दिल्ली की सड़कों पर चालान कटना कोई नई बात नहीं है. लेकिन अब चालान कटने के बाद की कहानी बदल जाएगी. मामला सिर्फ जुर्माना भरने का नहीं, बल्कि उस रास्ते का है जिससे होकर आप कोर्ट तक पहुंचेंगे. नए नियम के मुताबिक अगर आपने चालान को चुनौती दी और आपकी बात शुरुआती स्तर पर खारिज हो गई, तो अदालत का दरवाजा खटखटाने से पहले चालान की 50 फीसदी रकम जमा करनी होगी.
बस, इसी 50 फीसदी वाली शर्त ने दिल्ली के वकीलों को सड़क पर उतरने के लिए मजबूर कर दिया है. सोमवार को वकीलों ने इसी विरोध में काम से दूरी बनाई और सवाल उठाया कि किसी चालान पर सही या गलत का फैसला करने का अधिकार आखिर अदालत का है या सरकारी अधिकारी का. तो आइये जानें आखिर ये पूरा मामला क्या है और आम लोगों का इस पर क्या असर होगा?
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वकीलों का कहना है कि नए सिस्टम में किसी चालान को चुनौती देने पर पहले यह तय करने की जिम्मेदारी कार्यपालिका यानी सरकारी अधिकारी को दी गई है कि व्यक्ति की आपत्ति स्वीकार की जाए या नहीं. वकीलों के मुताबिक, चालान से जुड़े विवाद पर अंतिम फैसला न्यायपालिका का विषय होना चाहिए. इसी वजह से दिल्ली की जिला अदालतों के बार एसोसिएशन से जुड़े वकीलों ने इस बदलाव पर गंभीर सवाल उठाए हैं.
क्या बदला है नियम
दरअसल इस पूरे विवाद की शुरुआत सेंट्रल मोटर व्हीकल रूल यानी CMVR, 1989 के Rule 167 में हुए बदलाव की वजह से हुई है. दिल्ली की सभी जिला अदालतों की बार एसोसिएशन और कोऑर्डिनेशन कमेटी ने 20 सितंबर को जारी एक सर्कुलर में इस बदलाव को लेकर अपनी आपत्ति दर्ज कराई थी. इसी मुद्दे को लेकर सोमवार को वकीलों ने काम-काज भी बंद करने का फैसला किया था.
नए Rule 167(5) के मुताबिक, अगर किसी व्यक्ति के वाहन का चालान होता है तो उसके पास दो विकल्प होंगे. वह चालान में बताई गई रकम स्वीकार करके उसका भुगतान कर सकता है या फिर निर्धारित पोर्टल के जरिए चालान को चुनौती दे सकता है. चुनौती के साथ जरूरी दस्तावेज और सबूत भी जमा करने होंगे. यह मामला राज्य सरकार की ओर से तय की गई अथॉरिटी के सामने रखा जाएगा.
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45 दिन की डेडलाइन
नए नियम के तहत चालान को चुनौती देने के लिए 45 दिन का समय दिया गया है. अगर कोई व्यक्ति इस तय समय में निर्धारित अथॉरिटी के सामने चालान को चुनौती नहीं देता है तो उसे चालान स्वीकार किया हुआ माना जाएगा. यानी चालान जारी होने के बाद वाहन मालिक के पास सीमित समय होगा, जिसमें उसे या तो जुर्माना भरना होगा या फिर तय प्रक्रिया के तहत अपनी आपत्ति दर्ज करनी होगी.
कोर्ट से पहले 50% पेमेंट
वकीलों के विरोध की सबसे बड़ी वजह चालान की रकम का 50 फीसदी पहले जमा करने की शर्त है. नए नियम के मुताबिक, अगर किसी व्यक्ति के वाहन का चालान कटता है और उसकी ओर से दी गई आपत्ति या उसके दस्तावेजों को निर्धारित अथॉरिटी खारिज कर देती है, तो वह इसके बाद सक्षम कोर्ट का रुख कर सकता है. हालांकि, कोर्ट जाने से पहले उसे चालान में तय रकम का 50 फीसदी हिस्सा जमा करना होगा.
वकीलों का कहना है कि यह शर्त आम लोगों के लिए बड़ी मुश्किल पैदा करने वाली है. उनका तर्क है कि अगर किसी व्यक्ति को लगता है कि उसके खिलाफ गलत चालान किया गया है तो उसे अपनी बात सीधे अदालत के सामने रखने का अधिकार होना चाहिए. वकीलों का कहना है कि, यह न्यायिक काम है और इसे कार्यपालिका के हाथ में नहीं दिया जाना चाहिए. उनका कहना है कि अगर मोटर व्हीकल एक्ट के उल्लंघन को लेकर किसी व्यक्ति का चालान किया गया है तो यह तय करना अदालत का काम होना चाहिए कि वास्तव में उस व्यक्ति ने नियम तोड़ा है या नहीं.
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वकीलों के मुताबिक, नए सिस्टम में सरकारी अधिकारी पहले व्यक्ति की आपत्ति पर फैसला करेंगे. अगर आपत्ति खारिज होती है तो व्यक्ति को कोर्ट जाने के लिए चालान की 50 फीसदी रकम पहले जमा करनी होगी. यानी चालान से पीड़ित व्यक्ति पहले ही आधा (50%) दोषी हो जाएगा. इसी प्रक्रिया और नियक को लेकर वकील सवाल उठा रहे हैं.
परिस्थितियों को समझना जरूरी
यहां यह भी समझना जरूरी है कि, कई बार ट्रैफिक नियम तोड़ने के पीछे कोई खास परिस्थिति हो सकती है. अगर कोई व्यक्ति लंबे समय से ट्रैफिक जाम में फंसा है, और उसके घर पर कोई मेडिकल इमरजेंसी है या वो किसी अन्य जरूरी काम से घर से निकला है, और ऐसी परिस्थिति में यदि जल्दबाजी में उससे ट्रैफिक नियमों का उल्लघन हो जाता है तो क्या उसे अपनी परिस्थिति अदालत के सामने बताने का मौका नहीं मिलना चाहिए.
अब आगे क्या होगा?
अब असल सवाल यही है कि, आगे क्या होगा. वकीलों का विरोध मुख्य रूप से नए चालान सिस्टम, नियम, कार्यपालिका की भूमिका और कोर्ट जाने से पहले 50 फीसदी रकम जमा करने की अनिवार्यता को लेकर है. उनका कहना है कि ट्रैफिक चालान से जुड़े विवादों में व्यक्ति को अपनी बात रखने और न्यायिक प्रक्रिया तक पहुंचने का पूरा मौका मिलना चाहिए. लेकिन बिना अपनी बात रखे ही 50 फीसदी चालान भरना सही नहीं है.