scorecardresearch
 

हिमाचल के जंगलों की कीमत है 22 हजार 6 सौ करोड़ रुपये, वन विभाग की रिपोर्ट में बड़ा दावा

हिमाचल प्रदेश के जंगलों में 22,600 करोड़ रुपये की बायो-इकॉनमी की क्षमता होने का खुलासा नई रिपोर्ट में हुआ है. रिपोर्ट के अनुसार AI और सैटेलाइट तकनीक की मदद से जंगलों के संसाधनों का टिकाऊ और लाभदायक उपयोग किया जा सकता है.

Advertisement
X
हिमाचल के जंगलों की कीमत को लेकर बड़ा दावा. (Photo: ITG)
हिमाचल के जंगलों की कीमत को लेकर बड़ा दावा. (Photo: ITG)

'काउंटिंग ग्रीन वेल्थ: टुवर्ड्स अ फ्यूचर-रेडी पीपल्स फॉरेस्ट इकॉनमी इन हिमाचल प्रदेश' नाम की एक रिपोर्ट से पता चला है कि हिमाचल के जंगलों में 22,600 करोड़ रुपये की बायो-इकॉनमी (जैव-अर्थव्यवस्था) की बड़ी छिपी हुई क्षमता है. यह कीमत इसके मौजूदा संसाधनों की दर्ज कीमत से दोगुनी से भी ज़्यादा है. हिमाचल प्रदेश वन विभाग और एक संस्थान द्वारा तैयार की गई यह रिपोर्ट बताती है कि कैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल करके पश्चिमी हिमालय में प्रकृति के पारंपरिक संरक्षण को एक लाभदायक और टिकाऊ बायो-इकॉनमी में बदला जा सकता है.

एक एजेंसी के मुताबिक बायो-इकॉनमी एक ऐसा आर्थिक मॉडल है जो जीवाश्म-आधारित ईंधन पर निर्भर रहने के बजाय भोजन, ऊर्जा, सामग्री और सेवाएं बनाने के लिए नवीकरणीय जैविक संसाधनों - जैसे फसलें, जंगल, जानवर और सूक्ष्मजीव - का उपयोग करता है.

राज्य में 5000 करोड़ का है खैर लकड़ी का कारोबार
मंगलवार को अधिकारियों ने बताया कि हिमाचल के मुख्य सचिव कमलेश कुमार पंत द्वारा आधिकारिक तौर पर जारी की गई इस रिपोर्ट में चार प्रमुख उद्योगों की रूपरेखा बताई गई है. जंगली फलों और स्वास्थ्य उत्पादों के लिए 11,340 करोड़ रुपये का बाज़ार, खतरनाक और आसानी से आग पकड़ने वाली चीड़ की पत्तियों (पाइन नीडल्स) को इको-कोल (पर्यावरण-अनुकूल कोयला) में बदलने वाला 5,500 करोड़ रुपये का सेक्टर और 5,000 करोड़ रुपये का नियंत्रित खैर की लकड़ी का कारोबार है. इसके अलावा निर्माण सामग्री व बायोफ्यूल के लिए 2,760 करोड़ रुपये का बांस का बाज़ार है. 

Advertisement

रिपोर्ट के महत्व पर ज़ोर देते हुए पंत ने कहा कि यह रिपोर्ट 'ग्रीन हिमाचल, प्रॉस्परस हिमाचल' (हरित हिमाचल, समृद्ध हिमाचल) के हमारे विज़न में एक ऐतिहासिक बदलाव का प्रतीक है. उन्होंने कहा कि पहली बार हमने स्थानीय स्तर पर पौधों और जीवों की पहचान करने की विशेषज्ञता को अत्याधुनिक सैटेलाइट इमेजिंग और AI मॉडलिंग के साथ जोड़ा है. इससे यह दिखाने के लिए एक ठोस वैज्ञानिक आधार मिलता है कि हमारे जंगल कैसे राष्ट्रीय स्तर पर जलवायु को स्थिर रखने का काम करते हैं और एक 'जन-वन अर्थव्यवस्था' बनाते हैं, जो सीधे तौर पर संरक्षण को टिकाऊ संपत्ति में बदलती है.

पुष्पेंद्र राणा, IFS डायरेक्टर (पर्यावरण, विज्ञान और प्रौद्योगिकी और जलवायु परिवर्तन) ने कहा कि हम सिर्फ़ पेड़ों को मापने के बजाय रियल-टाइम AI और सैटेलाइट मैपिंग का इस्तेमाल करके एक गतिशील जलवायु सुरक्षा प्रणाली बना रहे हैं. यह सटीक ट्रैकिंग हमें आपदाओं से अपने इलाकों को बचाते हुए ग्लोबल क्लाइमेट फंडिंग पाने के योग्य बनाती है. उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि चीड़ की पत्तियों (पाइन नीडल्स) से लगने वाली खतरनाक आग के खतरे को करोड़ों रुपये के उद्योग में बदलकर आपदा रोकथाम और आर्थिक विकास को एक साथ लाया जा सकता है.

---- समाप्त ----
Live TV

Advertisement
Latest News in Hindi »
Advertisement