केरल से होने के नाते, वट्टियूरकावु निर्वाचन क्षेत्र से 2018 में मेरा पहला वोट था… मैं सच में बहुत उत्सुक और उत्साहित था, ईमानदारी से कहूं तो पूरी उम्मीद थी कि 'एलडीएफ आएगी और सब कुछ ठीक हो जाएगा' (उस चुनाव में एलडीएफ का नारा). यह मुझे सिर्फ एक चुनावी नारा नहीं लगा… 2018 के चुनाव के दौरान यह कुछ अलग ही महसूस हो रहा था.
मुझे सच में लगा कि वे हमें कोई बदलाव देने वाले हैं. मेरे आसपास लोगों, दोस्तों और परिवार के सदस्यों के अंदर एक सकारात्मक भावना और माहौल था. शुरुआती कुछ वर्षों में यह हमें पेंशन, फूड किट्स आदि के रूप में दिखा, सड़कें और प्रोजेक्ट्स देखकर लगा कि ठीक है, कुछ हो रहा है… एक अच्छी वाइब आ रही थी.
लेकिन समय के साथ वह एहसास धीरे-धीरे बदलने लगा. यह अचानक बदलाव नहीं था, बल्कि बहुत धीरे-धीरे हुआ. हमारे अपने इलाके और आसपास ही लेफ्ट सरकार की तारीफों की जगह शिकायतें सुनाई देने लगीं. मैं यह नहीं कह रहा कि सरकार ने कुछ भी नहीं किया, लेकिन लोग पूछने लगे, क्या सच में हमारे जीवन में कोई फर्क पड़ा या हमसे मजाक हो रहा है?
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सबसे ज़्यादा असर हम पर पड़ा- मिडिल क्लास परिवारों और युवाओं पर. हमें यह एहसास दूसरों से पहले होने लगा. नौकरी मिलनी मुश्किल हो गई, रोजमर्रा के खर्च संभालना कठिन हो गया. ऐसा लगने लगा जैसे हम फिर से वहीं शून्य पर आ गए हैं. फिर, छोटी-छोटी घटनाओं ने बड़ा असर डालना शुरू किया, जैसे मुख्यमंत्री का 'गेट आउट' वाला बयान चर्चा का विषय बन गया.
लोगों को लगने लगा कि यह सिर्फ साधारण राजनीति नहीं है, कुछ तो ठीक नहीं है. एक अजीब सा माहौल बन गया. अब वी. डी. सतीशन के नेतृत्व में यूडीएफ सही विकल्प लगा- सही काम के लिए सही व्यक्ति. उनकी बातें लोगों के दिल से जुड़ती महसूस हुईं. उन्होंने हमारी रोजमर्रा की समस्याओं- महंगाई और बेराजगारी पर बात की और विरोध जताया. ये सब लोगों को अपने जीवन से जुड़ा हुआ लगा.
सच कहूं तो, यह एलडीएफ को पूरी तरह खारिज करने का जनमत नहीं है. लेकिन 10 साल के बाद लोगों को एक तरह की थकान महसूस हुई. उन्हें एक वास्तविक बदलाव या ब्रेक चाहिए था, उसी सरकार से जो शायद अपने समर्थकों और वोट देने वालों को भूल गई. केरल चुनाव में एलडीएफ की हार पर यह मेरी सरल वजह है. अब लोगों ने एक नई शुरुआत की कोशिश करने का फैसला किया है- अपने लिए और अपने भविष्य के लिए. (रिपोर्ट: विवेक आर)