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हार्ट अटैक आने का बढ़ता डर, ये महंगा टेस्ट खुद से करा रहे लोग, जानें कितनी है कीमत

पद्म श्री पुरस्कार विजेता रेडियोलॉजिस्ट डॉ हर्ष महाजन के अनुसार, बीते कुछ वर्षों में हार्ट अटैक के मामलों में वृद्धि हुई है. इसका कारण खराब लाइफस्टाइल, मानसिक तनाव और खानपान है. अब कम उम्र में भी हार्ट की बीमारियां हो रही हैं. ऐसे में समय पर जांच कराना जरूरी है.

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एंजियोग्राफी टेस्ट करा रहे लोग
एंजियोग्राफी टेस्ट करा रहे लोग

बीते कुछ सालों में जिस तरह से हार्ट अटैक से मौतें हो रही हैं उससे अब लोगों में इसका डर बैठ गया है. यह लगता है कहीं अटैक आ गया तो क्या होगा. इस डर की वजह से लोग हार्ट की जांच के लिए सामान्य टेस्ट ही नहीं बल्कि अब सबसे महंगे टेस्ट में शामिल सीटी- कोरोनरी एंजियोग्राफी जैसी जांच खुद से ही करा रहे हैं. डायग्नोस्टिक लैब वालों और डॉक्टरों का कहना है कि 3 से 4 साल पहले तक इस टेस्ट को डॉक्टर के लिखने पर ही गिनती के लोग कराते थे. लेकिन अब हर दिन 10 से 15 लोग खुद से यह जांच करा रहे हैं. 

कोरोनी एंजियोग्राफी टेस्ट हार्ट की नसों में ब्लॉकेज का पता लगाने के लिए किया जाता है. इस टेस्ट में हाथ या पैर की नस में एक बहुत ही छोटा चीरा लगाया जाता है. फिर इससे एक बहुत पतली कैथेटर को हार्ट तक पहुंचाया जाता है. फिर वहां इसकी मदद से एक डाई छोड़ी जाती है. जो एक्सरे- में हार्ट की नसों को पूरा उभरा हुआ और साफ दिखाती है. इससे हार्ट की नसों में कितनी ब्लॉकेज है इसका पता चलता है. ब्लॉकेज ज्यादा है तो फिर स्टेंट डलवाने की सलाह दी जाती है. अगर कम है तो दवाओं से काम चल सकता है.

कोरोनी एंजियोग्राफी टेस्ट दो प्रकार का होता है. एक सामान्य एंजियोग्राफी और दूसरा सीटी- कोरोनरी एंजियोग्राफी टेस्ट, सीटी कोरोनरी एंजियोग्राफी में शरीर में कोई कैथेटर नहीं डाला जाता है. हाथ की नस में डाई का इंजेक्शन देकर सीटी स्कैन मशीन से हार्ट की तस्वीरें ली जाती हैं. इसमें 15 से 20 मिनट का समय लगता है और 3 डी इमेज मिलती है, हालांकि ये टेस्ट महंगा होता है. इसमें 8 हजार से 25 हजार तक का खर्च आ सकता है. 

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खुद से ही कोरोना एंजियोग्राफी करा रहे हैं लोग

पद्म श्री पुरस्कार विजेता और देश के जाने माने रेडियोलॉजिस्ट डॉ हर्ष महाजन बताते हैं उनके यहां बीते कुछ सालों में कोरोनी एंजियोग्राफी कराने वालों की संख्या बढ़ी है. पहले दिन में 2,3 मरीज इसको कराने आ जाएं तो बड़ी बात होती थी, लेकिन अब रोज 5 से 10 मरीज इसको कराने आते हैं. इनमें कई ऐसे होते हैं जो खुद ही इस टेस्ट को कराते हैं. इसको हार्ट अटैक आने का डर या बीमारी के प्रति जागरूकता कह सकते हैं. 

डॉ महाजन कहते हैं कि कोरोना एंजियोग्राफी टेस्ट कराने के लिए जो लोग आते हैं उनमें युवाओं की संख्या भी काफी रहती है. ये लोग कहते हैं कि उनका ये टेस्ट कर दें ताकि समय रहते हार्ट की ब्लॉकेज का पता लग जाए. चूंकि यह एक प्रिवेंटिव हेल्थ चेकअप है तो जो लोग आते हैं उनका यह जांच कर दी जाती है. 

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 लोग खुद ही कहते हैं कि डॉक्टर साहब ये टेस्ट लिख दो

मेदांता मूलचंद अस्पताल में कार्डियोलॉजी विभाग में हेड प्रोफेसर डॉ. तरुण कुमार बताते हैं कि ओपीडी में अमूमन रोज ही ऐसे मरीज आते हैं जो कहते हैं कि उनको डर है कहीं हार्ट अटैक न आ जाए. ऐसा उन लोगों में ज्यादा देखा जाता है जो रोज जिम जाते हैं. इस डर के कारण वह कहते हैं कि डॉक्टर साहब हार्ट के जो भी टेस्ट हैं वो लिख दीजिए हम करा लेंगे.कुछ मरीज एंजियोग्राफी भी लिखने को कहते हैं, जबकि ये टेस्ट काफी महंगा है. इसमें 7 से लेकर 20 हजार रुपये भी लग सकते हैं. रेट लैब के आधार पर अलग- अलग हो सकते हैं. 

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किसको है एंजियोग्राफी की जरूरत

डॉ कुमार कहते हैं कि  हर मरीज के सभी टेस्ट नहीं लिखे जाते हैं. पहले उससे उसकी हिस्ट्री ली जाती है कि वह स्मोकिंग करता है या नहीं, हाई बीपी तो नहीं है और परिवार में किसी को दिल की बीमारी की हिस्ट्री तो नहीं है. अगर किसी व्यक्ति को इनमें से कुछ नहीं है तो फिर एक सामान्य ई.सी.जी टेस्ट, एक्स-रे, बीपी चेक और लिपिड प्रोफाइल टेस्ट कराने की सलाह दे देते हैं. लेकिन अगर किसी में दिल की बीमारी के रिस्क फैक्टर होते हैं तो फिर उसको 2डी इको कराने की सलाह देते हैं. अगर इको में कुछ गड़बड़ होती है तो फिर सीटी एंजियोग्राफी की जाती है. 

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कम उम्र में क्यों हो रहे हैं हार्ट अटैक

डॉ कुमार कहते हैं कि हार्ट अटैक कम उम्र में होने के कई कारण हैं. अब लाइफस्टाइल खराब हो गया है. युवा मानसिक तनाव ले रहे हैं. खानपान का ध्यान नहीं रखते हैं ये सभी फैक्टर कम उम्र में हार्ट अटैक का कारण बन रहे हैं. कोरोना महामारी के बाद यह समस्या ज्यादा देखी जा रही है. हालांकि वायरस या वैक्सीन से हार्ट अटैक के मामले बढ़ने का कोई संबंध नहीं है, लेकिन अब केस ज्यादा आ रहे हैं. 

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कुछ मरीज एंग्जाइटी का भी शिकार होते हैं. घबराहट की वजह से हार्ट बीट तेज हो जाती है. ऐसा हार्ट की बीमारी से नहीं बल्कि एंग्जाइटी से होता है. उन्हें घबराहट रहती हैं कि कहीं अटैक न आए जाए, हालांकि उनमें कोई रिस्क फैक्टर नहीं होता है. ऐसे मरीजों को हम एंग्जाइटी कंट्रोल करने की सलाह देते है. इसके लिए काउंसलिंग, मेडिटेशन और कुछ मामलों में दवाओं की जरूरत पड़ती है. 
 

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