हिंदी लेखिका डॉ. मेघा रानी ने अपनी असाधारण लेखन क्षमता से एक नया इतिहास रच दिया है. उन्होंने बिना रुके सिर्फ दो घंटे में 120 मौलिक हस्तलिखित पन्ने लिखकर विश्व रिकॉर्ड अपने नाम किया. इस उपलब्धि के साथ वह दुनिया की सबसे तेज गति से हिंदी लिखने वाली महिला बन गई हैं.

इस रिकॉर्ड की शुरुआत इसी साल जनवरी में जयपुर से हुई थी. मई में दुनिया भर के जजों की मौजूदगी में ऑनलाइन लाइव वर्ल्ड रिकॉर्ड अटेम्प्ट आयोजित किया गया. सभी साक्ष्यों की जांच के बाद 'बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड' और 'इन्फ्लुएंसर बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड' ने इस उपलब्धि को मान्यता दी. अब इस रिकॉर्ड को 'लंदन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड' और 'एशियन बुक ऑफ रिकॉर्ड' में भी भेजा जा रहा है.

डॉ. मेघा पिछले सात वर्षों से नारी विमर्श और सामाजिक विषयों पर लेखन कर रही हैं. उनकी पुस्तक 'श्रीकृष्ण लीला' को पहले ही इंटरनेशनल बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में स्थान मिल चुका है. उन्हें राष्ट्रीय गौरव पुरस्कार सहित कई प्रतिष्ठित सम्मानों से भी सम्मानित किया जा चुका है.

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सबसे खास बात यह है कि विश्व रिकॉर्ड बनाने के दौरान लिखे गए सभी 120 पन्नों में झारखंड के गौरवशाली इतिहास, समृद्ध संस्कृति और परंपराओं का वर्णन किया गया है. यही पांडुलिपि अब (अपन झारखंड) नाम से पुस्तक के रूप में जल्द प्रकाशित होगी. डॉ. मेघा का कहना है कि यह उपलब्धि उनकी मातृभाषा हिंदी और जन्मभूमि झारखंड को समर्पित है, और वह चाहती हैं कि उनकी सफलता से राज्य की बेटियां और युवा प्रेरणा लें.

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