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पग-पग पोखरि माछ मखान... बिहार का मिथिलांचल क्या इस बार भी बड़े दलों के लिए तिलिस्म साबित होगा?

बिहार सीरीज में आज बात मिथिलांचल की सियासत की. 7 जिले और 60 सीटों वाला ये अंचल बीजेपी के लिए तिलिस्म रहा है. जेडीयू का काम बिगाड़ने के लिए राबड़ी देवी ने अलग राज्य का दांव चल दिया है. इस बार के चुनाव में किसकी गोटी फिट बैठेगी?

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तेजस्वी यादव ने नीतीश कुमार पर तीखा हमला किया
तेजस्वी यादव ने नीतीश कुमार पर तीखा हमला किया

बिहार का मिथिलांचल विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक चर्चा का केंद्र बन गया है. बिहार में नीतीश कुमार की अगुवाई वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के सबसे बड़े घटक दल भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने मिथिलांचल पर फोकस कर दिया है. पार्टी अब इसी इलाके के झंझारपुर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली से बिहार चुनाव के लिए अपने प्रचार अभियान का आगाज करने जा रही है. पीएम मोदी की रैली 24 अप्रैल को होनी है. अब बात इसे लेकर होने लगी है कि आखिर मिथिलांचल पर हर दल का फोकस क्यों है? बिहार सीरीज में आज बात इसी मिथिलांचल की.

पग-पग पोखरि माछ मखान, मधुर बोली मुख में पान... ये पंक्तियां मिथिलांचल की पहचान से जुड़ी हैं. पूर्व मुख्यमंत्री भगवत झा आजाद, ललित नारायण मिश्रा, जगन्नाथ मिश्रा और विनोदानंद झा जैसे दिग्गजों की जन्म और कर्मभूमि रहा मिथिलांचल पिछड़े इलाकों में गिना जाता है. सूबे के सात जिले- मुजफ्फरपुर, पूर्णिया, समस्तीपुर, दरभंगा, मधुबनी, सीतामढ़ी और सहरसा मिथिलांचल में आते हैं. इन जिलों में विधानसभा की कुल 60 सीटें हैं. यह संख्या कुल 243 विधानसभा सीटों वाले सूबे की करीब 25 फीसदी है.

रहा है आरजेडी का गढ़

मिथिलांचल की सियासत में कभी लालू यादव की पार्टी आरजेडी का सिक्का चलता था. ब्राह्मण बाहुल्य इस इलाके में 55 पिछड़ी और अति पिछड़ा जातियों के मतदाता भी अच्छी संख्या में हैं, जिन्हें पचपनिया कहा जाता है. साल 2005 के बिहार चुनाव में एनडीए और नीतीश कुमार के उभार के बाद यह इलाका जेडीयू का गढ़ बनकर उभरा. 2020 के विधानसभा चुनाव में भी एनडीए ने मिथिलांचल की 60 में से 40 से ज्यादा सीटें जीती थीं. ऐसे नतीजे तब थे, जब आरजेडी ने प्रोफेसर मनोज कुमार झा और अहमद अशफाक करीम को राज्यसभा भेजकर यह मंशा साफ कर दी थी कि पार्टी  अब 'झाजी' (ब्राह्मण) और 'हाजी' (मुस्लिम) के समीकरण पर आगे बढ़ेगी.

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बीजेपी के लिए तिलिस्म रहा

ब्राह्मण बीजेपी के कोर वोटर माने जाते हैं लेकिन इनके बाहुल्य के बावजूद यह इलाका कमल निशान वाली पार्टी के लिए तिलिस्म की तरह रहा ह. जेडीयू के साथ होने पर एनडीए का प्रदर्शन दमदार रहा है लेकिन बगैर उसके बीजेपी गठबंधन बेदम दिखा है. साल 2015 के बिहार चुनाव में जेडीयू महागठबंधन के घटक दल के रूप में चुनाव मैदान में थी और तब बगैर नीतीश के बीजेपी 30 विधानसभा सीटों वाले दरभंगा प्रमंडल में तीन सीटों पर सिमट गई थी. इस चुनाव के बाद बीजेपी ने इस इलाके पर खास फोकस किया और यातायात, स्वास्थ्य, बाढ़ जैसी समस्याओं पर केंद्र सरकार ने काम किया.

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केंद्र सरकार ने मिथिलांचल को सड़क से रेल परियोजनाओं की सौगात दी, दरभंगा में एयरपोर्ट शुरू कराया. दरभंगा को एम्स का तोहफा मिला और केंद्र ने मिथिला को ध्यान में रख मैथिली और मखाना को लेकर भी कई कदम उठाए. इनमें मैथिली में संविधान, मखाना को जीआई टैग, मखाना बोर्ड का गठन शामिल है. पिछले दिनों नीतीश मंत्रिमंडल के विस्तार में बीजेपी कोटे से सात मंत्रियों ने शपथ ली थी. इनमें से तीन मिथिला से ही हैं. सूबे की सरकार में कुल नौ मंत्री ऐसे हैं जो मिथिलांचल से आते हैं. 

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राबड़ी ने चला अलग राज्य का दांव

विपक्षी आरजेडी भी यह समझ रही है कि तेजस्वी यादव को सीएम बनाने के लिए मिथिला में एनडीए को पटखनी देना जरूरी है. जेडीयू का खेल बिगाड़ने के लिए विधान परिषद में विपक्ष की नेता राबड़ी देवी ने मिथिलांच राज्य का दांव चल दिया है. विधान परिषद में राबड़ी ने अलग मिथिलांचल राज्य की मांग की थी. सौ साल से भी अधिक पुरानी इस मांग को स्वर देकर राबड़ी देवी ने मिथिलांचल की भावनात्मक रग पर हाथ रख दिया है. आरजेडी को चुनाव में इसका कितना लाभ मिलेगा, किसकी सियासी गोटी सेट होगी? ये देखने वाली बात होगी.

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