चंदौली उत्तर प्रदेश के 75 जिलों में से एक है और यह वाराणसी मंडल में आता है. प्रदेश के 80 संसदीय क्षेत्रों में इसकी संसदीय संख्या 76 है. चंदौली पूर्व में बिहार, उत्तर-पूर्व में गाजीपुर, दक्षिण में सोनभद्र, दक्षिण-पूर्व में बिहार और दक्षिण-पश्चिम में मिर्जापुर की सीमाओं से घिरा है.
चंदौली जिले के रूप में 1997 में अस्तित्व में आया. तब प्रशासनिक उद्देश्य के लिए वाराणसी से अलग कर चंदौली जिले का गठन किया गया. चंदौली जिला गंगा नदी के पूर्वी और दक्षिणी हिस्से में स्थित है. इस जिले का नाम तहसील मुख्यालय के नाम पर रखा गया है.
यह देश के सबसे पिछड़े जिलों में आता है. 2006 में पंचायती राज मंत्रालय ने देशभर के 640 जिलों में सबसे पिछड़े जिलों की एक सूची जारी की जिसमें 250 पिछड़े जिलों में इस जिले को भी रखा गया था. यह उत्तर प्रदेश के उन 34 जिलों में से एक है जिसे बैकवर्ड रिजन ग्रांट फंड प्रोग्राम (BRGF) के तहत अनुदान दिया जाता है.
सामाजिक ताना-बाना
2011 की जनगणना के अनुसार चंदौली की जनसंख्या करीब 20 लाख (1,952,756) है जिसमें 10 लाख (1,017,905) से ज्यादा पुरुष और साढ़े 9 लाख (934,851) महिलाएं हैं. यहां पर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की एक बड़ी आबादी रहती है.
जनगणना 2011 के अनुसार इस जिले में अनुसूचित जाति की आबादी 4,46,786 है जबकि अनुसूचित जनजाति लोगों की आबादी 41,725 है. लिंगानुपात देखा जाए तो यहां पर प्रति 1,000 पुरुषों पर 918 महिलाएं हैं. इस जिले की साक्षरता दर राष्ट्रीय औसत से ज्यादा है. 71.48 फीसदी आबादी यहां साक्षर है जिसमें 81.72 फीसदी पुरुष और 60.35 फीसदी महिलाएं शामिल हैं.
चंदौली लोकसभा क्षेत्र में 5 विधानसभा क्षेत्र (मुगलसराय, सकलडीहा, सैयदराजा, अजगरा और शिवपुर) आते हैं जिसमें अजगरा रिजर्व सीट है. 2017 में हुए विधानसभा क्षेत्र में मुगलसराय से भारतीय जनता पार्टी की साधना सिंह विधायक हैं. साधना ने समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार बाबूलाल को 13,243 मतों के अंतर से हराया था. सकलडीहा विधानसभा क्षेत्र से 2017 के चुनाव में समाजवादी पार्टी के प्रभुनारायण यादव ने जीत हासिल की थी. प्रभुनारायण ने 14,969 मतों के अंतर से बीजेपी के प्रत्याशी सौर्यमणि तिवारी को हराया था.
2014 का जनादेश
सैयदराजा विधानसभा क्षेत्र भी चंदौली लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आता है और यहां से इस समय बीजेपी के सुशील सिंह विधायक हैं. उन्होंने 2 साल पहले हुए विधानसभा चुनाव में बसपा के श्याम नारायण सिंह को 14,494 मतों के अंतर से हराया था. अजगरा विधानसभा क्षेत्र एक सुरक्षित सीट है और यह अनुसूचित जाति के लिए रिजर्व है. 2017 के चुनाव में सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के कैलाश नाथ सोनकर ने जीत हासिल की थी. यह विधानसभा सीट 2012 में अस्तित्व में आई और तब बहुजन समाज पार्टी के त्रिभुवन राम ने सपा के लालजी को कांटेदार मुकाबले में 2,083 मतों के अंतर से हराया था. शिवपुरी सीट से बीजेपी के अनिल राजभर विधायक हैं. अजगरा की तरह 2012 में शिवपुरी में भी पहली बार विधानसभा क्षेत्र के रूप में चुनाव लड़ा गया था.
यहां के संसदीय इतिहास की बात की जाए तो 2014 के लोकसभा चुनाव में चंदौली से बीजेपी के महेंद्र नाथ पांडे ने बाजी मारी थी. उन्होंने बसपा के अनिल कुमार मौर्य को 1,56,756 मतों के अंतर से हराया. महेंद्र नाथ पांडे को 4,14,135 मत (42.23%) मिले थे जबकि उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी अनिल को 2,57,379 मत (26.25%) हासिल हुए थे. इस चुनाव में 21 उम्मीदवारों ने अपनी किस्मत आजमाई थी. सपा के रामकिशुन तीसरे और कांग्रेस के तरुण चौथे नंबर पर रहे थे. जबकि आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार इरशाद ने पांचवें स्थान पर रहे थे.
बीजेपी की हैट्रिक
इससे पहले 2009 के लोकसभा चुनाव में सपा के प्रत्याशी रामकिशुन ने बसपा के कैलाश नाथ सिंह यादव को हराया था. 1957 से 2014 तक चंदौली लोकसभा में 16 लोकसभा चुनाव हो चुके हैं जिसमें एक बार उपचुनाव (1959) भी हुआ था. चंदौली में बीजेपी का प्रदर्शन शानदार रहा है. उसने पहली बार 1991 में यहां से जीत हासिल की और आनंद रत्न मौर्य ने लगातार 3 बार (1991, 1996 और 1998) जीत हासिल की. इसके बाद बीजेपी ने 2014 में जीत हासिल की.
2014 के चुनाव में जीत हासिल करने वाले सांसद डॉक्टर महेंद्र नाथ पांडे का जन्म गाजीपुर के पखापुर में हुआ था. उनके पास 2 परास्नातक डिग्री है और उन्होंने हिंदी में पीएचडी की है. महेंद्र नाथ पहली बार संसद में पहुंचे हैं. जहां तक उनके संसद में सक्रियता का सवाल है तो उनकी लोकसभा में अब तक 83 फीसदी उपस्थिति रही है. उन्होंने 51 बहस में हिस्सा लिया. 2014 से अब तक के सत्र में उन्होंने 60 बार सवाल किए. इस दौरान उन्होंने एक बार प्राइवेट मेंबर्स बिल भी पेश किया.
1998 से लगातार जीत नहीं
2014 से 2016 के सत्र में उनकी उपस्थिति 90 फीसदी से ज्यादा की रही, लेकिन 2017 के शीतकालीन सत्र से उनकी उपस्थिति लगातार गिरती चली गई और पिछले 6 सत्र (8 जनवरी, 2019) में वह सिर्फ एक बार ही उनकी उपस्थिति 69 फीसदी रही जबकि शेष सत्रों में वह 50% के पार नहीं जा सके. वह लोकसभा की हेल्थ एंड फैमिली वेलफेयर स्टैंडिंग कमिटी के सदस्य हैं.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी से महज 30 किलोमीटर की दूरी वाला यह शहर काफी पिछड़ा है. 2014 में 'मोदी लहर' में यह सीट 16 साल बाद यानी 1998 के बाद फिर से बीजेपी के खाते में आई. 1998 से लेकर अब तक इस क्षेत्र से किसी भी पार्टी ने लगातार 2 बार जीत दर्ज नहीं की है, ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि सपा-बसपा गठबंधन के बाद अब क्या बीजेपी 21 साल बाद यहां से लगातार दूसरी बार जीत दर्ज करा पाती है या नहीं.