विजय के हर फैन को उनकी फिल्मों से वो एक मोमेंट जरूर याद है― जो स्टंट नहीं है. पंच भी नहीं. बस एक पॉज है. एक स्पीच है. या एक लुक है जो जरूरत से बस एक सेकंड ज्यादा स्क्रीन पर टिका रहता है. क्योंकि थलपति विजय का राजनीतिक सफर ब्रेकिंग न्यूज की तरह, धमाकेदार तरीके से नहीं शुरू हुआ. असल में ये सफर फ़िल्म दर फ़िल्म आगे बढ़ा. उनका राजनीति के मंच पर आना यूं हुआ जैसे हमने उन्हें रील लाइफ से रियल लाइफ तक उस किरदार में ढलते देखा, जिसमें हम पहले ही उन्हें स्वीकार कर चुके थे.
2012 में आई थुपक्की (गन) को मुड़कर देखिए. ऊपर से ये एक झन्नाटेदार एक्शन फिल्म थी. मगर शानदार चेज सीक्वेंस और स्वैग के पीछे एक नैतिक स्पष्टता थी. विजय सिर्फ विलेन से नहीं लड़ रहे थे― वो एक बड़ी चीज बचा रहे थे. उनमें एक अनुशासन, एक ठहराव था और अडिग होकर चुपचाप अपनी ड्यूटी करने का भाव था. इसमें पॉलिटिक्स जैसा कुछ नहीं था, लेकिन दर्शकों ने उन्हें पहली बार एक ऐसे व्यक्ति के रूप में देखा जो जिम्मेदारी उठा सकता है.
फिर 2014 में कत्थी (छुरी) आई, और कुछ बदल गया. आप थिएटर्स में बदलाव की आवाज सुन सकते थे― सीटियां थम गईं, तालियां थोड़ी रुककर आईं, एक भारीपन साथ लिए हुए. ये अब सिर्फ फैनडम नहीं था, जनता की सहमति थी. बहुत लोगों के लिए ये पहला मौका था जब विजय एक फ़िल्म स्टार से बढ़कर, एक आवाज बनने लगे थे. 2014 की जिल्ला (जिला) और 2016 की थेरी (चिंगारी) में भी विजय एक ही बात हाईलाइट कर रहे थे― सिस्टम हमेशा उस तरह नहीं चलता, जैसे वो चलना चाहिए. शक्तियों का गलत इस्तेमाल होता है. चूक होते ही जनता का नुकसान होता है. लेकिन किसी को तो आगे आना पड़ेगा. विजय का ये आईडिया फिल्मों में इसलिए काम कर रहा था क्योंकि वो कोई सुपरहीरो नहीं थे, अपने जैसे थे, जिनसे कनेक्ट किया जा सकता था.
जबतक 2017 में मर्सल (तबाह) रिलीज हुई, दर्शक सिर्फ विजय को नहीं देख रहे थे― उनकी आवाज सुनने लगे थे. इस फ़िल्म ने हेल्थकेयर, भ्रष्टाचार, असमानता की बात की. लेकिन ध्यान देने वाली बात सिर्फ मुद्दे नहीं थे― मुद्दों के प्रति ईमानदारी थी. उन्होंने जिस तरह अपनी लाइनें बोलीं वो एक्टिंग परफॉर्मेंस से आगे की बात थी. ऐसा लगा मानो वो एक ऐसी भीड़ की आवाज उठा रहे हैं, जिसे कोई नहीं सुनता. और फिर 2018 में आई सरकार. विजय की पिछली फिल्में पॉलिटिक्स की तरफ इशारा कर रही थीं, सरकार ने सीधा पॉलिटिक्स की ही बात की.
आईडिया सिंपल था― क्या हो अगर आपसे आपका वोट छीन लिया जाए? लेकिन इसका असर कतई सिंपल नहीं था. ये एक लाइन दर्शकों के लिए बहुत पर्सनल हो गई. क्योंकि ये कोई सामाजिक ज्ञान की बात नहीं है, ये हर व्यक्ति का अधिकार है. इसमें गड़बड़ी की बात से तुरंत कान खड़े हो जाते हैं. एक सीन है जिसमें किरदार तय करता है कि ‘जाने नहीं दे सकते’. लड़ना पड़ेगा, जवाब मांगना पड़ेगा. और उस एक पल में एक एक्टर और दर्शक के बीच गैप और कम हो गया. ऐसा लगा ही नहीं कि वो कहानी कह रहे हैं. लगा कि वो सवाल कर रहे हैं― आप क्या करेंगे? बड़े पर्दे से उतरा ये सवाल, थिएटर्स के बाहर भी गूंजने लगा. और विजय ने तय किया हो या नहीं, पर असली राजनीतिक चर्चाओं का हिस्सा बन चुके थे.
2019 में बिगिल (सीटी) के साथ उनका लहजा थोड़ा नर्म हुआ, लेकिन इरादा बिल्कुल नहीं. यहां लीडरशिप का मतलब भिड़ जाना नहीं था. इसमें दूसरों को आगे बढ़ाने की, उन्हें जगह देने की बात थी. आगे खड़े होने की बजाय, पीछे खड़े होने की बात थी. एक महिला फुटबॉल टीम को कोचिंग देना ऊपर से पॉलिटिकल भले न लगे. लेकिन इसने जो इमोशंस छुए वो बहुत सामाजिक थे― मौका, सम्मान, विश्वास.
2021 में मास्टर आई. इस बार वो एक आदर्श किरदार नहीं थे. उनमें कमियां थीं, बिखराव था. कई मौके पर वो गैर जिम्मेदार थे. लेकिन जब जरूरत पड़ी, वो तुरंत हरकत में आए. आगे बढ़कर खड़े हुए, हर उस बदलाव के लिए जो वो ला सकते थे. मास्टर में कॉलेज चुनाव के सीन्स देखने में छोटे लग सकते हैं, लेकिन उनमें बड़ा मैसेज छिपा था. जे डी बनकर विजय सिर्फ एक व्यक्ति से लड़ने नहीं आगे आए, बल्कि वो एक टूटे सिस्टम को जोड़ रहे थे. इस फ़िल्म ने बहुत धीरे से दिखाया कि जब हेराफेरी होने लगती है तो चुनाव अपना मतलब ही खो देते हैं.
अबतक एक बदलाव नजर आने लगा था. लोग विजय की फिल्में सिर्फ देख नहीं रहे थे, उनमें मैसेज खोज रहे थे. विजय का इरादा पकड़ने की कोशिश में, एक-एक फ्रेम तोड़-मरोड़ कर देख रहे थे.
इसलिए जब 2026 में जन नायगन (जन नेता) की एंट्री हुई, तो इसमें कोई सरप्राइज नहीं था. ये विजय के अगले तार्किक कदम जैसा था. लगा जैसे उनकी पिछली कहानियां इसी का मंच तैयार कर रही थीं. क्योंकि इतने सालों में विजय चुपचाप एक दमदार काम कर चुके थे― वो लगातार डटे हुए थे. विचारधारा को या मैसेज को लेकर नहीं, बल्कि इमोशंस को लेकर. जिस तरह के मुद्दे उन्होंने उठाए, जिस तरह के किरदार अलग-अलग फिल्मों में निभाए― रक्षक के, चैलेंजर के, सुधारक के. सबमें दर्शकों के साथ वही भावनात्मक लगाव बना हुआ था. और लगातार डटे रहना बहुत मायने रखता है.
भाषणों और रैलियों के जरिए नैरेटिव गढ़ने वाले पारंपरिक नेताओं से उलट, विजय ने अपना नैरेटिव सिनेमा से गढ़ा. स्क्रीन पर बार-बार दिखकर, जनता से पहचान बनाकर. उन्हें दर्शकों को यकीन दिलाने की कोई जरूरत नहीं थी. दर्शक सालों-साल के अभ्यास से उनका नैरेटिव स्वीकार कर चुके थे. थिएटर में उठी हर सीटी सिर्फ उत्साह नहीं थी, विजय का प्रचार थी. दर्शकों में सिर्फ फैनडम नहीं, विजय का डायलॉग महीनों दोहराया गया, उन्हें याद भी किया गया. इसलिए जब विजय राजनीति के मंच पर आए, तो इसमें छलांग जैसा कोई भाव नहीं था. इसमें पहचान मिलने का भाव था. मानो कोई चीज जो गुपचुप तैयार हो रही थी, आज सबकी आंखों के सामने है.
तमिलनाडु में सिनेमा और राजनीति का कनेक्शन नया नहीं है. एम जी आर और जे जयललिता जैसे लेजेंड्स ने अपनी स्क्रीन इमेज की नींव पर शानदार राजनीतिक करियर खड़े किए. तमिलनाडु से हटकर देखें तो आंध्र प्रदेश में एन टी आर ने भी सिनेमाई करिश्मे को चुनावी ताकत में बदला. लेकिन विजय का सफर अलग लगता है क्योंकि उनसे पहले के स्टार सिर्फ एक्टिंग नहीं कर रहे थे, वो बड़े पर्दे पर भी पावर की पहचान थे.
एम जी आर एक परोपकारी रक्षक की इमेज में आते थे. एन टी आर अक्सर भगवानों के किरदार में दिखते थे. जयललिता ने एक ऐसी विरासत को आगे बढ़ाया था, जिसके पीछे पहले से राजनीतिक बाहुबल था. इनका सिनेमा अधिकार जताने, नेतृत्व करने और अपराजेय होने का भाव जताता था. इसलिए जब ये लोग राजनीति में उतरे तो इनकी वही ‘लार्जर दैन लाइफ’ इमेज, रियल लाइफ में भी उतर आई. लेकिन थलपति विजय के ट्रांजिशन में परतें हैं. उनका ये रूपांतरण धीरे-धीरे हुआ है, इसमें जनता की हिस्सेदारी है. उन्होंने पर्दे पर ही राजनीतिक आइकॉन बनकर शुरुआत नहीं की, वो धीरे-धीरे नेता बने. और शायद इसीलिए, आखिरकार जब विजय राजनीति में उतरे तो ये नहीं लगा कि वो आपसे विश्वास चाहते हैं. ऐसा लगा कि विश्वास वो पहले ही कमा चुके हैं. उन्हें बस एक काम करना था… इस किरदार में उतरना था.
और इस बार हकीकत में!
(इनपुट: Samkhya Edamaruku)