भारतीय खुफिया एजेंसी RAW के जनक और देश के सबसे बड़े जासूस कहे जाने वाले रामेश्वर नाथ काव की कहानी अब जल्द ही बड़े पर्दे पर नजर आएगी. मशहूर फिल्ममेकर करण जौहर ने RAW के गठन के 58 साल पूरे होने के मौके पर 21 सितंबर को इस नई फिल्म का ऐलान किया है.
धर्मा प्रोडक्शंस और लियो मीडिया कलेक्टिव के बैनर तले बनने वाली यह अनाम फिल्म पत्रकार नितिन गोखले की प्रसिद्ध किताब 'RN Kao: Gentleman Spymaster' पर आधारित होगी.
फिल्म की कहानी मुख्य रूप से 1955 से 1971 के उस दौर को दिखाएगी, जब देश में बाहरी खुफिया तंत्र की नींव रखी जा रही थी. यह फिल्म 11 अगस्त 2028 को सिनेमाघरों में रिलीज होगी, हालांकि अभी इसके स्टारकास्ट और निर्देशक का नाम सामने आना बाकी है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि रामेश्वर नाथ काव कौन थे?
रामेश्वर नाथ काव का जन्म 1918 में बनारस में हुआ था. उन्होंने लखनऊ यूनिवर्सिटी और इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से अपनी उच्च शिक्षा पूरी की. पढ़ाई के बाद 1940 में उन्होंने प्रतिष्ठित सिविल सेवा परीक्षा पास की और इंडियन इंपीरियल पुलिस में शामिल हुए, जो आजादी के बाद भारतीय पुलिस सेवा यानी IPS के रूप में विकसित हुई.
आजादी के बाद काव को इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) में जिम्मेदारी दी गई. यहां उन्होंने देश की सुरक्षा और खुफिया तंत्र से जुड़े कई महत्वपूर्ण काम संभाले. शुरुआती वर्षों में उनकी जिम्मेदारियों में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की सुरक्षा व्यवस्था भी शामिल थी. आगे चलकर काव ने भारत के बाहरी खुफिया तंत्र को संस्थागत रूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और 1968 में रिसर्च एंड एनालिसिस विंग यानी R&AW की स्थापना के बाद उसके पहले प्रमुख बने.
1950 के दशक में काव ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई महत्वपूर्ण और गुप्त अभियानों को अंजाम दिया. उन्होंने घाना सरकार के अनुरोध पर वहां की पहली खुफिया और सुरक्षा एजेंसी खड़ी करने में मुख्य भूमिका निभाई. इसके अलावा जब एअर इंडिया के विमान 'कश्मीर प्रिंसेस' में बम विस्फोट हुआ था, तब काव ने चीनी और ब्रिटिश अधिकारियों के साथ मिलकर इसकी संवेदनशील जांच को सफलता से आगे बढ़ाया था.
IB की कमियों से निकला RAW का विचार
1962 के भारत-चीन युद्ध ने देश के खुफिया तंत्र की बड़ी खामियों को उजागर कर दिया था. इसके बाद काव को एविएशन रिसर्च सेंटर का चीफ बनाया गया, जो उस समय IB का हिस्सा था. 1968 में जब सरकार ने यह महसूस किया कि विदेश से जुड़ी खुफिया जानकारियों के लिए एक अलग एजेंसी की जरूरत है, तो RAW की स्थापना की गई. आरएन काव इसके पहले चीफ बने और 1977 तक लगभग नौ सालों तक इस पद पर रहते हुए उन्होंने एजेंसी को एक पेशेवर ढांचा दिया.
1971 का युद्ध और बांग्लादेश का निर्माण
आरएन काव के करियर का सबसे ऐतिहासिक दौर 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान आया. उनके नेतृत्व में RAW ने बांग्लादेश के स्वतंत्रता सेनानियों (मुक्ति वाहिनी) को गुप्त रूप से ट्रेनिंग दी. हथियार मुहैया कराए और रणनीतिक मदद पहुंचाई. इस युद्ध में पाकिस्तान के दो टुकड़े करने और बांग्लादेश को आजाद कराने में काव की खुफिया रणनीति की सबसे बड़ी भूमिका मानी जाती है.
ब्रिटिश महारानी के सामने 'गुड क्रिकेट' और हाजिरजवाबी
1950 में जब ब्रिटेन की महारानी पहली बार भारत दौरे पर आईं, तो उनकी सुरक्षा का जिम्मा काव के पास ही था. एक कार्यक्रम के दौरान जब भीड़ में से किसी समर्थक ने महारानी की तरफ एक फूलों का गुलदस्ता फेंका, तो काव ने पलक झपकते ही उसे बम समझकर हवा में ही लपक लिया और दूर फेंक दिया. काव की इस मुस्तैदी और गजब की हाजिरजवाबी से महारानी इतनी प्रभावित हुईं कि उन्होंने तारीफ में उनसे 'गुड क्रिकेट' कहा था.
काव के पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के साथ बेहद मजबूत प्रोफेशनल रिश्ते थे. 1977 में सरकार बदलने के बाद उन्होंने RAW का पद छोड़ दिया था, लेकिन 1980 में इंदिरा गांधी की वापसी के बाद वे फिर से सरकारी सेवा में लौटे. उन्होंने इंदिरा गांधी और बाद में राजीव गांधी के सुरक्षा सलाहकार के रूप में काम किया. 1980 के दशक में देश में एनएसजी (NSG) यानी ब्लैक कैट कमांडो बल को तैयार करने में भी उनकी अहम भूमिका रही. काव 1989 में पूरी तरह रिटायर हुए और 2002 में 83 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया.