एक डॉक्टर का गुस्सा कई चीजों को बयां कर सकता है. लेकिन जाने-माने रोबोटिक गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल और बैरिएट्रिक सर्जन तथा ओबेसिटी एक्सपर्ट डॉ. अंशुमान कौशल (जिन्हें सोशल मीडिया पर 'The Angry Doc' के नाम से जाना जाता है) के गुस्से के पीछे एक अलग ही वजह है. उनका यह गुस्सा किसी मरीज पर नहीं, बल्कि उन लोगों पर फूटता है जो बीमारी के नाम पर डर फैलाते हैं और लोगों की मजबूरी का फायदा उठाकर मुनाफा कमाते हैं.
आजतक हेल्थ वेल्थ समिट के पहले दिन 'Doctor vs Internet Education' सत्र के दौरान डॉ. अंशुल कौशल ने डिजिटल दौर में फैलती मेडिकल मिसइन्फॉर्मेशन और सोशल मीडिया के काले सच पर खुलकर बात की. आइए जानते हैं उनके इस दिलचस्प और आंखें खोल देने वाले सेशन की बड़ी बातें...
क्यों पड़ा नाम 'द एंग्री डॉक'?
इस नाम के पीछे की कहानी बताते हुए डॉ. कौशल ने एक पुराना वाकया साझा किया. अस्पताल की एक कैंटीन में उन्हें अपनी एक पुरानी मरीज के बारे में फोन आया था, जिनकी ब्रेस्ट कैंसर की बीमारी बढ़ चुकी थी. उन्होंने तीन महीने पहले ही मरीज को टेस्ट कराने की सलाह दी थी, क्योंकि उन्हें शक था. लेकिन मरीज ने कहीं और से अल्टरनेटिव ट्रीटमेंट ले लिया, जिससे बीमारी और फैल गई.
उस घटना ने उन्हें अंदर से झकझोर दिया था. पास बैठे लोगों ने उनका गुस्सा देखा और उन्हें 'द एंग्री डॉक' कहना शुरू कर दिया और यह नाम हमेशा के लिए टिक गया. सरकारी अस्पताल में अपनी पोस्टग्रेजुएशन ट्रेनिंग के दिनों को याद करते हुए उन्होंने कहा कि वे अक्सर मरीजों को महंगे फूड आइटम्स के बजाय सस्ते और पौष्टिक विकल्प जैसे चना, सत्तू और अंडे खाने की सलाह देते थे, ताकि उन्हें कम खर्च में पूरा प्रोटीन मिल सके. उन्होंने दो टूक कहा कि मेरा वह गुस्सा उन लोगों के खिलाफ है जो डर बेचते हैं और उस पर अपना बिजनेस खड़ा करते हैं.
'अब लोगों की पहली OPD इंस्टाग्राम और गूगल पर होती है'
डॉ. कौशल का मानना है कि आज के दौर में डॉक्टर सोशल मीडिया से मुंह नहीं मोड़ सकते, क्योंकि मरीज डॉक्टर के पास जाने से पहले इंटरनेट पर सब कुछ खंगाल चुका होता है. एक सर्वे का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि करीब 72 फीसदी लोग स्वास्थ्य संबंधी जानकारी के लिए गूगल या इंस्टाग्राम का सहारा लेते हैं.
यदि किसी को ब्रेस्ट में गांठ मिल जाए, तो वह तुरंत ऑनलाइन सर्च करता है. इसके बाद एल्गोरिदम उसे वैसी ही वीडियो दिखाने लगता है. यदि उन जानकारियों में झूठे दावे और डर फैलाने वाली बातें हों, तो वे मरीज के मेडिकल फैसलों को गलत दिशा में मोड़ सकती हैं.
उन्होंने जोर देकर कहा कि आज के समय में 'बिना किसी हिडन एजेंडा के एविडेंस-बेस्ड (साक्ष्यों पर आधारित) जानकारी' सबसे बड़ी जरूरत है. डॉक्टरों को बिना किसी कमर्शियल हित या अपना प्रॉडक्ट बेचने के चक्कर में पड़े लोगों को सही शिक्षा देनी चाहिए.
मरीज और डॉक्टर का रिश्ता अब 'कमांडर-फॉलोअर' नहीं, बल्कि 'पार्टनरशिप' है
डॉ. कौशल इस बात के बिल्कुल खिलाफ हैं कि मरीजों को इंटरनेट पर अपनी बीमारी के बारे में पढ़ने से रोका जाए. वे इसका स्वागत करते हैं. उन्होंने कहा कि जानकारी की कोई कमी नहीं है, कमी है तो क्रेडिबिलिटी (विश्वसनीयता) और जिम्मेदारी लेने वाले शख्स की.
वे मरीजों को प्रोत्साहित करते हैं कि वे खुलकर बताएं कि उन्होंने क्या पढ़ा है और उनके मन में क्या डर है. इससे डॉक्टर और मरीज के बीच बातचीत बेहतर होती है और फाइनेंशियल कंस्ट्रेंट (आर्थिक तंगी) या फैमिली बैकग्राउंड को ध्यान में रखकर इलाज तय किया जाता है.
आज की Gen-Z जनरेशन पूरी तरह से पारदर्शिता, एविडेंस-बेस्ड जानकारी और जवाबदेही चाहती है. अब दौर बदल चुका है, यह सिर्फ डॉक्टर के निर्देश देने और मरीज के चुपचाप मानने का नहीं, बल्कि 'पार्टनरशिप' का दौर है.
क्या ChatGPT या AI आपकी सेहत ठीक कर सकता है?
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि यह हेल्थकेयर का एक अटूट हिस्सा बनने जा रहा है, लेकिन यह इस बात पर निर्भर करता है कि हम इसका इस्तेमाल कैसे करते हैं. AI मरीज की मेडिकल हिस्ट्री को व्यवस्थित करने, रिपोर्ट्स का सारांश तैयार करने और डॉक्टर के सामने साफ-सुथरे तरीके से बात रखने में मदद कर सकता है, जिससे कंसल्टेशन का समय बचता है.
लेकिन AI से यह पूछना कि मुझे कौन सी बीमारी है या कौन सी दवा लेनी चाहिए, बिल्कुल गलत है. उदाहरण के तौर पर, सिरदर्द जैसी आम समस्या को भी यदि किसी AI चैटबॉट में डाला जाए, तो वह कई डरावनी और बड़ी बीमारियों की लिस्ट सामने रख देगा, जबकि असली वजह बहुत सामान्य हो सकती है.
'फैसला लेने की शक्ति सिर्फ और सिर्फ डॉक्टरों के पास है.' क्लिनिकल कॉन्टेक्स्ट, जवाबदेही और भरोसा केवल एक इंसान (डॉक्टर) ही दे सकता है.
डॉक्टरों का सोशल मीडिया पर कोई 'छिपा एजेंडा' नहीं होना चाहिए
अपने वीडियो खुद स्क्रिप्ट करने वाले डॉ. कौशल कहते हैं कि उनके दादाजी एक थिएटर आर्टिस्ट और गीतकार थे, इसलिए उन्हें शब्दों की ताकत और कहानी कहने के हुनर की समझ विरासत में मिली है. उनके वीडियो में इमोशन, सटायर और मेडिकल जानकारी का मेल होता है, लेकिन वे अटेंशन पाने के लिए कभी भ्रामक दावों का सहारा नहीं लेते.
वे मानते हैं कि शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को अलग नहीं किया जा सकता. मरीज डॉक्टर के पास बीमारी के साथ-साथ अपने परिवार की जिम्मेदारी और एंग्जायटी का बोझ भी लेकर आता है, जिसे डॉक्टर को समझना चाहिए.
उन्होंने समाज से अपील की कि हर वायरल हेल्थ क्लेम पर आंख मूंदकर भरोसा करने के बजाय साइंटिफिक टेम्परेचर (वैज्ञानिक सोच) विकसित करें और दावों की सच्चाई की जांच जरूर करें.