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The Odyssey: कैसी है 2500 करोड़ में बनी फिल्म? जिसे देखने को बेताब हैं सिनेमा लवर्स

डायरेक्टर क्रिस्टोफर नोलन की फिल्म 'द ओडिसी' को लेकर इस समय पूरी दुनियाभर में चर्चा हो रही है. फिल्म शुक्रवार को सिनेमाघरों में रिलीज होने वाली है. अगर आप इसे देखने का प्लान बना रहे हैं, तो जानें कैसी है ये फिल्म.

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फिल्म 'द ओडिसी' का रिव्यू (Photo: Universal Pictures)
फिल्म 'द ओडिसी' का रिव्यू (Photo: Universal Pictures)

डायरेक्टर क्रिस्टोफर नोलन जब भी कैमरे के पीछे खड़े होते हैं, तो दर्शकों को पता होता है कि वे सिनेमा के पर्दे पर कुछ ऐसा देखने जा रहे हैं जो इतिहास रचने वाला है. इस बार नोलन ने करीब 3,000 साल पुरानी साहित्यिक रचना को पर्दे पर उतारने का वो नामुमकिन सा दिखने वाला काम कर दिखाया है, जिसे छूने की हिम्मत शायद ही कोई दूसरा डायरेक्टर कर पाता.

उनकी नई फिल्म 'द ओडिसी' (The Odyssey) न केवल दर्शकों का मनोरंजन करती है, बल्कि यह इस बात का जीता-जागता सबूत है कि आखिर सिनेमा बना ही क्यों है. लगभग तीन घंटे लंबी यह फिल्म स्क्रीन पर शुरू होते ही आपके आस-पास की दुनिया को गायब कर देती है और आपको ओडिसियस के उस महा-सफर पर ले जाती है जहां भावनाएं, हैरतअंगेज एक्शन और पौराणिक गाथाएं आपस में मिलकर एक मैजिकल एक्सपीरियंस बुनती हैं. मैट डेमन, टॉम हॉलैंड और ऐनी हैथवे जैसे सितारों से सजी यह फिल्म बड़े पर्दे पर सिनेमाई विजुअल्स की नई परिभाषा लिखती है.

मैट डेमन के करियर की सबसे बेहतरीन परफॉर्मेंस
इस पूरी सिनेमाई यात्रा के केंद्र में हॉलीवुड स्टार मैट डेमन हैं, जिन्होंने ओडिसियस के किरदार को अपने करियर की सबसे शानदार परफॉर्मेंस से अमर कर दिया है. नोलन का ओडिसियस कोई घिसा-पिटा या हर मामले में परफेक्ट दिखने वाला नायक नहीं है, बल्कि वह एक ऐसा इंसान है जिसके फैसलों और गलतियों पर कहानी में कई बार सवाल उठते हैं. डेमन ने एक ऐसे योद्धा के किरदार को बेहद खूबसूरती से जिया है जिसके सबसे बड़े हथियार उसकी तलवार नहीं, बल्कि उसकी कुशाग्र बुद्धि और कभी न हार मानने वाला जज्बा है. ट्रोजन हॉर्स से बचकर भागने की रणनीति हो या जादूगरनी सर्सी के जाल से अपनी सेना को निकालना, डेमन के चेहरे पर अपने घर लौटने की छटपटाहट, दर्द और पछतावा साफ महसूस होता है.

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स्पाइडर-मैन के रूप में सालों तक दुनिया को बचाने वाले टॉम हॉलैंड इस फिल्म में एक बिल्कुल अलग और संवेदनशील अवतार में नजर आए हैं. उन्होंने अपनी सुपरहीरो वाली चिर-परिचित छवि को पूरी तरह पीछे छोड़ते हुए एक ऐसे लाचार और इमोशनल युवा (टेलीमैकस) का किरदार निभाया है जो अपने पिता के साए के बिना बड़ा हुआ है. हॉलैंड की इस कमजोरी को ही नोलन ने उनकी सबसे बड़ी ताकत बनाकर पेश किया है. फिल्म का एक बेहद इमोशनल कर देने वाला सीन वह है जब टेलीमैकस अपने पिता ओडिसियस के एक पुराने साथी से उनके बारे में सुनता है; उस वक्त बिना कुछ बोले उसकी डबडबाई आंखें दर्शकों के दिलों को सीधे छू जाती हैं.

फिल्म में ऐनी हैथवे ने पेनेलोप के किरदार में अपनी बेहतरीन एक्टिंग से जान फूंक दी है. युद्ध में खोए अपने पति का सालों तक इंतजार करने वाली एक पत्नी और अपने राज्य की रक्षा करने वाली एक रानी के रूप में उनका दर्द, हिम्मत और खामोश ताकत पर्दे पर बखूबी उभर कर आती है. वह उम्मीद और जिम्मेदारी के बीच झूलती एक मजबूत महिला के जज्बात को गहराई से महसूस कराती हैं. वहीं, दूसरी तरफ जेंडाया का स्क्रीन टाइम भले ही कम हो, लेकिन वे जितनी भी देर स्क्रीन पर आती हैं, अपनी जादुई मौजूदगी से दर्शकों का पूरा ध्यान खींच लेती हैं.

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रॉबर्ट पैटिनसन का सस्पेंस और सितारों से सजी फौज
नोलन की इस फिल्म की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें किरदारों की एक बहुत बड़ी फौज है, लेकिन निर्देशक ने किसी भी कलाकार को जाया नहीं होने दिया. रॉबर्ट पैटिनसन अपनी अनूठी एक्टिंग से हर सीन में एक अलग ही सस्पेंस और रोमांच पैदा करते हैं. एलियट पेज ने 'सिनोन' नाम के एक धोखा खाए हुए सैनिक के शांत लेकिन गहरे दर्द को पर्दे पर शानदार ढंग से उतारा है. वहीं, दिग्गज एक्टर्स की इस भीड़ के बीच निखिल पटेल ने अपने बेहद महत्वपूर्ण किरदार में अपनी अदाकारी का लोहा मनवाया है. इनके साथ लुपिता न्योंगो, चार्लीज़ थेरॉन और जॉन बर्नथल जैसे बड़े नामों को भी नोलन ने कहानी में बेहद जरूरी और सटीक स्पेस दिया है.

यहां देखिए फिल्म का ट्रेलर
 

युद्ध के मैदान के पीछे छुपा इंसानी दर्द
'द ओडिसी' सिर्फ देवताओं, राक्षसों, चमत्कारों और राजाओं की कोई काल्पनिक कहानी नहीं है, बल्कि यह युद्ध की भयानक मानवीय कीमत को भी पूरी संवेदनशीलता से रेखांकित करती है. फिल्म इस कड़वे सच को दिखाती है कि जब कोई सैनिक सीमा पर लड़ने जाता है, तो उसके पीछे उसके परिवार पर क्या गुजरती है. सालों तक खून-खराबे और मौत के साए में जीने के बाद ये सैनिक खुद अपनी रूह को मरता हुआ महसूस करते हैं और धीरे-धीरे भूलने लगते हैं कि आखिर एक सुकून भरे 'घर' का मतलब क्या होता है. नोलन ने ग्रीक पौराणिक मान्यताओं और ज़्यूस के दैवीय नियमों को इंसानी भावनाओं से जोड़कर एक बेहद मार्मिक ताना-बाना बुना है.

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नजर आती मामूली कमियां
इतनी शानदार और ऐतिहासिक बैकग्राउंड वाली कहानी में कुछ बेहद मामूली कमियां भी नजर आती हैं, जो नोलन की बनाई इस प्राचीन दुनिया से दर्शकों का ध्यान कुछ पल के लिए भटकाती हैं. हजारों साल पुरानी इस पौराणिक कथा में जब टेलीमैकस अपने माता-पिता (पेनेलोप और ओडिसियस) को संबोधित करने के लिए 'मॉम' और 'डैड' जैसे आधुनिक शब्दों का इस्तेमाल करता है, तो वह थोड़ा अजीब और बेमेल लगता है. यह हालांकि बहुत छोटी सी बात है, लेकिन यह उस प्राचीन काल के गंभीर और जादुई माहौल को कुछ सेकेंड्स के लिए जरूर तोड़ देती है.

मुश्किल हालात में मजेदार ह्यूमर
नोलन ने इस गंभीर और भारी-भरकम कहानी के बीच-बीच में दर्शकों के चेहरे पर मुस्कान लाने के लिए बेहतरीन ह्यूमर का भी इस्तेमाल किया है. ऐसा ही एक बेहद मजेदार सीन तब आता है जब सैनिकों का सामना पोसीडॉन के विशालकाय और खतरनाक बेटे साइक्लोप्स से होता है. जब डरे हुए सैनिक आपस में चर्चा करते हैं कि क्या उन्हें इस विशालकाय जीव से बातचीत करके रास्ता निकालना चाहिए, तो उनमें से एक सैनिक मजाक करते हुए पूछता है, 'क्या तुम कभी चींटियों से बात करते हो?' यह लाइन न सिर्फ दर्शकों को हंसाती है, बल्कि देवताओं की विशालता के आगे इंसान की हैसियत को भी बहुत गहरी चोट के साथ बयां करती है.

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सांसें रोक देने वाला क्लाइमेैक्स
अगर इस पूरी फिल्म के सबसे बेहतरीन हिस्से की बात की जाए, तो वह निश्चित रूप से इसका आखिरी आधा घंटा है. फिल्म का क्लाइमैक्स बेहद तेज रफ्तार, एक्शन, इमोशन और सालों से मन में दबे गुस्से के टकराव का एक ऐसा बेजोड़ नमूना है जिसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है. नोलन ने इस क्लाइमेक्स को एक ऐसे जादूगर की तरह तैयार किया है जो अपनी कला के सबसे ऊंचे शिखर पर बैठा हो. स्क्रीन पर चल रही हलचल दर्शकों को अपनी सीट छोड़ने का एक पल के लिए भी मौका नहीं देती.

IMAX कैमरों का कमाल और विजुअल ग्रैंडनेस
तकनीकी और विजुअल के मामले में 'द ओडिसी' एक अजूबा है. चाहे वह इतिहास का विशाल ट्रोजन हॉर्स हो, देवताओं के भव्य और काल्पनिक राज्य हों या फिर पूरे जहाजी बेड़े को निगल जाने वाला उफनता हुआ समंदर; फिल्म का हर फ्रेम किसी बेहद खूबसूरत पेंटिंग की तरह नजर आता है. 

पूरी तरह से भारी-भरकम IMAX कैमरों पर शूट की गई यह फिल्म चिल्ला-चिल्लाकर कहती है कि सिनेमाघरों के बड़े पर्दे का वजूद क्यों जरूरी है. यह जानते हुए कि इन कैमरों में एक बार में सिर्फ तीन मिनट की रील ही रिकॉर्ड हो पाती थी, फिल्म के लंबे और बिना कट वाले लड़ाई के दृश्यों को देखना इस बात का अहसास कराता है कि इसके पीछे कलाकारों और क्रू ने कितनी कड़ी रिहर्सल और मेहनत की होगी. बैकग्राउंड में बजने वाला म्यूजिक इन दृश्यों के प्रभाव को दस गुना ज्यादा बढ़ा देता है, जो इस महागाथा को हमेशा-हमेशा के लिए यादगार बना देता है.

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