रामायण जैसी महान कथा को पर्दे पर उतारना आसान नहीं है. इसमें भव्यता के साथ भावनाओं, किरदारों की गरिमा और पौराणिक दुनिया की गंभीरता को भी बनाए रखना जरूरी है. लेकिन रणबीर कपूर, साई पल्लवी और यश स्टारर फिल्म 'रामायण' में कई जगह ऐसा लगता है कि मेकर्स CGI और विजुअल्स की चमक में कहानी के जरूरी पहलुओं को पीछे छोड़ गए हैं.
फिल्म के कई किरदारों के चेहरे और लुक देखकर तकनीक का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल साफ महसूस होता है. कहीं किरदार कार्टून जैसे लगते हैं, तो कहीं उनके हाव-भाव और मौजूदगी कहानी से मेल नहीं खाते.
रात में वनवास का दृश्य भी नहीं छोड़ पाया खास असर
राम के वनवास का दृश्य भी फिल्म में खास प्रभाव छोड़ता नजर नहीं आता. रात के समय राम को नाव से नदी पार करते दिखाया गया है. रामायण के इस महत्वपूर्ण प्रसंग में भावनात्मक गहराई, त्याग और एक नए जीवन की शुरुआत का एहसास होना चाहिए था. लेकिन दृश्य की प्रस्तुति में वह भावनात्मक जुड़ाव पूरी तरह महसूस नहीं होता. ऐसे अहम पल को सिर्फ खूबसूरत विजुअल्स तक सीमित रखने के बजाय किरदारों की मनःस्थिति और वनवास के दर्द को ज्यादा प्रभावशाली तरीके से दिखाया जा सकता था.
रावण का महादेव कनेक्शन भूल गए मेकर्स
रामायण में रावण सिर्फ एक शक्तिशाली राजा और खलनायक नहीं, बल्कि महादेव का परम भक्त भी है. उसकी तपस्या, शिव के प्रति समर्पण और उनसे जुड़ा आध्यात्मिक पक्ष उसके व्यक्तित्व को खास गहराई देता है. लेकिन फिल्म में रावण के इस अहम पहलू को पर्याप्त जगह नहीं मिलती. ब्रह्मा और विष्णु के दर्शन तो होते हैं, लेकिन महादेव से रावण के संबंध को प्रभावशाली तरीके से सामने नहीं लाया गया. ऐसे में लगता है कि मेकर्स ने रावण के महादेव कनेक्शन को ही पीछे छोड़ दिया. यह कमी इसलिए भी खटकती है, क्योंकि शिवभक्ति रावण के चरित्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है.
CGI की भव्यता में कहीं खो गए किरदार
फिल्म में CGI का इस्तेमाल बड़े स्तर पर किया गया है. दिव्य दुनिया, विशाल सेट्स और राक्षसों को पर्दे पर उतारने की कोशिश जरूर भव्य है, लेकिन हर जगह इसका असर एक जैसा नहीं दिखता. कई किरदारों के चेहरे इतने ज्यादा डिजिटल लगते हैं कि उनके साथ भावनात्मक जुड़ाव बनाना मुश्किल हो जाता है. ऐसा लगता है कि फिल्म की दुनिया को असली दिखाने के बजाय उसे जरूरत से ज्यादा चमकदार बनाने पर जोर दिया गया है.
कुंभकर्ण का किरदार लगा कार्टून जैसा
कुंभकर्ण के किरदार में पंचायत फेम फैजल मलिक नजर आते हैं. लेकिन उनका लुक और लंका में बैठने वाला दृश्य कई जगह गंभीर होने के बजाय कॉमेडी जैसा महसूस होता है. कुंभकर्ण रामायण का एक विशाल और प्रभावशाली किरदार है, जिसकी मौजूदगी से भय और ताकत का एहसास होना चाहिए. लेकिन यहां उनका लुक कुछ ऐसा लगता है कि किरदार का प्रभाव बनने से पहले ही दृश्य हल्का पड़ जाता है.
जंगल में राक्षसों से लड़ाई, लेकिन VFX ने किया निराश
राम, सीता और लक्ष्मण जब जंगल में एक राक्षस और राक्षसी से भिड़ते हैं, तो यह दृश्य भी खास प्रभाव नहीं छोड़ता. तीनों किरदार जंगल में भागते नजर आते हैं और उनके पीछे असुरों की पूरी सेना दिखाई देती है. लेकिन इस पूरे एक्शन सीक्वेंस में रियलिज्म की कमी महसूस होती है. राक्षसों का लुक और उनके साथ होने वाली लड़ाई इतनी नकली लगती है कि दर्शक दृश्य में पूरी तरह डूब नहीं पाते. जिस प्रसंग में डर और रोमांच पैदा होना चाहिए, वहां CGI का बनावटीपन सामने आ जाता है.
दशरथ की रानियां सिर्फ मुस्कुराती नजर आईं
फिल्म में कैकेयी को छोड़कर दशरथ की बाकी रानियों को लगभग नजरअंदाज कर दिया गया है. उनके हिस्से में न कोई खास संवाद आता है और न ही कहानी में कोई महत्वपूर्ण भूमिका. उन्हें सिर्फ मुस्कुराते हुए स्क्रीन पर दिखाया जाता है. रामायण जैसे बड़े विषय में इन किरदारों का इतना सीमित इस्तेमाल खटकता है. ऐसा लगता है कि उन्हें सिर्फ राजमहल की भव्यता बढ़ाने के लिए रखा गया है, जबकि उनके व्यक्तित्व और भावनाओं को दिखाने की गुंजाइश थी.
मंदोदरी का किरदार भी रहा अधूरा
रावण की पत्नी मंदोदरी का किरदार भी फिल्म में ज्यादा प्रभाव नहीं छोड़ता. उनका लुक कई जगह नकली और पुतले जैसा महसूस होता है. सबसे ज्यादा हैरानी की बात यह है कि इतने महत्वपूर्ण किरदार के हिस्से में सिर्फ एक संवाद आता है, जब वह कहती हैं- जो भी करें सोच-विचार कर करें. मंदोदरी रामायण की एक अहम पात्र हैं, जिनका अपना व्यक्तित्व और विचार हैं. लेकिन फिल्म में उन्हें सिर्फ रावण के पीछे खड़ी एक खूबसूरत आकृति की तरह दिखाया गया है. उनके किरदार को ज्यादा गहराई देने की जरूरत थी.
शूर्पणखा राक्षसी कम, ग्लैम डॉल ज्यादा लगीं
शूर्पणखा का किरदार रकुल प्रीत ने निभाया है. लेकिन फिल्म में उनका लुक और प्रस्तुति कई जगह खटकती है. शूर्पणखा को एक राक्षसी के रूप में दिखाने के बजाय उन्हें ज्यादातर ग्लैमरस अंदाज में पेश किया गया है. पूरे फिल्मी सफर में उनका राक्षसी अवतार देखने को नहीं मिलता. वह फिल्म में महज ग्लैम डॉल जैसी नजर आती हैं.
रामायण के इस महत्वपूर्ण प्रसंग में शूर्पणखा का अपना प्रभाव होना चाहिए था. लेकिन फिल्म में उनके लुक पर ज्यादा ध्यान दिया गया और किरदार के मूल स्वरूप को पीछे छोड़ दिया गया. ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या शूर्पणखा को सिर्फ स्क्रीन पर खूबसूरत दिखाने के लिए डिजाइन किया गया था?
राम के चेहरे पर CGI और साई पल्लवी के साथ केमिस्ट्री भी खटकी
राम के किरदार में रणबीर कपूर नजर आते हैं. लेकिन उनके चेहरे पर किया गया CGI वर्क कई जगह उतना प्रभावशाली नहीं लगता. चेहरे की बनावट और भावों में कुछ ऐसा डिजिटल एहसास है, जो किरदार की सहजता को प्रभावित करता है. राम जैसे किरदार के लिए चेहरे पर गंभीरता, शांति और भावनात्मक गहराई बेहद जरूरी है. लेकिन यहां तकनीक कई बार उनके स्वाभाविक व्यक्तित्व पर भारी पड़ती नजर आती है.
इसके अलावा राम और सीता के रूप में रणबीर कपूर और साई पल्लवी की केमिस्ट्री भी कुछ जगहों पर ऑफ लगती है. दोनों कलाकार अपने-अपने किरदार में ठीक हैं, लेकिन उनके बीच वह सहज जुड़ाव महसूस नहीं होता, जिसकी उम्मीद रामायण जैसे प्रेम और त्याग से जुड़े प्रसंग में की जाती है.
परशुराम के रूप में रणबीर की आवाज भी लगी बनावटी
परशुराम के किरदार में रणबीर कपूर का वॉइस मॉड्यूलेशन भी कुछ जगह बनावटी लगता है. उनकी आवाज में वह प्रभाव और स्वाभाविकता नहीं दिखती, जो इस प्रसंग की गंभीरता के लिए जरूरी है. राम और परशुराम के बीच होने वाला संवाद रामायण के महत्वपूर्ण दृश्यों में से एक है. लेकिन यहां दोनों किरदारों के बीच तालमेल ठीक से बैठता नजर नहीं आता. आवाज और अभिनय के बीच संतुलन की कमी इस दृश्य के प्रभाव को कम कर देती है.
ब्रह्मा और विष्णु दिखे, लेकिन महादेव की कमी खली
फिल्म में ब्रह्मा और विष्णु को दिखाया गया है, लेकिन महादेव की कमी सबसे ज्यादा खटकती है. खासकर तब, जब रावण को रामायण में महादेव का सबसे बड़ा भक्त माना जाता है. रावण के व्यक्तित्व, उसकी तपस्या और उसकी शक्ति के पीछे शिवभक्ति का एक अहम पहलू है. ऐसे में फिल्म में महादेव से जुड़े प्रसंगों को पर्याप्त जगह न देना कहानी के स्तर पर एक बड़ी कमी महसूस होती है.
रावण के रौद्र रूप और उसकी शक्ति को दिखाने के लिए फिल्म ने कई भव्य दृश्य तैयार किए हैं, लेकिन उसके आध्यात्मिक पक्ष और महादेव के साथ उसके संबंध को और गहराई से दिखाया जा सकता था. यही वह पहलू है, जो रावण के किरदार को सिर्फ एक शक्तिशाली खलनायक से कहीं ज्यादा बड़ा बनाता है.
भव्यता के बीच कहानी और किरदारों की गहराई हुई कमजोर
कुल मिलाकर 'रामायण' में भव्यता, CGI और बड़े स्तर पर रचे गए दृश्य जरूर हैं, लेकिन कई जगह तकनीक कहानी और किरदारों पर भारी पड़ती नजर आती है. कुंभकर्ण का कार्टून जैसा लुक हो, शूर्पणखा का ग्लैमरस अंदाज, मंदोदरी की सीमित भूमिका या राम के चेहरे पर CGI का असर, इन सभी पहलुओं में सुधार की गुंजाइश महसूस होती है.
रामायण जैसी महान कथा को सिर्फ बड़े सेट्स और डिजिटल दुनिया के सहारे प्रभावशाली नहीं बनाया जा सकता. इसके लिए किरदारों की भावनाओं, उनके व्यक्तित्व और उनके मूल स्वरूप को समझना भी जरूरी है. फिल्म की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह अपनी भव्यता के बीच रामायण की आत्मा और किरदारों की गहराई को पूरी तरह पकड़ नहीं पाती.