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जिंगल्स बनाने वाले धीरेंद्र को कैसे मिली ‘हनुमान अंश’? कैंची धाम में हुआ चमत्कार, बदली किस्मत

संगीतकार धीरेंद्र मुलकलवार की ‘हनुमान अंश’ तक पहुंचने की कहानी बेहद दिलचस्प है. कैंची धाम की यात्रा के बाद उन्हें फिल्म का ऑफर मिला. इंडिया टुडे/आजतक से बातचीत में उन्होंने इसका खुलासा किया.

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ऐसे बना ‘सियावर रामचंद्र की जय’ (Photo: Instagram @meedhirendra)
ऐसे बना ‘सियावर रामचंद्र की जय’ (Photo: Instagram @meedhirendra)

कभी-कभी जिंदगी में कुछ चीजें इतनी अचानक होती हैं कि उन्हें महज इत्तेफाक कहना मुश्किल लगता है. ‘हनुमान अंश’ के संगीतकार धीरेंद्र मुलकलवार के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. चार साल तक कैंची धाम जाने की कोशिश करते रहे, आखिरकार पिछले साल अप्रैल में नीम करोली बाबा के आश्रम पहुंच पाए. और इसके कुछ ही महीने बाद उनके पास एक ऐसा ऑफर आया, जिसने उनकी बरसों पुरानी इच्छा पूरी कर दी. 

डायरेक्टर विशाल चतुर्वेदी ने उन्हें अपनी फिल्म ‘हनुमान अंश’ का संगीत देने के लिए बुलाया. धीरेंद्र के लिए ये सिर्फ एक फिल्म नहीं, किसी चमत्कार जैसा था. इंडिया टुडे/आजतक से बातचीत में उन्होंने अपनी पूरी कहानी सुनाई.

चार साल की कोशिश के बाद पहुंचे कैंची धाम

धीरेंद्र मुलकलवार का नीम करोली बाबा से रिश्ता इस फिल्म के बनने से काफी पुराना है. करीब 2010 के आसपास उन्होंने अमेरिकी आध्यात्मिक गुरु राम दास का एक वीडियो देखा था. राम दास, नीम करोली बाबा के शिष्य थे. यहीं से धीरेंद्र की बाबा में दिलचस्पी पैदा हुई.

उन्होंने बाबा के बारे में पढ़ना शुरू किया. उनके प्रभाव और दुनिया भर में मौजूद अनुयायियों के किस्से सुने. स्टीव जॉब्स और जूलिया रॉबर्ट्स जैसे नामों से जुड़े बाबा के किस्सों ने भी उनकी जिज्ञासा बढ़ाई. लेकिन कैंची धाम जाने की इच्छा पूरी होने में करीब चार साल लग गए. आखिरकार अप्रैल में वह वहां पहुंचे. उन्हें क्या पता था कि ये यात्रा उनकी जिंदगी का अगला बड़ा दरवाजा खोलने वाली है.

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कैंची धाम जाने के करीब दो महीने बाद डायरेक्टर विशाल चतुर्वेदी ने धीरेंद्र से संपर्क किया और नीम करोली बाबा पर बन रही फिल्म के लिए संगीत देने की बात कही. धीरेंद्र खुद इस पूरे घटनाक्रम को याद करते हुए इसे चमत्कार जैसा मानते हैं. कैंची धाम की यात्रा से लेकर फिल्म के संगीत तक- कनेक्शन इतना सीधा था कि धीरेंद्र के लिए इसे सिर्फ संयोग मानना आसान नहीं था.

‘सियावर रामचंद्र की जय’ ऐसे बन गया गाना

फिल्म का सबसे खास गीत ‘सियावर रामचंद्र की जय’ भी किसी प्लानिंग के तहत तैयार नहीं हुआ था. दरअसल, धीरेंद्र फिल्म के एक अहम सीन का बैकग्राउंड स्कोर तैयार कर रहे थे. सीन में एक क्रांतिकारी अंग्रेजों से बचने के लिए संन्यासी का भेष धारण करता है और नीम करोली बाबा उसकी मदद करते हैं.

इसी सीन पर काम करते हुए धीरेंद्र के दिमाग में अचानक सीता-राम के जयकारे का विचार आया. उन्होंने विशाल चतुर्वेदी के सामने आइडिया रखा और उन्हें भी यह पसंद आया. बस फिर क्या था- जो चीज पहले सिर्फ बैकग्राउंड स्कोर का हिस्सा थी, वही आगे चलकर पूरा गाना बन गई. देशभक्ति और आध्यात्मिकता को एक साथ जोड़ने वाला ये गीत फिल्म की पहचान बन गया.

आज जिस संगीतकार का नाम ‘हनुमान अंश’ के साथ जुड़ रहा है, उनका सफर किसी बड़े शहर या फिल्मी परिवार से शुरू नहीं हुआ था. महाराष्ट्र के चंद्रपुर में पले-बढ़े धीरेंद्र का बचपन बेहद साधारण और सीमित संसाधनों वाले माहौल में बीता. संगीत उनके लिए करियर का सीधा रास्ता नहीं था.

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उनके गुरु, दिवंगत तबला वादक राजीव पिल्लई ने उन्हें संगीत से जोड़ा. वहीं उनके बड़े भाई ने उन्हें ऐसा संगीत सुनाया, जिसने धीरेंद्र के भीतर कुछ बड़ा करने का सपना जगा दिया. धीरे-धीरे उन्हें लगा कि वह म्यूजिक डायरेक्टर बन सकते हैं.

धीरेंद्र की कहानी भी किसी फिल्म से कम नहीं

मुंबई आने के बाद धीरेंद्र ने ऑडियो इंजीनियरिंग सीखी. करीब एक साल रेडियो में काम किया. लेकिन उनका सपना वहीं नहीं रुका. दिन में काम करने के बाद रात में वह अपने म्यूजिक डेमो तैयार करते और लोगों से मिलने निकलते. फिर उन्हें विज्ञापनों के लिए जिंगल बनाने का काम मिला. देखते ही देखते उन्होंने 500 से ज्यादा विज्ञापनों और जिंगल्स पर काम किया. लेकिन फिल्मों में बतौर कंपोजर पहचान बनाने का सपना अभी बाकी था.

धीरेंद्र की कहानी में एक और खूबसूरत कनेक्शन है- प्रकृति. चंद्रपुर के पास ताडोबा-अंधारी टाइगर रिजर्व के आसपास का इलाका उनके बचपन का हिस्सा रहा. वह वन्यजीव बचाव और संरक्षण से भी जुड़े रहे. जंगल में बिताए समय ने उनके संगीत को एक अलग नजरिया दिया. उनके मुताबिक, जंगल में कभी-कभी ऐसी आवाजें सुनाई देती थीं, जो किसी सिम्फनी से कम नहीं लगतीं. वह आंखें बंद करके प्रकृति की उन आवाजों को संगीत की तरह महसूस करते थे.

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शायद यही वजह है कि उनके संगीत में प्रकृति, आध्यात्मिकता और भावनाओं का कनेक्शन इतना सहज दिखाई देता है.

करीब दो दशक बाद आया फिल्म वाला सपना

फिल्म कंपोजर बनने का सपना पूरा होने में धीरेंद्र को करीब दो दशक लग गए. उनका कहना है कि उन्हें संगीत आता था, लेकिन फिल्म इंडस्ट्री का बिजनेस समझना अलग बात थी. छोटे शहर से आने की वजह से उन्हें इंडस्ट्री के इस हिस्से को सीखने में वक्त लगा.

 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 

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इस दौरान ‘उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक’ और ‘आर्टिकल 15’ जैसी फिल्मों में उनका काम सामने आया. इसी काम ने उन्हें विशाल चतुर्वेदी की नजर में लाया. और फिर आया ‘हनुमान अंश’. अगस्त में रिलीज हुई ‘हनुमान अंश’ को दर्शकों से उम्मीद से ज्यादा प्रतिक्रिया मिली. फिल्म की स्क्रीनिंग के दौरान ही टीम को अंदाजा हो गया था कि लोगों का भावनात्मक कनेक्शन बन रहा है.

अब ‘हनुमान अंश’ ने खोले नए दरवाजे

धीरेंद्र के मुताबिक, प्रीव्यू में कुछ लोग इतने भावुक हो गए थे कि टीम को लगा कि फिल्म की आध्यात्मिक भावना दर्शकों तक पहुंच रही है. लेकिन फिल्म को मिली व्यावसायिक सफलता उनकी उम्मीद से भी आगे निकल गई. अब इस सफलता के बाद धीरेंद्र के पास नए प्रोजेक्ट्स के फोन आने लगे हैं और कई फिल्मों को लेकर बातचीत चल रही है.

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हालांकि, इतने लंबे इंतजार के बाद मिली इस कामयाबी के बावजूद वह जल्दबाजी में अगली मंजिल का ऐलान नहीं करना चाहते. शायद इसलिए भी क्योंकि उनकी कहानी ने उन्हें एक बात सिखा दी है. कभी चार साल तक एक जगह पहुंचने का इंतजार करना पड़ता है और फिर वही जगह आपकी पूरी जिंदगी की दिशा बदल देती है. 

धीरेंद्र मुलकलवार के लिए कैंची धाम की यात्रा भी कुछ ऐसी ही थी- वह बाबा के दर्शन करने गए थे, लेकिन लौटे तो हाथ में ‘हनुमान अंश’ के संगीत की जिम्मेदारी थी. और उनके लिए ये इत्तेफाक नहीं, एक चमत्कार था.

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