पार्किंसन एक ऐसी बीमारी है जिसमें मरीज को हाथ-पैर कांपना, चलने में परेशानी और शरीर का संतुलन बिगड़ना जैसी समस्याएं होती हैं. दुनिया में इस बीमारी का कोई परमानेंट इलाज नहीं है. केवल लक्षणों को काबू में किया जाता है, लेकिन अब वैज्ञानिकों ने एक नई तकनीक का यूज किया है, जिससे बीमारी के इलाज की उम्मीद जगी है. शुरुआती ट्रायल भी सफल रहा है. तकनीक को iPS स्टेम सेल नाम दिया गया है. इस ट्रायल के नतीजों को मेडिकल जर्नल द नेचर में प्रकाशित किया गया है.
पार्किंसन में दिमाग की वे सेल्स धीरे-धीरे नष्ट होने लगती हैं, जो डोपामाइन बनाती हैं.जापान में वैज्ञानिकों ने इन सेल्स की कमी को पूरा करने की दिशा में काम किया है. यहां पहली बार एक मरीज के दिमाग में लैब में तैयार की गई स्टेम सेल से बनी सेल्स ट्रांसप्लांट की गई हैं. इस तकनीक के जरिए दिमाग में डोपामाइन बनाने वाली सेल्स को दोबारा विकसित करना है.
जापानी दवा कंपनी सुमितोमो फार्मा ने इसकी जानकारी दी. कंपनी के मुताबिक, अक्टूबर में क्योटो यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल में पहला ट्रांसप्लांट किया गया. जापानी मीडिया के अनुसार, यह ट्रांसप्लांट 50 साल से अधिक उम्र की एक महिला को किया गया है. वह अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद काम पर भी लौट चुकी हैं. हालांकि, अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि इलाज लंबे समय तक कितना असरदार साबित होगा.
यह भी पढ़ें: Healthwealth Summit: क्या जिंदगी में हर समय खुश रहना जरूरी है? न्यूरोसाइंटिस्ट ने दिया सफल जीवन का मंत्र
क्या है iPS स्टेम सेल तकनीक?
इस इलाज में इंड्यूस्ड प्लुरिपोटेंट स्टेम सेल यानी iPS सेल का इस्तेमाल किया गया है. ये ऐसी सेल्स हैं, जिन्हें शरीर की सामान्य और पहले से विकसित सेल्स को दोबारा शुरुआती अवस्था में लाकर तैयार किया जाता है. इसके बाद लैब में इन्हें खास तरह की सेल्स में बदलने के लिए विकसित किया जाता है. इस तकनीक का इस्तेमाल करते हुए वैज्ञानिकों ने हेल्दी डोनर की iPS सेल्स से डोपामाइन बनाने वाली सेल्स के शुरुआती रूप यानी प्रोजेनिटर सेल तैयार किए हैं. इन्हें मरीज के दिमाग के एक खास हिस्से में ट्रांसप्लांट किया जाता है, ताकि ये आगे चलकर काम कर सके.
सात मरीजों पर हुआ था शुरुआती ट्रायल
इस तकनीक का शुरुआती क्लिनिकल ट्रायल क्योटो यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल में सात मरीजों पर किया गया था. इनकी उम्र 50 से 69 साल के बीच थी. मरीजों के दिमाग के दोनों तरफ सेल्स ट्रांसप्लांट की गई. मेडिकल जर्नल Nature में प्रकाशित ट्रायल के नतीजों के मुताबिक, छह मरीजों में इलाज के असर का आकलन किया जा सका. इनमें से चार मरीजों के लक्षणों में सुधार देखा गया. पांच मरीजों में दवा लेने के बाद की स्थिति में भी सुधार दर्ज हुआ. हालांकि, कुछ हल्के से साइड इफेक्ट सामने आए थे.
यह भी पढ़ें: Healthwealth summit: फिट रहने के लिए जिम, महंगी डाइट जरूरी नहीं; 'इंडियाज फिटेस्ट फैमिली' ने बताया फिटनेस का मंत्र
क्या इससे पार्किंसन की बीमारी ठीक हो जाएगी?
ये रिसर्च क्लिनिकल ट्रायल में है और अभी बड़े लेवल पर इसको नहीं किया गया है. ऐसे में ये कहना अभी जल्दबाजी होगा कि इससे बीमारी पूरी तरह ठीक हो जाएगी या उसकी रफ्तार रुक जाएगी. वैज्ञानिकों का भी कहना है कि इसमें अभी और जांच की जरूरत है. जापान में भी इस थेरेपी को शर्तों और समय-सीमा के साथ मंजूरी दी थी. इसका मतलब है कि इलाज का इस्तेमाल शुरू हो सकता है, लेकिन इसकी सुरक्षा और प्रभावशीलता की आगे भी जांच करनी होगी. कंपनी मार्च 2029 तक 20 से 30 मरीजों पर ट्रांसप्लांट करने की योजना बना रही है.