उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की जंग फतह करने की तैयारी में जुटे सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने अपने जन्मदिन पर बुधवार को पार्टी की डिजिटल सदस्यता अभियान लॉन्च किया. हर बूथ पर 50 नए सदस्य बनाने का आह्वान करते हुए कहा कि समाजवादी पार्टी के नए सदस्यता अभियान की शुरुआत हो रही है, जिसमें समाजवादी पार्टी के एप के जरिए 'ऑनलाइन' सदस्यता ग्रहण की जा सकेगी.
अखिलेश यादव ने बुधवार को लखनऊ प्रदेश कार्यलय में दलित समुदाय से आने वाली अंजलि और उनके परिवार को समाजवादी पार्टी का सदस्य बनाकर डिजिटल सदस्यता अभियान का आगाज किया. इस दौरान अखिलेश ने कहा कि ये एक अनवरत अभियान है जो हर 'पीड़ित, दुखी, अपमानित' को हमारे समाजवादी मूल्यों से जोड़ेगा और 'पीडीए परिवार' को सशक्त करेगा.
सपा प्रमुख ने अपने इस अभियान की शुरुआत उसी दलित लड़की को सदस्य बनाकर किया है, जिसके यहां 14 अप्रैल को आंबेडकर जयंती के मौके पर जाकर भंडारा खाया था. भंडारे का बाद अंजलि के पिता का डिमोशन कर दिया गया था तो अखिलेश यादव ने अंजलि को पार्टी के मुख्यालय बुलाया था. अब अंजलि को पार्टी का सदस्य बनाकर अखिलेश ने सियासी संदेश देने का दांव चला है.
पहले भंडारा खाया, सपा दफ्तर में किया सम्मान
14 अप्रैल को बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर की जयंती और बैसाखी के मौके पर अंजलि मैसी के पिता उमेश कुमार ने लखनऊ में भंडारे का आयोजन किया था. बैसाखी के मौके पर अखिलेश यादव लखनऊ के सदर गुरुद्वारे में मत्था टेकने पहुंचे थे. गुरुद्वारा से बाहर निकले तो अखिलेश यादव से अंजलि ने भंडारे का प्रसाद खाने की गुजारिश की.
अखिलेश यादव ने भी उनका मान रखा और वहीं रुककर पूड़ी-सब्जी खाई. इस पूरी घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हुआ था और सूबे की सियासत में चर्चा का विषय बन गई.
अंजलि मैसी के पिता उमेश कुमार छावनी परिषद में सुपरवाइजर के पद पर तैनात थे. अंजलि का आरोप था कि अखिलेश यादव को भंडारे का प्रसाद खिलाने के अगले ही दिन उनके पिता पर गाज गिर गई. उन्हें सुपरवाइजर के पद से डिमोट करके सीधे सफाई कर्मचारी बना दिया गया. अंजलि के पिता का डिमोशन किए जाने के बाद अखिलेश यादव ने उन्हें पार्टी दफ्तर बुलाया और प्रेस कॉफ्रेंस करके मीडिया के सामने बात रखी.
अंजलि ने कहा था कि मेरे पिता ने संदेश भेजा है कि अखिलेश जी के लिए ऐसी सौ नौकरियां कुर्बान. अंजलि को अखिलेश ने सपा मुख्यालय बुलाकर सम्मानित किया था. अंजलि ने आरोप लगाया कि 14 अप्रैल को उन्होंने अखिलेश यादव को भंडारे में पूड़ी खिलाई थी. इस कारण सरकार ने उनके पिता को सुपरवाइजर पद से डिमोशन कर सफाईकर्मी बना दिया.
अंजलि को अखिलेश ने बनाया सपा का सदस्य
अखिलेश यादव ने अपने जन्मदिन के मौके पर अंजलि मैसी और उनकी माता को पार्टी दफ्तर बुलाकर अपनी पार्टी के ऐप से पहला सदस्य बनाया. इसके साथ ही डिजिटल सदस्यता अभियान की शुरुआत की इस दौरान अखिलेश यादव ने कहा कि डिजिटल सदस्यता अभियान की शुरुआत हम अंजलि जी को पार्टी का सदस्य बनाकर कर रहे हैं.
गुरुद्वारे के पास इन्होंने मुझे अपने भंडारे में बुलाया था, जिसके बाद से इन्हें काफी सामाजिक और राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ा. जिन लोगों का सम्मान छीना गया है, हम हर स्तर पर उनकी आवाज उठाएंगे और वक्त बदलने पर उन्हें पूरा सम्मान वापस दिलाएंगे.
सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा कि प्रदेश-देश के सभी जागरूक नागरिकों से हमारा आग्रह है कि इस ऐप के माध्यम से घर-बैठे आप स्वयं तो सदस्य बनें ही साथ ही और लोगों को भी सदस्य बनने के लिए प्रेरित करें और अन्य लोगों की सदस्य बनने में मदद भी करें. प्रदेश-देश के युवाओं से हमारी विशेष अपील है कि अपने उज्ज्वल भविष्य के लिए पार्टी के सदस्य बने. उन्होंने कहा कि
नये सदस्य ‘संपर्क, संवाद और सहायता के माध्यम से समाजवादी पार्टी के सिद्धांतों और संकल्पों का प्रचार-प्रसार करेंगे. सामाजिक न्याय का राज लाने और देश को बंधुराष्ट्र बनाने के हमारे परम लक्ष्य की प्राप्ति को सुनिश्चित करेगी.
अंजलि के जरिए अखिलेश दे रहे बड़ा मैसेज
अखिलेश यादव ने अपने सदस्यता अभियान के आगाज के लिए दलित समुदाय से आने वाली अंजलि और उनके परिवार को चुना, जिसके जरिए राजनीतिक संदेश देने की कवायद की है. सपा का फोकस 2027 में दलित समुदाय को जोड़ने की है. 2024 के लोकसभा चुनाव में मिली प्रचंड जीत के बाद विधानसभा चुनाव में भी पीडीए (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) के फॉर्मूल पर चलती दिख रही है.
पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने हाल ही में संगठन स्तर पर दलितों की हिस्सेदारी बढ़ाई है. पार्टी ने जानबूझकर जिला संगठनों, फ्रंटल यूनिट्स और कैंडिडेट चुनने में दलितों और बहुत पिछड़े वर्गों की हिस्सेदारी को बढ़ाया है. इस स्ट्रैटेजी का फायदा 2024 के लोकसभा चुनावों में मिला, जब सपा ने उत्तर प्रदेश की 17 अनुसूचित जाति-आरक्षित संसदीय सीटों में से सात जीतीं. इसके बाद से पार्टी लगातार दलित समुदायों को जोड़ने की कवायद में है. इसी मिशन के तहत अखिलेश ने अपने अभियान का आगाज अंजलि को सदस्य बनाकर किया है.
यूपी में दलित आबादी और सियासत
ओबीसी वर्ग के बाद उत्तर प्रदेश में दूसरी सबसे बड़ी हिस्सेदारी दलित समुदाय की है. सूबे में दलित आबादी 22 फीसदी के करीब है. यह दलित वोटबैंक जाटव और गैर-जाटव के बीच बंटा हुआ है. 22 फीसदी कुल दलित समुदाय में सबसे बड़ी संख्या 12 फीसदी जाटवों की है और 10 फीसदी गैर-जाटव दलित हैं.यूपी की दलित जातियां कुल 66 उपजातियां हैं, जिनमें 55 ऐसी उपजातियां हैं, जिनका संख्या बल ज्यादा नहीं हैं. इसमें मुसहर, बसोर, सपेरा और रंगरेज जैसी जातियां शामिल हैं.
दलित की कुल आबादी में 56 फीसदी जाटव के अलावा दलितों की अन्य जो उपजातियां हैं, उनकी संख्या 46 फीसदी के करीब है. पासी 16 फीसदी, धोबी, कोरी और वाल्मीकि 15 फीसदी और गोंड, धानुक और खटीक करीब 5 फीसदी हैं. बसपा प्रमुख मायावती और भीम आर्मी के चीफ चंद्रशेखर जाटव समुदाय से आते हैं.
उत्तर प्रदेश की सियासत में दलित राजनीति हमेंशा से जाटव समुदाय के ही इर्द-गिर्द ही सिमटी रही है.बसपा प्रमुख मायावती के दौर में जाटव समाज की सियासी प्रभाव बढ़ा तो गैर-जाटव दलित जातियां भी अपने सियासी महत्वकांक्षा के लिए बसपा से बाहर देखना शुरू किया. सपा 2024 में दलित वोटों को जोड़ने में काफी हद तक सफल रही थी और अब 2027 में भी दलित वोटों के दम पर सत्ता का वनवास खत्म करना चाहती है.