जब घर में एक छोटा बच्चा होता है, तो सबसे बड़ी चिंता उसकी सेहत और खानपान को लेकर होती है. बच्चा खुद बोलकर अपनी तकलीफ बता नहीं सकता, ऐसे में मां-बाप की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है. लेकिन आज के समय में पैरेंट्स के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि बच्चे आखिर बार-बार बीमार क्यों पड़ रहे हैं? क्या मोबाइल स्क्रीन और गलत खानपान हमारे बच्चों का बचपन छीन रहा है?
आजतक हेल्थ वेल्थ समिट के बेहद लोकप्रिय सत्र 'बच्चे रहें ऐसे' में मलिक रेडिक्स हेल्थ केयर के सीएमडी व वरिष्ठ पीडियाट्रिशियन डॉ. रवि मलिक और 'अपना घर आश्रम' की फाउंडर व पीडियाट्रिशियन डॉ. माधवी भारद्वाज ने इन तमाम मुद्दों पर दिल खोलकर बात की. सत्र का संचालन आज तक आउटपुट के सीनियर प्रोड्यूसर राजीव ढौंडियाल ने किया. आइए जानते हैं इस सत्र में बच्चों की सेहत और पेरेंटिंग से जुड़ी कौन-कौन सी बड़ी बातें सामने आईं.
5 साल से छोटे बच्चों को साल में 6 से 8 बार बुखार आना 'नॉर्मल' है!
अक्सर मां-बाप क्लिनिक में यह शिकायत लेकर आते हैं कि उनके बच्चे की इम्यूनिटी बहुत कमजोर है और वह बार-बार बीमार पड़ता है. इस पर डॉ. रवि मलिक ने स्पष्ट किया. उन्होंने कहा कि 10 साल से छोटे और खासकर 5 साल से कम उम्र के बच्चों को, जो स्कूल जाना शुरू करते हैं, साल में 6 से 8 बार वायरल फीवर होना बिल्कुल सामान्य है.
जब बच्चे अलग-अलग तरह के वायरसों (जैसे एडेनोवायरस, रेस्पिरेटरी सिंकाइटियल वायरस आदि) के संपर्क में आते हैं, तो उनकी प्राकृतिक इम्यूनिटी मजबूत होती है. कब घबराएं? के सवाल पर डॉ मलिक ने बताया कि यदि बुखार के साथ बच्चा बहुत सुस्त हो जाए, सांस बहुत तेज चलने लगे, दस्त (डायरिया) या डिहाइड्रेशन की समस्या हो जाए, या शरीर पर रैशेज आ जाएं, तो बिना देर किए तुरंत डॉक्टर या इमरजेंसी के पास जाएं.
बच्चों को बीमारियों से बचाने के मूल मंत्र
डॉ. मलिक ने बच्चों को बार-भाग बीमार होने से बचाने के लिए कुछ बेहद जरूरी बातें बताईं. बच्चों के मामले में वाटर, मिल्क और फूड हाइजीन का विशेष ध्यान रखें, ताकि टाइफाइड और डायरिया जैसी वाटर-बर्न बीमारियों से बचाव हो सके. कई बार मां-बाप बच्चों के जरूरी टीके मिस कर देते हैं, जिससे चिकनपॉक्स या हेपेटाइटिस जैसी बीमारियां घेर लेती हैं. समय पर सभी टीके लगवाएं. बच्चे को जन्म के बाद से ही नियमित रूप से विटामिन डी दें और उन्हें आउटडोर एक्टिविटीज के लिए प्रेरित करें.
दिल्ली-NCR के प्रदूषण से बच्चों को कैसे बचाएं?
डॉ. माधवी भारद्वाज ने बढ़ते प्रदूषण पर चिंता जताते हुए कहा कि पॉल्यूशन सिर्फ फेफड़ों को ही नहीं, बल्कि बच्चों के ब्रेन, किडनी और लिवर तक को प्रभावित करता है और उनकी इम्यूनिटी को कमजोर करता है.
एहतियात: जब हवा का स्तर खराब हो, तो बच्चों की आउटडोर गतिविधियां बंद कर दें और घर के अंदर ही उन्हें व्यस्त रखें.
डिटॉक्स और डाइट: बच्चों की डाइट में ओमेगा-3 और ओमेगा-6 फैटी एसिड (नट्स और सीड्स) शामिल करें और भरपूर पानी पिलाएं.
एडल्ट्स की सावधानी: यदि घर में बड़े लोग भी बीमार हैं या थोड़ा सा भी जुकाम-खांसी है, तो छोटे बच्चों से दूरी बनाकर रखें. आपका मामूली सा वायरल बच्चे के लिए गंभीर निमोनिया बन सकता है.
पेरेंट्स की 5 बड़ी गलतियां, जो बच्चों का भविष्य बिगाड़ रही हैं
डॉ. रवि मलिक ने अपने 40 साल के लंबे अनुभव के आधार पर बताया कि पेरेंटिंग में मां-बाप सबसे बड़ी गलतियां क्या करते हैं.
बाउंड्री न बनाना: आज के समय में बच्चे तय करते हैं कि वे क्या खाएंगे और कितनी देर स्क्रीन देखेंगे. पेरेंट्स गिल्ट में आकर बच्चों को मना नहीं करते.
अनहेल्दी कंपेरिजन: शर्मा जी के बेटे से अपने बच्चे की तुलना करना बंद करें. हर बच्चे की अपनी क्षमता और स्ट्रेंथ होती है. तुलना करने से बच्चे हीन भावना का शिकार हो जाते हैं और उनका कॉन्फिडेंस टूट जाता है. बच्चे सुनने से ज्यादा देखकर सीखते हैं. अगर आप खुद घंटों फोन देखेंगे और बच्चे को रोकेंगे, तो वह कभी नहीं मानेगा.
यदि आपने बच्चे से कोई वादा किया है (जैसे पिकनिक या गिफ्ट का) और आप उसे पूरा नहीं करते, तो बच्चे के मन में यह असुरक्षा बैठ जाती है कि यह दुनिया सुरक्षित नहीं है.
शारीरिक दंड या डर दिखाना: बच्चों को मारना-पीटना या धमकाना पूरी तरह बंद होना चाहिए. इससे बच्चे बड़े होकर डीड और पैरानॉयड हो जाते हैं.
जिद्दी बच्चे और टॉडलर का व्यवहार
डॉ. माधवी भारद्वाज ने समझाया कि 9 महीने के बाद बच्चों का दिमाग दुनिया को एक्सप्लोर करना शुरू करता है. वे ऐसी चीजें करते हैं जिनके परिणाम उन्हें नहीं पता होते और मां-बाप हर बात पर उन्हें 'नो, नो' बोलते हैं. जब आप हर बात पर मना करते हैं, तो 'नो' की वैल्यू खत्म हो जाती है.
अगर आपका बच्चा जिद्दी हो रहा है, तो एक बार अपने गिरेबान में झांककर देखें कि कहीं आपकी अपनी एनर्जी या व्यवहार में तो जिद नहीं है? बच्चों के साथ थोड़ा पेशेंस रखना जरूरी है.
मोबाइल स्क्रीन: बच्चों के लिए 'डेंजरस पैसिफायर'
0 से 2 साल: बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम बिल्कुल जीरो (Absolute Zero) होना चाहिए.
2 से 5 साल: दिनभर में केवल 1 घंटा (वह भी सुपरवाइज्ड तरीके से).
मील टाइम पर स्क्रीन खतरनाक: यदि आप बच्चे को खाना खिलाते वक्त टीवी या मोबाइल दिखाते हैं, तो बच्चा अपने हंगर क्यूज़ (भूख और पेट भरने के संकेत) को पहचानना भूल जाता है, जिससे वह भविष्य में मोटापे का शिकार हो जाता है.
लत कैसे छुड़ाएं? बच्चों का स्क्रीन टाइम कम करने के लिए सबसे पहले पेरेंट्स को अपना स्क्रीन टाइम कम करना होगा. इसके बाद बच्चों को इंडोर गेम्स, डांसिंग, प्रिटेंड प्ले और आउटडोर गतिविधियों मेंंगेज करें.
बचपन का मोटापा: भविष्य की बड़ी बीमारी
डॉ. माधवी और डॉ. रवि ने इस बात पर जोर दिया कि हमारे देश में आज भी 'गप्पू' या बहुत मोटे बच्चे को स्वस्थ मान लिया जाता है, जो कि एक बहुत बड़ी गलतफहमी है. एक साल के बाद बच्चों का वजन बढ़ना धीमा हो जाता है और वे लीन होना शुरू होते हैं.
लेकिन मां-बाप फोर्स फीडिंग (जबरदस्ती खाना खिलाना) और स्क्रीन दिखाकर उनका पेट भरते रहते हैं, जिससे उनके टेस्ट बड्स खराब हो जाते हैं और वे घर के खाने के बजाय जंक फूड (मोमोज, मैगी, पिज्जा) के आदी हो जाते हैं. बचपन का मोटापा आगे चलकर हाइपरटेंशन, डायबिटीज और दिल की बीमारियों का रास्ता खोल देता है.
6 महीने के बाद दूध और डेयरी प्रोडक्ट्स कितने जरूरी?
6 महीने के बाद बच्चे को बैलेंस्ड डाइट की जरूरत होती है. मां का दूध सर्वोत्तम है, लेकिन अगर किसी कारणवश फॉर्मूला मिल्क या एनिमल मिल्क देना पड़े, तो एक साल के बाद बच्चे को 400 से 500 mL से ज्यादा दूध देना नुकसानदायक हो सकता है. यदि बच्चा दिनभर में 1 लीटर दूध ही पीता रहेगा, तो वह ठोस चीजें (सीरियल्स, दालें, फल, सब्जियां) नहीं खाएगा, जिससे उसे आयरन की कमी और कब्ज जैसी समस्याएं हो सकती हैं.